जीवन का संन्यास और जन्माष्टमी

Ma Jivan Shaifaly Sanyas Osho Making India

जीवन एक चिलक हो गया था… चिलक जानते हो ना, पीठ की अकड़न से उठने वाली पीड़ा… भयंकर दर्द… असहनीय… ऐसा कि बस मुंह से अंतिम शब्द जो निकला था … पापा मुझे अपने पास बुला लो… बस अब नहीं जीना मुझे… मैं जीना नहीं चाहती… अपने पास बुला लो…

पापा मेरे उलटे जन्मे थे यानी पैर की तरफ से… कहते हैं जो उल्टे जन्मते हैं उनका पैर यदि चिलक से पीड़ित रोगी की पीठ पर लगा दो तो उसका यह रोग हमेशा के लिए चला जाता है…

मुझे आज तक याद नहीं कभी पापा के पैर छुए हो, या शायद उन्होंने ही कभी नहीं छुआए. हालांकि हमारे परिवार में ऐसी कोई परंपरा भी नहीं कि बेटियां पाँव नहीं छूती…

तो पापा ने गुहार नहीं सुनी, जीवन की असहनीय पीड़ा पीठ पर लादे आँखें उनको खोज रही थी, ये जानते हुए कि अब वो देह में नहीं है… होते तब भी उनका आशीर्वाद भरा हाथ पीठ पर होता, पाँव वो कभी ना लगाते…

लेकिन उस रात जैसे मेरा वजूद प्रार्थना बन गया था… या तो मेरे पास आ जाओ या मुझे अपने साथ ले जाओ… पिछले चार महीने से जिस पीड़ा को भोग रही हूँ, उससे मुक्ति चाहिए… सारे भगवान्, सारे गुरुओं से प्रार्थना कर चुकी… मेरी कोई नहीं सुनता… बस एक आखिरी उम्मीद बस आप ही है पापा….

ma jivan shaifaly with father Late Arvind Topiwala
Ma Jivan Shaifaly with father Late Arvind Topiwala

हर बार की तरह स्वामी ध्यान विनय ने जैसे मेरे मन की बात पढ़ ली, मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा… बेटी से इतना मोह!!! जब से देह छोड़ी है, बस देह ही छूटी, जिस बेटी से मिलने के लिए जीते जी तरसते रहे उसका प्रेम मरकर भी नहीं छूट पाया… तब से वो आप ही के पास है… उन्होंने कहा- ज़रा सर उठाकर उस कुर्सी की तरफ देखो… आंसुओं से भरी आँखों में इतना धुंधलापन था कि मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था…

स्वामी ध्यान विनय जैसी दिव्यदृष्टि नहीं पाई है जो अशरीरी लोगों को देख सकूं… लेकिन इन चार महीनों की कठिन तपस्या के दौरान भी ध्यान विनय ने अपनी दीक्षा का धर्म नहीं छोड़ा था… उठने, बैठने, खाने पीने, सोने जागने, से लेकर स्वर के अनुसार पहला कदम उठाने, स्नान करने की विधि, से लेकर देखने सुनने और बोलने तक की इतनी विद्या सिखा दी थी कि इतनी पात्रता हासिल कर सकी कि उन्हें चाहे अशरीरी रूप में देख ना सकूं, लेकिन…..

मैं घुटनों के बल घसीटते हुए जब उस कुर्सी तक पहुँची और हाथ मैंने कुर्सी पर रखा तो उनका स्पर्श पा सकी… फिर जब कभी उनको याद करती हूँ, वो अपने तरीके से अपनी उपस्थिति का एहसास करवा जाते हैं.

स्वामी ध्यान विनय के होते हुए मैं उस दिन मृत्यु के द्वार पर खड़ी थी तो कदाचित पिता की सुरक्षित बांहों को अनुभव करने के लिए ही वहां तक पहुँचाया गया था… वरना मैं पूरे ब्रह्माण्ड में खुदको अकेला अनुभव करने लगी थी…

अनवरत अश्रुधारा और उखड़ती सांस के साथ मेरी पीड़ा अपने वर्चस्व पर थी… और तब ध्यान विनय ने कहा था- उनके ही आदेश पर सब हो रहा है… उनकी ही इच्छा थी आपको इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने की, जिसके लिए उन्होंने मुझे नियुक्त किया.. और पीड़ा को भोगे बिना उससे मुक्ति नहीं मिलती “माँ:.

और उस दिन पापा मुझे मौत के मुंह से खींच लाये… उनका साथ उनका आशीर्वाद एक बार फिर नया जीवन दे गया… स्वामी ध्यान विनय की नौ साल की मेहनत जो वो मुझ पर कर रहे थे, उनकी दीक्षा रूपी यज्ञ में पिता का वो स्पर्श ही अंतिम आहुति के रूप में बचा था कदाचित, जिसके बाद लगा नहीं पूरा ब्रह्माण्ड मुझे इस पीड़ा से मुक्त करने के लिए प्रयासरत था, मैं ही अपनी आँखें बंद किये बैठी थी… और जब आँखें खुली तो सारे गुरुओं का आशीर्वाद और अस्तित्व का जादू मुझ पर बरस पड़ा…

ध्यान बाबा हमेशा कहते हैं.. बहुत सारे लोगों की प्रार्थनाएं आपके साथ है… मुक्ति का मार्ग सिर्फ प्रेम ही नहीं होता… जैसे मैं कहता हूँ प्रेम करना नहीं प्रेम हो जाना है वैसे ही पीड़ा को अनुभव करने के स्थान पर पूरी तरह से पीड़ा ही हो जाओ… और जैसे प्रेम में आप अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता से भर जाते हो उसी तरह जब वो पीड़ा देता है तब भी कृतज्ञ हो जाओ कि उसने आपको इस पीड़ा के लिए चुना… करोड़ों में कोई एक होता है जब अस्तित्व किसी को इस पीड़ा के लिए चुनता है, और आप उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक हैं. और जब तक आप खुद अपने पिछले जन्मों के कर्मों की इस पीड़ा से पूरी तरह मुक्त नहीं होंगी आप दूसरों को कैसे मुक्त करेंगी जिसके लिए अस्तित्व ने आपके लिए योजना बनाई है.

मैं नहीं जानती अस्तित्व की योजना क्या है, और मुझे क्या करना है लेकिन इन चार महीने की ध्यान की प्रक्रियाओं ने मुझे और अधिक साक्षी भाव से जीना सिखाया है. पिछले नौ वर्षों में ध्यान विनय की रोज़मर्रा के कार्यों को लेकर जिन नसीहतों के प्रति लापरवाह रही उसे और अधिक सजगता से करने लगी हूँ… योग प्राणायाम की हमारी सनातनी परंपरा और ऋषियों ने जिन नियमों को अपनी हर आती जाती सांस के साथ पालन करने की शिक्षा दी है, उसका महत्त्व समझने लगी हूँ. अब बस जीवन जैसा आता है उसे जीए चले जाने का गुर मेरे गुरु स्वामी ध्यान विनय से सीख रही हूँ… ताकी पिछले जन्म के कर्मों से मुक्ति के अलावा अब इस जन्म में अपनी तरफ से कोई ऐसा कर्म न करूं जिसका क़र्ज़ चढ़ जाए.

फिर यह हुआ कि कल से अचानक लोग मुझे जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं, बल्कि मेरा तो जन्मदिन भी नहीं है. लेकिन आज सुबह सुबह याद आया, हाँ मेरा वास्तविक जन्म तो आज ही हुआ था आठ साल पहले 14 अगस्त 2009, आज ही के दिन तो बब्बा (ओशो) ने मेरे गले में माला डालकर मुझे संन्यास दीक्षा दी थी और मेरा नाम बदलकर “जीवन” रख दिया. मैं अपनी पीड़ा में इस छलिए को भी भूल गयी थी… और उसकी उस बात को भी कि “मैं मृत्यु सिखाता हूँ”, ठीक वैसे ही जैसे स्वामी ध्यान विनय ने मेरे सबसे पहले सन्देश के जवाब में कहा था – “मौत से मिलने की इतनी बेताबी?”…. लेकिन इन दोनों ने एक बार फिर साबित कर दिया शिष्य चाहे सारी आशाएं छोड़ दे, गुरु कभी शिष्य को अकेला नहीं छोड़ते…

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उस दिन 14 अगस्त को ही जन्माष्टमी भी थी, और यही जन्माष्टमी मेरे पिता का जन्मदिन भी है… 2009 में दीक्षा से पहले बब्बा मुझे स्वप्न में कृष्ण के दर्शन करा गए थे, यह संकेत था जन्माष्टमी के दिन मुझे दीक्षा मिलने का… तब मुझे लगा था अब मैं पूरी तरह से बदल गयी हूँ, लेकिन नहीं वह तो संन्यास यात्रा का प्रारम्भ था… यात्रा अब भी जारी है, पापा के आशीर्वाद के साथ, गुरुओं की कृपा के साथ, अस्तित्व की जादुई योजनाओं के साथ और स्वामी ध्यान विनय के पहाड़ से धैर्य और महासागर से असीम प्रेम के साथ.

जन्माष्टमी पर मेरे पिता के जन्मदिन के साथ मेरा भी नया जन्म हुआ है… और बब्बा ने शायद आज का दिन मेरे लिए विशेष रूप से चुना क्योंकि वो कहते हैं –

“कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र. कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र. कृष्ण शब्द का अर्थ होता है जिस पर सारी चीजें खिंचती हों. जो केंद्रीय चुंबक का काम करे. प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है. वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिँचती हैं और आकृष्ट होती हैं.

शरीर खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, परिवार खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, समाज खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, जगत खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है. वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आसपास सब घटित होता है. तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है, और उसके बाद सब चीजें उसके आसपास निर्मित होनी शुरू होती हैं. उस कृष्ण बिंदु के आसपास क्रिस्टलाइजेशन शुरू होता है और व्यक्तित्व निर्मित होता है. इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्म मात्र नहीं है, बल्कि व्यक्ति मात्र का जन्म है.

और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिंदगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है. फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती. कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं, एक इंस्टीट्यूट हो जाते हैं. फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं. फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है. इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूँ. कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति रह ही नहीं जाते. वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं. और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे हैं, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं.” – ओशो

कृष्ण तत्व में विलीन होना ही मुक्ति, कोई फर्क नहीं तुम किस रूप में हो

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