सप्तसिंधु का जल हममें रक्त बनकर बहे इसके लिये कटा-फटा-टूटा नहीं, चाहिये पूरा भारत

15 अगस्त 1947 भारत की आज़ादी का दिन था. हमें आज़ादी मिली, उस खुशी को आज भी हम हर साल आज़ादी के दिन के रूप में मनाते हैं पर इस खुशी को मनाने के दौरान हममें से कितने लोग हैं जिनके मन में कोई वेदना या पीड़ा होती है?

स्वाभाविक सवाल होगा, आज़ादी के दिन कोई वेदना पीड़ा क्यों हो? पर ये सवाल सिर्फ वही पूछेगा जिसने भारतभूमि को माँ रूप में नहीं देखा, जिसके अंदर भारत विभाजन का अपराध बोध नहीं है, जिसने कभी भारत विभाजन की सबसे ज्यादा कीमत चुकाने वाले पंजाबियों और बंगालियों के दर्द को महसूस ही नहीं किया.

ये सवाल वो भी पूछेगा जिसने भारत को ईश्वर रचित और देवताओं की क्रीड़ा स्थली नहीं माना, जिसने कभी प्रभु श्रीराम के ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ के स्वर्गिक उद्गार का स्मरण ही नहीं किया और न ही भारत को एक रखने हेतु कृष्ण और आद्यगुरु शंकराचार्य जैसे भारत भक्तों की तपस्या को याद रखा.

ये सवाल उन नमकहरामों के मुंह से भी निकलेगा जिसने वंदेमातरम् के मन्त्रद्रष्टा ऋषि बंकिम की आनंदमठ नहीं पढ़ी, जिसने हिमालय में देवता देखने वाले कालिदास का साहित्य नहीं पढ़ा, जिसे कारागृह में भारत माता का साक्षात्कार करने वाले उत्तरयोगी श्री अरविन्द का स्मरण नहीं है, जिसने कालापानी की सजा काट चुके हिंदुत्व के वर्तमान स्वरुप के प्रणेता स्वातंत्र्यवीर सावरकर की अवमानना की और जिसने अपने राजनैतिक स्वार्थ में बाबा साहेब अम्बेडकर को अपना कमरा बदलने पर मजबूर कर दिया (हिन्दू से बौद्ध).

15 अगस्त 1947 को हमें खंडित आज़ादी मिली तो बंटवारे के गुनहगारों ने हमें ये समझाया, बेटे! कहाँ स्वाधीनता रूपी महान उपलब्धि और कहाँ विभाजन जैसा तुच्छ त्याग. अरे! इतने बड़े देश के एक-दो टुकड़े किसी को खैरात में दे भी दिया तो क्या चला गया जो इतने बेचैन होते हो.

चीन द्वारा हमारी जमीन हड़पे जाने पर इन्हीं मातृद्रोहियों के द्वारा देश की संसद में खड़े होकर ये कहा गया कि वहां तो तिनका भी नहीं उगता. ऐसे ही मातृघातक संतानों ने कच्छ के रण हड़पे जाने की दुश्मनों की कोशिश पर ये कह दिया था कि उस जगह के लिये क्यों विलाप करे जहाँ एक गिलास पानी भी बिना कीड़ा निगले नहीं पी सकते.

भारत विभाजन की वेदना और पीड़ा हर उस मन में है जिनके लिए भारत का कण-कण शंकर है, जिनके लिए भारत भूमि का हर टुकड़ा एक तीर्थ है, जिनके लिए पवित्र सिंधु नदी, गौरवशाली नगर लाहौर, मुल्तान और अटक के बिना भारत माता अपूर्ण है.

भारत विभाजन का पाप हम सबके मत्थे है और हमारा ये पाप इसलिए अक्षम्य है क्योंकि

– हमने अपनी माता का अंगछेदन करते हुए उनकी दोनों भुजाएं काट दी और इसका टूटा-फूटा और कटा-फटा नक्शा देखकर भी हमें वेदना नहीं होती.

– हमने श्रीराम के पुत्र लव, पाणिनि, भगत सिंह और गुरु नानक देव की जन्मस्थली को अपने से अलग कर दिया.

– हमने दाहिर की बहादुर बेटियां सूर्य और परिमल को देश विभाजन के साथ विस्मृत कर दिया और उनका वो मान नहीं रखा जिनकी वो हकदार थीं.

-देश विभाजन को मानकर हमने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के अवशेष उनके वैरियों को सौंप दिए.

– हिंगलाज और ढाकावासिनी माँ भगवती को उनके भरोसे छोड़ आये जिनके लिए वो नापाक बुतस्थल मात्र हैं.

– वेदों के संकलन स्थल को उनके जिम्मे छोड़ आये जिनके लिए वो कुफ्र की किताबें हैं.

भारत विभाजन सिर्फ राजनैतिक समझौता या खैरात वितरण नहीं था, बल्कि ये हम जैसे भारत माता की लाखों संतानों को अनाथ करना था. काश कि भारत विभाजन के वक़्त कोई विभाजन के जिम्मेदारों की गिरेबान पकड़ कर पूछता कि जलियांवाला बाग़ में कुछ सौ भारतीयों को बेदर्दी से मार डालने वाला जनरल डायर अगर मार डाले जाने लायक था तो लाखों लोगों के क़त्ल, हजारों ललनाओं के वैधव्य और लाखों बच्चों को सिर्फ कुर्सी की चाहत में अनाथ कर देने वाले तुम लोगों के लिए कौन सी सजा तय होनी चाहिए?

भारत विभाजन के पीछे की वजहें कोई कुछ भी गिनाये पर मेरे लिए भारत विभाजन की वजह हम हिन्दुओं का कमजोर मनोबल, हमारे आँखों पर चढ़ा धर्मनिरपेक्षता का झूठा चश्मा, शत्रुओं पर अत्यधिक विश्वास तथा जीवित-जाग्रत भगवती भारत की भावना का विस्मरण था.

अपने गलतियों से सबक लेते हुये, हिन्दू समाज पुरुषार्थी बने और अखंड भारत के नक्शे को अपने अन्तस्थ: में रखते हुए भारत भक्ति में जुट जाये, यही हुतात्मा गोडसे की अतृप्त आत्मा को मोक्ष दिलवाएगा, यही श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की आत्मा को भी शांति देगी और यही ऋषि अरविंद की भविष्यवाणी को साकार करने का माध्यम बनेगा.

हमारे ऋषियों ने वेदों के हिरण्यगर्भ सूक्त में “यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः । यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥” गाते हुये जिस भारत देवता की आराधना का आदेश दिया था वो लाहौर, हिंगलाज, रावलपिंडी, ढाका, पवित्र सिंधु नदी और सिन्धु सागर के किनारों के बिना पूरा नहीं होता.

संकल्प लीजिये कि पवित्र वेद-मन्त्र जिस सिंधु के तट पर रचे गये थे उसे और पराया न रहने देंगे. हमारी धमनियों में गंगा, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, यमुना, झेलम और चिनाब का जल रक्त बनकर बहे इसके लिये कटा-फटा-टूटा नहीं पूरा भारत चाहिये. इससे कम में कुछ भी नहीं… कुछ भी नहीं…

अखंड भारत के संकल्प के साथ जय भारत वंदेमातरम्…

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