खुला ख़त : ‘भयमुक्त’ करने के लिए

प्रिय पूर्वउपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी साहब,

सादर नमन! मैं आज आपकी ईमानदारी का कायल हो गया हूँ सर. वैसे प्रसंशक तो पहले भी था इस बात का लेकिन आज तो आपने प्रतिमान ही स्थापित कर दिए हैं.

मैं आज मोदी जी द्वारा आपको कटाक्ष में डिप्लोमेटिक कहे जाने की भी निंदा करता हूँ क्योंकि आप एक स्पष्ट एवं ईमानदार व्यक्ति है जो जैसे है वैसे ही स्वयं को अभिव्यक्त करते है, जबकि डिप्लोमेटिक व्यक्ति कभी भी ऐसा कुछ नहीं करता बल्कि वह अपने सार्वजनिक जीवन में प्रायः दोहरा व्यवहार ही करता है और जैसे जैसे वे उच्चतर संवैधानिक पदों की ओर बढ़ते जाते है वह दोहरापन और मंझता चला जाता है.

आपने एक बार रामलीला मैदान में तिलक लगवाने एवं आरती उतारने से स्पष्ट मना कर दिया था क्योंकि आप एक दृढ़ मुस्लिम थे, है और रहेंगे. आपने पूर्ण साहस के साथ वही किया जो एक मुस्लिम से अपेक्षा की जा सकती है कि वह करना चाहेगा क्योंकि उसका धर्म उसे तिलक लगवाने और आरती उतारने की इजाजत नहीं देता. आपने धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य के उपराष्ट्रपति होते हुए भी पूरी धर्मनिष्ठा के साथ अपने निजी धर्म को प्राथमिकता देते हुए उपरोक्त ऐतिहासिक स्टैंड लिया.

एक हिन्दू के रूप में मुझे यह अत्यंत बुरा लगा और मैने अपने आक्रोश को कुछ अपशब्दों के साथ शून्य में प्रक्षेपित कर दिया लेकिन सच बात यह है कि आपने अपने धर्म के लोगों के लिए एक आदर्श स्थापित कर दिया कि कैसे एक मुस्लिम चाहे किसी काफिरबहुल्य राष्ट्र का उप संवैधानिक शीर्ष ही क्यों ना हो उसे कभी अपने धर्म एवं संविधान के बीच किसी दुविधा को अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है.

आपने एक उम्दा नज़ीर पेश करते हुए यह भी साबित कर दिया कि ऐसे किसी स्टैंड के लिए आपकी कड़ी आलोचनाएं भी आपको किसी सफाई अथवा खेद प्रकटीकरण के डिप्लोमेटिक नाटक तक के लिए बाध्य नहीं कर सकती. आप ने जो कुछ किया वह सोचा समझा एवं पूर्वविचारित था और आपने उसे पूरे गर्व के साथ करके दिखा दिया कि कैसे एक मुस्लिम के लिए उसका धर्म, धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता एवं सर्वधर्म सद्भाव जैसे किसी पाखंड से कई आसमान ऊंचा होता है.

 

कुछ समय पूर्व जब आपने इसी तरह भारतीय झंडे को सलामी देने के कुफ्र को भी पूर्ण धर्मनिष्ठा के साथ बेअसर कर दिया. इस बार भी आपने यह संदेश दे दिया अपने हममजहब भाइयों को कि एक सच्चे मुस्लिम के लिए केवल और केवल अल्लाह ताला के अलावा किसी के सामने सलामी देने की कोई अनिवार्यता नहीं है फिर चाहे वह आपके राष्ट्र के सम्मान का चरम प्रतीक तिरंगा ही क्यों ना हो. इस बार भी आपने अपने धर्म की मान्यता को राष्ट्रीय प्रतीकों की भावपूर्ण मान्यताओ पर वरीयता देते हुए अपना धार्मिक फर्ज बखूबी निभाया. मैंने इस बार एक “राष्ट्रप्रथम ” देशभक्त होने के चलते आपको फिर से गरियाया लेकिन एक “धर्म चेतना विहीन हिन्दू ” की दृष्टि से आपको यह सब करता देखकर बस मौन ही रह गया.

आप चूँकि किसी दुविधा में नहीं है इसलिए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर जब अरब मुल्क भी शीर्षासन कर रहे थे तब भी आपने भारतीय संविधान के उपराष्ट्रपति पद के प्रोटोकाल में से महीन से महीन बारीकियों को बुनकर एक ऐसा कारण ईजाद कर लिया कि आपको इस योग रूपी कुफ्र को अपनी पाक आंखों के समक्ष होते देखने को मजबूर ना किया जा सके.

आपने राममाधव जी के उस खेद जताते हुए ट्वीट जिसमें उन्होंने यह कहकर अपने शब्द वापस ले लिए थे कि ,” आप इसलिए नहीं जा पाये कि आप अस्वस्थ्य थे” को आपने अपने कार्यालय से यह कहकर अंगूठा दिखा दिया कि ऐसा कुछ नहीं था आप पूर्ण स्वस्थ थे और आप प्रोटोकोल की उस महीन जाल के साये में एक बार फिर से स्वयं की साम्प्रदायिकता को शिरोधार्य कर गए. हम लोग इस बार भी आपको ऐसा करते देख भाग्य को कोसते रह गए.

सत्य यही है सर कि एक दृढ़ धर्मावलंबी किस प्रकार से शीर्ष संवैधानिक पदों पर भी अपने धर्म को पूर्ण निष्ठा के साथ बिना किसी द्वंद्व के प्रथम वरीयता से धारण कर सकता है इसका अपने श्रेष्ट उद्धरण प्रस्तुत किया है जिसका मैं मुरीद हूँ.

और आज तो आप इतिहास भी रच गए जब जाते जाते भी आप अपनी कौम को राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की इस पद से संभावित अंतिम सेवा भी कर गए. तब जबकि आपके कार्यकाल के 10 में से 7 वर्ष अपनी ही मातृसंस्था कांग्रेस की सरकार के होते हुए भी आप जैसे धार्मिक उपराष्ट्रपति के होते हुए भी भयमुक्त एवं मुतमइन नहीं कर पाये, फिर भी आप वर्तमान सरकार जो संविधान को ही ओढ़ती, बिछाती चल रही है को साम्प्रदायिक सौहार्द्र के मुद्दे पर असफल घोषित कर गए ताकि इसे एक पदमुक्त उपराष्ट्रपति की (पदेन मरणासन्न अंतिम इच्छा ) मानकर पूर्ण किया जावे.

यद्यपि विचारणीय यह भी है कि आपके इस 10 वर्षीय “असाधारण कार्यकाल” के लिए आखिर जिम्मेदार किसे माना जाए और इसका “पारितोषिक” किसे दिया जाए?

सबकुछ जानते हुए या कहे यही जानते हुए स्वतंत्र भारत की भरतार समझने वाली पार्टी कांग्रेस ने आपको उपराष्ट्रपति के लिए श्रेष्ट विकल्प के रूप में वरण किया. अपने वोट को लेकर आपको कहाँ तक भुगतना पड़ सकता है यह सबक जागरूक मतदाताओं को यदि अब भी नहीं समझ आये तो फिर “अल्लाह ही मालिक है “. शुक्र मनाइए कि इस देश के दुर्भाग्य की अति पर द्रवित देव ने 2014 से सारा खेल बदल दिया अन्यथा आप जैसे “दृढ़” व्यक्ति को राष्ट्रपति पद पर देखकर मैं भी शायद कल्पना के व्योम में गुरुत्वहीनता सा अनुभव कर लेता.

आप यदि राष्ट्रपति बन जाते तो क्या क्या होता यह विचारकर रक्तचाप डगमगाने से बेहतर है कि मैं ईश्वर का शुक्रिया अता करूं. आपको इस पद पर सुशोभित करने के कृत्य के परिणामस्वरूप कांग्रेस को भारतीय राजनीति से पूर्ण समाप्ति का पश्चाताप अवश्य ही करना चाहिए.

अब बात आपके भय एवं बेचैनी की तो हुजूर पहले तो ये बात समझ ही नही आई कि यह कैसा भय है जो आपके प्रिय भयग्रस्त भाई ओवैसी को इतना कह देने की हिम्मत देता है कि ,” 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो जनसंख्या असंतुलन हम सही कर देंगे. ”

ये कौन सा भय है जो आपका एक भयभीत मुस्लिम भाई करोड़ो भारतीयों की आराध्या भारत माता को डायन कह देता है?

ये कौन सा भय है कि आपका एक अत्यधिक भयभीत मुस्लिम भाई भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बोटी बोटी कर देने की धमकी दे देता है?

ये कौन सा भय है जो आपका एक मुस्लिम भाई देश के प्रधानमंत्री का सिर मुण्डने का फतवा जारी कर देता है?

जाहिर है कि आप किसी और डर की बात कर रहे जो बड़ा विलक्षण सा होता है शायद सत्ता के ना होने का भय, तुष्टिकरण के समाप्त हो जाने का भय, नैसर्गिक न्याय का भय अथवा सभी को भयभीत कर देने के जन्मजात व्यसन के छूट जाने का भय?

हां सर ! फिर भी भय तो होगा ही, जब भी अपनी अकड़ के चलते आप हिन्दुओं की भावनाओं की गाय का गला रेतोगे तो भय तो होगा ही, जब भी लव जिहाद के नाम पर हिन्दू बालाओं पर कुदृष्टि डालोगे तो भय तो होगा ही, जब भी गोधरा जैसी अति करोगे तो गुजरात जैसा भय तो होगा ही.

जब भी अपनी भौगोलिक कब्जाई नीति की जद में हिन्दुओं की आस्था के प्रतिमान लाओगे तो भय तो होगा ही. जब तक आप चंद राजनीतिक गिद्धों की भेदनीति के बहकावे में आकर हिन्दुओं पर आधिपत्य के स्वप्न देखोगे तो चैन से सो नहीं पाओगे.

अंततः एक बार फिर आपकी धार्मिक प्रतिबद्धता को नमन रहेगा जो कि एक बेहतर सीख हो सकती है भारत के हिन्दुओं के लिए कि कैसे, “धर्मो रक्षति रक्षित: ” सच में एक प्रभावी सूत्र है.

कभी कभी स्वयं संविधान की रक्षा के लिए भी संविधान की व्यवहारिक अवहेलना कर हिंदुत्व का उभार ना केवल हिंदुत्व को बल्कि स्वयं संविधान को भी पुष्ट कर सकता है.

सीखिए कुछ इन निवर्तमान उपमहामहिम की धर्मपरायणता से चाहे ये स्वयं कितने ही नीचस्थ क्यों ना हो. क्योंकि, “उत्तम विद्या लीजिये यद्यपि नीच पे होय, पड़ा अपावन ठौर पर भी कनक तजै ना कोय.”

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