जबलपुर मेडिकल कॉलेज : विगत 7 वर्षों में स्वाइन फ्लू से मृत्यु का आंकड़ा है ‘शून्य’

जबलपुर मेडिकल कॉलेज में स्वाइन फ्लू का मैं विगत कुछ वर्षों से नोडल ऑफिसर हूँ.

एपिडेमिक के समय भी जब सम्पूर्ण भारत से बच्चों एवं अन्य मरीजों की मृत्यु हो रही थी एक भी बच्चे की 2010 से स्वाइन फ्लू की वज़ह से मृत्यु नहीं हुई.

संभाग के एक मात्र स्वाइन फ्लू के आधिकारिक अस्पताल में 0 मृत्यु का आंकड़ा विगत 7 वर्षों में छोटी बात नहीं. कल ही एक गंभीर स्वाइन फ्लू पीड़ित बच्चा वेंटिलेटर से बाहर आ पाया.

हमारे 14 pg स्टूडेंट्स और नर्सेस को इस बीच स्वाइन फ्लू के लक्षण भी उत्पन्न हुए थे और उन्हें टेमीफ्लू दवा खानी पड़ी थी.

स्टाफ सिस्टर, आया बाई, सफाई कर्मचारी सभी का अहम् योगदान होता है ऐसे अच्छे आंकड़े देने में.

अधीक्षक, और कॉलेज प्रशासन का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है .

लेकिन आजतक किसी ने भी चाहे मीडिया हो, सरकार हो, प्रशासन हो किसी ने भी दो अच्छे शब्द, छोटा सा टोकन ही कार्य के recognition का संक्रमण में कार्य करती इस टीम को नहीं दिया. कहीँ एक लाइन भी कोई न छापेगा उनके प्रयासों और समर्पण पर जबकि इन कर्मचारियों के अतिरिक्त उनके परिवार एवं घरों के बच्चे भी घर में कपड़ों इत्यादि से संक्रमण लाये जाने के खतरे में होते हैं.

स्वाइन फ्लू से सम्पूर्ण भारत में होने वाली मृत्यु के सर्वाधिक केस चिकित्सालय में कार्य करने वाले अधिकारी, कर्मचारी एवं उनके परिवारजनों के ही थे. इनका आर्मी पर्सन की तरह न तो कोई अतिरिक्त insurance होता है न ही इन्हें शहीद का दर्ज़ा ही मिलता है.

ऐसे में ये क्या चाहते हैं उस ठीक हुए मरीज़ की मुस्कुराहट के अतिरिक्त, दो अच्छे शब्द. कार्य का सम्मान औरों को भी प्रेरित करता है बेहतर करने के लिए. ख़ासकर छोटे कर्मचारियों को अवश्य एक टोकन ऑफ़ appreciation दिया जाना चाहिए.

लेकिन एक गलती भी हो जाने पर कड़ी सजा की मांग हर ओर से उठने लगेगी और गलती उससे ही होगी एक दिन जो काम करेगा.

यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ क़ि अस्पताल हो या कोई भी सरकारी विभाग, बेहतर कार्य कर्मचारियों से लेने के लिए मात्र सजा या ज़िम्मेदारी फिक्स करने से बात नहीं बनेगी. अच्छे कार्य को सराहना, पुरस्कृत करना टीम में एक नयी उर्ज़ा का संचार करता है एवं स्वस्थ प्रतियोगिता और sense of belonging को लेकर आता है. लेकिन सरकारी अस्पतालों में इसका नितांत अभाव है. ख़राब कार्य और अच्छा कार्य करने वाले दोनों ही एक ही स्तर पर होते हैं.

दूसरा पहलू बता दूं अपने अनुभव से क़ि गोरखपुर की घटना एक प्रशासनिक भूल या लापरवाही है. इसका कोई और रंग नहीं.

लेकिन पता है हम भारतीय क्या करते हैं हर घटना के बाद, हंगामे करते हैं, हल्ला करते हैं, सजा देते हैं, बचाते हैं, जोड़ तोड़ करते हैं लेकिन एक अच्छा सिस्टम नहीं बनाते और सिस्टम बना हो तो उसे फॉलो नहीं करते. इसलिए घटनाओं की जगह और स्वरुप बदल जाते हैं मात्र.

मुझे इस कांड में सजा की उतनी परवाह नहीं कि किसी को मिलेगी या नहीं, क्योंकि यह enquiry बरसों तक चलेगी. मुझे पहला कंसर्न यह है क़ि जिस वजह से ऑक्सीजन नहीं पंहुच पायी क्या उस सिस्टम को पूरी तरह से एक बैकअप प्लान के साथ दुरुस्त बनाया जायेगा? मेरा अनुभव बहुत आशावादी नहीं है इस विषय में.

मेरा दूसरा कंसर्न यह है क़ि क्या देश के अन्य सभी सरकारी बड़े चिकित्सालयों में सिस्टम पूरी तरह दुरुस्त है या नहीं. जहां सर्वाधिक खराब स्थिति के लिए एक बैकअप प्लान भी हो.

ताकि प्रशासनिक व्यक्ति बदल भी जाएं तब भी इसकी पुनरावृत्ति न हो.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY