आयुर्वेद आशीर्वाद : बुद्धिवर्धक ‘ब्राह्मी’

स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली ब्राह्मी का नाम हम सबने सुना होगा. पर ब्राह्मी के पौधे के बारे में कम ही जानते हैं. ब्राह्मी हरे और सफेद रंग की होती है. ब्राह्मी का पौधा हिमालय की तराई में हरिद्धार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग में अधिक मात्रा में पाया जाता है. जो बहुत उत्तम किस्म का होता है. यह मुख्यतः जला सन्न भूमि में पाई जाती है इसलिए इसे जल निम्ब भी कहते हैं.

विशेषतः यह हिमालय की तराई, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि में नदी नालों, नहरों के किनारे पाई जाती है. गंगा के किनारे बारहों महीने हरी-भरी पाई जाती है. इसका क्षुप फैलने वाला तथा मांसल चिकनी पत्तियाँ लिए होता है. पत्तियाँ चौथाई से एक इंच लम्बी व 10 मिलीमीटर तक चौड़ी होती है. ये आयताकार या सु्रवाकार होती है तथा काण्ड व शाखाओं पर विपरीत क्रम में व्यवस्थित रहती हैं. फूल नीले, श्वेत या हल्के गुलाबी होते हैं, जो पत्रकोण से निकलते हैं.

फल लंबे गोल आगे से नुकीले होते हैं, जिनमें छोटे-छोटे बीज निकलते हैं. काण्ड अति कोमल होता है. इसमें छोटे-छोटे रोम होते हैं व ग्रंथियाँ होती हैं. ग्रन्थि से जड़ें निकल कर भूमि पकड़ लेती हैं, जिस कारण काण्ड 2 से 3 फुट ऊँचा होने पर भी छोटा व झुका हुआ दिखाई देता है. ब्राह्मी का पौधा पूरी तरह से औषधीय है. इसके तने और पत्तियां मुलायम, गूदेदार और फूल सफेद होते हैं. ब्राह्मी की जड़ें छोटी और धागे की तरह पतली होती है. इसमें गर्मी के मौसम में फूल लगते हैं. यह पौधा नम स्थानों में पाया जाता है, तथा मुख्यत: भारत ही इसकी उपज भूमि है.

इसे भारत वर्ष में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे हिंदी में सफेद चमनी, संस्कृत में सौम्‍यलता, मलयालम में वर्ण, नीरब्राम्‍ही, मराठी में घोल, गुजराती में जल ब्राह्मी, जल नेवरी आदि, इसका वैज्ञानिक नाम बाकोपा मोनिएरी(Bacapa monnieri) है… इस पौधे में हायड्रोकोटिलिन नामक क्षाराभ और एशियाटिकोसाइड नामक ग्लाइकोसाइड पाया जाता है.

ब्राह्मी का प्रभाव मुख्यतः मस्तिष्क पर पड़ता है. यह मस्तिष्क के लिए एक पौष्टिक टॉनिक तो है ही साथ ही यह मस्तिष्क को शान्ति भी देती है. लगातार मानसिक कार्य करने से थकान के कारण जब व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है तो ब्राह्मी का आश्चर्यजनक असर होता है. ब्राह्मी स्नायुकोषों का पोषण कर उन्हें उत्तेजित कर देती है और हम पुनः स्फूर्ति का अनुभव करने लगते हैं.

सही मात्रा के अनुसार इसका सेवन करने से निर्बुद्ध, महामूर्ख, अज्ञानी भी श्रुतिधर (एक बार सुनकर जन्म भर न भूलने वाला) और त्रिकालदर्शी (भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य को जानने वाला) हो जाता है.

ब्राह्मी घृत, ब्राही रसायन, ब्राही पाक, ब्राह्मी तेल, सारस्वतारिष्ट, सारस्वत चूर्ण आदि के रूप में प्रयोग किया जाता हैं. अग्निमंदता, रक्त विकार तथा सामान्य शोथ में यह तुरंत लाभ करती है. ब्राह्मी बुद्धि तथा उम्र को बढ़ाता है. यह रसायन के समान होती है. बुखार को खत्म करती है.

सफेद दाग, पीलिया, प्रमेह और खून की खराबी को दूर करती है. खांसी, पित्त और सूजन को रोकती है. बैठे हुए गले को साफ करती है. ब्राह्मी का उपयोग दिल के लिए लाभदायक होता है. यह उन्माद (मानसिक पागलपन) को दूर करता है. ब्राह्मी कब्ज को दूर करती है.

इसे बुद्धिवर्धक होने के कारण ‘ब्राह्मी’ नाम दिया गया है. मण्डूकपर्णी मण्डूकी से इसे अलग माना जाना चाहिए जो आकार में मिलते-जुलते हुए भी इससे अलग है .

स्वभाव :
यह शीतल (ठंडी) होती है.

पहचान तथा मिलावट-
शुद्ध ब्राह्मी हरिद्वार के आसपास गंगा के किनारे सर्वाधिक होती है ….यहीं से यह सारे भारत में जाती है ….उसमें दो पौधों की मिलावट होती है .

मण्डूकपर्णी (सेण्टेला एश्याटिका) तथा बकोपा फ्लोरीबण्डा …. गुण एक समान होते हुए भी मण्डूकपर्णी ब्राह्मी से कम मेद्य है और मात्र त्वचा के बाह्य प्रयोग में ही उपयोगी है.

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