हमारी कमज़ोरी है, सरल निष्कर्ष और सही मूलभूत निष्कर्षों में से सरल को चुनना

कुछ सप्ताह पहले मेरे वार्ड में एक सप्ताह के अंदर तीन मरीज गिर गए, दो की जांघ की हड्डी (नेक ऑफ फीमर) टूट गई, एक के सर में ब्लीडिंग हो गई… तीनों ही बेहद वृद्ध थे, 90 से ऊपर. तीनों ही आखिरकार इस गिरने से जुड़े कॉम्प्लिकेशन से मर गए अगले कुछ दिनों में.

ऐसी कोई भी घटना होती है तो इन्हें “एडवर्स इवेंट” कह कर रिपोर्ट करना अनिवार्य है. ऐसे हर एडवर्स इवेंट की जाँच होती है. जाँच का केंद्र होता है यह प्रस्तावित करना, कि क्या व्यवस्थागत परिवर्तन किए जाएँ कि ऐसी घटनाएँ ना हों.

बहुत ही दुखद घटना है गोरखपुर में बच्चों की मृत्यु. पर जरा सोचें, हमारी व्यवस्था कैसी है? 4 मर सकते हैं, 40 भी मर सकते हैं, 400 भी मर जाएँ… तो भी हम कुछ नहीं सीखेंगे. यह कुल हल्ला-गुल्ला सिर्फ चाय की प्याली में तूफान है. दुर्घटनाओं से सीखने, रूट कॉज़ एनालिसिस करने, व्यवस्थागत परिवर्तन करने की हमारी कोई परंपरा है ही नहीं.

हमारी जो सांस्कृतिक आदतें हैं कि इन सभी को अपनी नियति समझ के स्वीकार करने के अलावा हम कुछ नहीं करते. आज बच्चों की बात है, दुखती रग है… तो किसी दोषी को पाकर सज़ा देने की माँग है… दोषी तो कोई ना कोई है ही, सज़ा किसी ना किसी को हो ही जाएगी… पर हमारी स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार भी आएगा इसकी अपेक्षा है भी क्या?

और सिर्फ सरकारी ही नहीं, महंगे प्राइवेट कॉर्पोरेट हस्पतालों में भी ऐसी प्रक्रियाएं नहीं हैं. छोटी-मोटी बातें गलत होती ही रहती हैं… उन्हें रिपोर्ट करने की, उनकी समीक्षा करने की, उनका निराकरण करने की जिससे कोई बड़ी घटना ना हो, ऐसी कोई प्रक्रिया है क्या?

आपके दफ्तर में भी बिजली का नंगा तार लटका होगा… अगर किसी दिन सचमुच आग लग जाये तभी कोई जागेगा… छोटे बच्चे सड़क पार करते हैं, कोई उनके लिए रुक कर रास्ता नहीं देता. उनके दाएं-बाएं से गाड़ियाँ पार होती रहती हैं… किसी दिन कोई बच्चा गाड़ी के नीचे दब जाए तो लोग गाड़ी में आग लगा देंगे… ड्राइवर को पीट कर मार डालेंगे… हो गई प्रतिक्रिया…

कोई जाँच ज़रूरी नहीं. कोई प्रक्रियाएँ बनाने की जरूरत नहीं है… पर आज हम गुस्से में हैं… आज किसी को सज़ा होनी ही चाहिए… फटाफट निष्कर्ष चाहिए… एक सरलतम निष्कर्ष पर पहुंचने की बहुत हड़बड़ी होती है…

दो दिनों से बक्सर के जिलाधिकारी पांडेय जी की आत्महत्या को लेकर लोग तरह-तरह के निष्कर्षों पर पहुंच रहे हैं… कमजोर आदमी, सताया आदमी, हारा आदमी… तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सुनी. पर एक छोटी सी बात जो दुनिया में सिद्ध है… आत्महत्या एक मनोरोग का लक्षण है… उसे इलाज की ज़रूरत होती है… इतना सरल निष्कर्ष नहीं निकलेगा.

तात्कालिक कारण लेकर बैठ जाएंगे… परिवार में कलह, परीक्षा में असफलता, किसान है तो कर्ज़ माफी की राजनीति, किशोरी लड़की है तो प्रेम में टूटा हुआ दिल… पर परिवार में कोई डिप्रेशन में हो तो उसे लेकर साइकेट्रिस्ट के पास जाने का सरल निर्णय नहीं लिया जाएगा… अगर जाना भी पड़ा तो उस पर कितने टैबू… अरे, उसे पागल के डॉक्टर के पास ले गए हैं…

सरल निष्कर्ष और सही मूलभूत निष्कर्षों में से सरल को चुनना… यह हमारी सिविलाइज़ेशनल कमज़ोरी है… गोरखपुर-देवरिया हो, या कोयम्बटूर-कालीकट… उबाल मार कर ठंडे पड़ जाएंगे… पर दुर्घटनाएं दुर्भाग्य से नहीं होतीं… जो दुर्घटनाएँ नहीं हो रही हैं, वह मात्र रामभरोसे है.

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