जीवन से संवाद या आत्महत्या

बात 2008 के पहले की है, अपने वैवाहिक जीवन से त्रस्त और माता पिता के घर न लौट पाने की त्रासदी से जूझ रही थी. अवसाद इतना भयानक था कि घर से ऑफिस जाते हुए या ऑफिस से घर लौटते हुए मैं रास्ता भूल जाती थी. कई किलोमीटर आगे चले जाने के बाद होश आता तो पता चलता था… घर तो पीछे छूट गया.

गाड़ी चलाते चलाते आँखों के सामने से दुनिया गायब हो जाती थी और मैं काले घने बादलों के बीच खुद को खड़ा पाती… होश तब आता जब कोई ऑटो वाला पीछे से जोर से टक्कर मार गिरा जाता, होश आने पर पता चलता भरे ट्रैफिक में बीच रस्ते में खड़ी हो गयी थी… आसपास मजमा लगने से पहले मुंह छुपाकर भाग जाती…

मायके वालों से और पुराने मित्रों से मिलने की इजाज़त नहीं थी, नए दोस्त स्वीकार्य नहीं थे, बस बचे ससुराल पक्ष के रिश्तेदार, जिनके बीच जाते ही दम घुटने लगता, कारण जो भी हो, ताली एक हाथ से तो नहीं ही बजती, सामने वालों की अपनी समस्याएँ होंगी, मेरी अपनी.

प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति में एक अकेला इंसान ज्यादा से ज्यादा क्या सोच सकता है. ऐसी ही अवस्था में लगातार तीन साल रहने के बाद मेरे पास दो ही विकल्प थे, या तो मृत्यु को गले लगा लूं… या सबकुछ छोड़कर जीवन की तलाश में निकल जाऊं… लेकिन पुत्रियों का मोह और चरित्रहीन होने का लांछन रोके हुए था मुझे जीवन की तलाश में निकलने से… तो मैंने पहला विकल्प चुना… आत्महत्या का… किसी के चले जाने से जीवन नहीं रुकता, सब अपने हिस्से का जी ही लेते हैं…

ये सोचकर घर से ऑफिस का बहाना करके निकल ही रही थी कि सुबह सुबह खबर मिली, मौसी सास की बेटी ने ससुराल में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली… इस खबर ने मुझे झकझोर कर रख दिया, लगा मेरे हिस्से की मृत्यु को नियति ने उसके नाम कर दिया…

मौसी सास की बेटी यानी जैसे कोई झरना… उछलती, कूदती, खिलखिलाती… गोरा रंग, चंचल आँखें, मोहिनी मुस्कान… सुन्दर, अमीर पति और दो प्यारे प्यारे सुन्दर बच्चे…

किसी को आज तक विश्वास नहीं होता ऐसी हंसती खिलखिलाती लड़की हृदय  में कितनी पीड़ा लेकर जी रही थी, और किसी को बताया तक नहीं… बाद में जब उसके बच्चों से मिली तो वो भी माँ को भलाबुरा कहते हुए मिले… जिस माँ को अपने बच्चों के भविष्य की चिंता नहीं थी, ऐसी माँ का मर जाना ही बेहतर था…

बाद में पता चला ससुराल वालों से बहुत तंग आ चुकी थी… वो ससुराल वालों से तंग थी तो उसने भी मरने से पहले अपनी परेशनी के कारण पति को परेशान करके रख दिया होगा… कोई चुपचाप तो चली नहीं गयी होगी… कारण दोनों तरफ से होंगे जो दोनों के लिए जायज़ हो सकते हैं…

लेकिन दोनों में से कोई एक भी बदनामी को गले लगाकर अलग हो जाता तो उसकी जान बच जाती… बदनामी तो आज भी मिल रही थी उस मासूम को, उसके बच्चे तक उसकी मौत को जायज़ ठहरा रहे थे…

उसकी मृत्यु से मेरे अन्दर बहुत बड़ा सागर मंथन शुरू हो गया, जीवन और मृत्यु में से किसी एक को चुनना था… खैर ये तो बाद में पता चलता है चुनाव कभी हमारे हाथ में होता ही नहीं. नियति ने 2008 में स्वामी ध्यान विनय को भेजकर जीवन को नए सिरे से जीने का अवसर दिया और मैंने उसे तुरंत लपक लिया…

तो मैं स्वार्थी कहलाई, चरित्रहीन कहलाई, बुरी माँ कहलाई, लेकिन मैंने मृत्यु को परास्त किया… वरना किसी को पता भी न चलता और अखबार के किसी कोने में एक युवती के आत्महत्या की खबर छपती, समाज संवेदना दर्शाने का हमेशा का अपना एक सा उबाऊ अभिनय करता… किसी को पता न चलता इस धरती पर शैफाली नाम का कोई जंतु भी रहता था…

जैसे IAS मुकेश पांडेय की आत्महत्या पर दुनिया सहानुभूति दिखा रही है. बेचारा… कितना हंसमुख, मिलनसार आदमी, बीवी-बच्चे, माँ- बाप सबसे बहुत प्यार करता था… पता नहीं क्या हुआ? रिश्ते नातों में सामंजस्य इतना क्या गड़बड़ हुआ होगा कि संभाल नहीं पाया? उसको देखकर लगता तो नहीं था… बेचारा… च च च

और यही बेचारा यदि थोड़ी सी भी हिम्मत दिखाकर इस समस्या को सुलझा लेता. बीवी से परेशान होकर जीवन छोड़ने के बजाय बीवी को ही छोड़ देता तो यही समाज और यही दुनिया उसकी कालर पकड़ कर उसका जीना और हराम कर देती.

क्योंकि समाज की अपनी कोई संवेदना नहीं होती, वो सिर्फ घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना जानता है. सब अपनी अपनी दृष्टि से घटनाओं को प्रस्तुत कर अपने अपने हिस्से की भड़ास निकाल लेते हैं.

हम व्यक्ति को सामाजिक कठपुतली समझते हैं, जिसने इस मंच पर अधिक देर तक बढ़िया नृत्य कर के दिखा दिया वो सफल, और जिसके हाथों में पड़ी डोरी ज़रा भी कमज़ोर पड़ गयी तो वो असफल, और फिर यदि किसी ने इस डोरी को नोंच कर फेंक देने का साहस दिखा दिया वो चरित्रहीन.

इसके पहले कि ऐसी आत्महत्याओं की दर अपना नाग सा फन उठाए ऊपर उठने लगे इंसान को अपने चरित्र का निर्माण खुद करने दो.. उसे अपने जीवन की नई परिभाषा खुद गढ़ने दो… भगवान के लिए इंसान को इंसान बनकर ही जीने दो उसे कठपुतलियाँ मत बनाओ.

मुकेश पांडेय को जाना था वो चले गए, अब उनका कुछ नहीं हो सकता, लेकिन उनकी पत्नी जिसके साथ उनके चाहे जैसे सम्बन्ध रहे हो, है तो वो भी इंसान ही, हमारी आपकी तरह सारे मानवीय गुण अवगुण लिए, कम से कम अब उसे तो जीने दो. उनके माता पिता को जीने दो, उनके ज़ख्मों को सवाल पूछ पूछकर मत कुरेदो.

और अंत में ऑस्कर विजेता अभिनेता रॉबिन विलियम्स की बात कहना चाहूंगी जिनकी कल पुण्यतिथि थी –
“The tragedy of the life is not death, but what dies inside us while we live.”

और आपको फिर याद दिला दूं, यह वही इंसान है जो अपने अभिनय के ज़रिये दुनिया को हंसाता है, जिसे अपनी हंसाने की अभिनय क्षमता के लिए ऑस्कर अवार्ड मिलता है, एंटरटेनमेंट वीकली पत्रिका ने जिसको “सबसे हंसोड़ जीवित व्यक्ति” की उपाधि दी, वो व्यक्ति अचानक कमरे में मृत पाया जाता है. लोग कहते हैं आत्महत्या कर ली.

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