निर्मल आनंद का एक आंसू : टॉयलेट एक प्रेम कथा

बहुत साल पहले एक रुसी राष्ट्रपति भारत आए थे. सड़क पर गुजरते समय धूल उड़ती दिखाई दी तो काफ़िले को रुकवाया और बाहर आकर खड़े हो गए. पूछने पर बताया कि ये नज़ारा हमारे देश में नहीं दिखता इसलिए जी भर देख रहा हूँ.

बस ऐसा ही उन अंग्रेजीदां शहरी फ़िल्म समीक्षकों के लिए कहा जा सकता है, जिन्हें ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी तकलीफ़ ‘शौचालय’ फ़िल्म चलाने का हथकंडा नज़र आती हैं. सही भी है. मुंबई-दिल्ली जैसे महानगरों में रहने वाले विश्वास नहीं करेंगे कि ये समीक्षा लिखे जाने तक आधा ग्रामीण भारत आज भी बाहर शौच के लिए जाता है. सो दोष उनका नहीं. रुसी राष्ट्रपति की तरह वे भी ‘भारत के कोनों’ से अंजान हैं. अब समीक्षा…

जया ने अपनी ससुराल मंदगांव में तलाक की अर्जी भेजी है. 1700 साल के इतिहास में इस गांव में कोई तलाक नहीं हुआ है. तलाक का कारण है पढ़ी लिखी बहू की ससुराल में टॉयलेट नहीं है. लिहाजा गांव की अन्य महिलाएं भी अब घर में टॉयलेट चाहती हैं. एक शॉट में ऐसे ही एक ‘विद्रोही’ घर की सीढ़ियों से एक ‘लोटा’ लुढ़कता हुआ आ रहा है. इसके बाद एक लॉन्ग शॉट में मंदगांव दिखाया गया है और लोटे की प्रतिध्वनि आकाश में गूंजती रहती है. क्रांति की लौ कैसे ‘लपट’ में रूपांतरित होती है, ये सीन में प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया है.

फ़िल्म में द्विअर्थी संवाद है, फूहड़ता है. आदि-आदि. ये आपत्ति अन्य माननीय समीक्षकों ने ली है. एक प्रेमकथा बनाना, जिसके केंद्र में शौचालय जैसा अनचाहा विषय है, कितना मुश्किल हो सकता है. कौन देखेगा ऐसी बदबूदार फ़िल्म यदि वो बिना चटखारे के बना दी गई हो.

‘भाभी जवान हो गई, दूध की दूकान हो गई’ ये संवाद सुनकर मुझे भी झटका लगा था लेकिन उसका अगला सीन अक्षय कुमार से भैंस के विवाह का है सो इसे अश्लीलता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. तात्पर्य ये है कि जब आपको सीख की ‘कड़वी कुनैन’ खिलानी हो तो शक्कर का वर्क भी जरुरी है. हर घर शौचालय का संदेश मीठी गोली में लपेटकर ही दिया जा सकता है.

निर्देशन : श्री नारायण सिंह ने ये फ़िल्म बनाई है. आज सुबह तक ये एक अंजान शख़्स हुआ करता था और कल शाम तक उसे दुनिया जानेगी. दो दिन पहले ही उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘इज्ज़त बच जाए बस’. सच है कस्तूरी मृग नहीं जानता कि सुगंध उसकी देह से ही उपजी है. शौचालय जैसे विषय को एक मनोरंजक प्रेमकथा में ढालना दुष्कर कार्य था. वे जानते हैं कि दर्शक को कैसे ‘एंगेज’ किया जाए.

फ़िल्म शास्त्र के तराज़ू पर जब मैं इस फ़िल्म को रखता हूँ तो निर्देशक का पलड़ा ही भारी होता है. अहसासों के सतरंगी धागों से बुनी ये कहानी गांव-कस्बों के धूल भरे रास्तों पर चलती प्रेम के फूल खिलाती जाती है.

भूमि पेड़णेकर : जोर लगा के हैया में नज़र आईं थी भूमि. कोई फर्स्ट चॉइस नहीं थी. फ़िल्म की यूनिट में तकनीकी प्रभारी थी और दुर्घटनावश फ़िल्म की मुख्य नायिका बन गई. रिस्क थी. इतनी मोटी अभिनेत्री कैसे चलेगी. जुआ कामयाब रहा. लोगों ने कहा ‘वन टाइम वंडर’ है. आज उसने बता दिया कि वो एक सधी हुई अभिनेत्री हैं. उनके पास ‘डिजाइनर चेहरा’ नहीं है और न स्टाइल. लेकिन भूमि भीतर से खूबसूरत है. जया का किरदार उसने इतनी त्वरा से निभाया है कि अक्षय जैसे स्थापित अभिनेता भी कई दृश्यों में उसके आगे मेमने नज़र आए हैं.

अक्षय कुमार : इनकी पहली फ़िल्म ‘सौगंध’ से समझ आ गया था कि उनके भीतर एक छुपी चिंगारी है. आज उन्होंने जो अभिनय किया, वो अब तक की सबसे बेहतरीन अदाकारी है. जब अक्षय की फिल्मों की बात होगी तो ये फ़िल्म प्रमुखता से याद की जाएगी. ये इस बात का संकेत है कि वो आज भी अभिनय की गहराइयां सीखते हैं. आज, कल से ज्यादा आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं. उनका स्टारडम आज से और चमकीला हो गया.

स्वच्छ भारत मिशन, नोटबंदी, शौचालय के घोटालों का ज़िक्र फ़िल्म में आया है. एक मुख्यमंत्री है, जिसका किरदार योगी जी से प्रेरित है. जब गांव में शौचालय नहीं बनते तो अफसरों के शौचालय में ताले जड़वा देता है. ऐसे बहुत से रोचक दृश्य हैं.

यदि इस सप्ताहांत निर्मल आनंद पाना चाहते हैं, एक निर्देशक की मासूम कोशिश देखना चाहते हैं, प्रेम की तीव्रता को फिर महसूस करना चाहते हैं. स्टेशन पर इंतज़ार की उन यादों को जिंदा करना चाहते हैं और सबसे बड़ी बात ‘स्वच्छ भारत’ की प्रेरणा देने और लेने के लिए ये फ़िल्म जरूर देखें. जब बाहर आएंगे तो ‘निर्मल आनंद’ का एक आंसू गाल पर लुढ़का हुआ पाएंगे.

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