किताबें पढ़ना नहीं चाहते तो सफ़ेद दाढ़ी को सुन कर ही कुछ सीख लो

जब ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की बात चल रही है तो उसके ठीक पहले के खिलाफत आन्दोलन का जिक्र भी आएगा. ये 1919-1924 के बीच चला इस्लामिक आन्दोलन था जिसके बारे में बाद में एनी बेसेंट ने कहा था कि भगवान ना करे भारत को दोबारा खिलाफत जैसा आन्दोलन झेलना पड़े. ये ऑट्टोमन साम्राज्य के खलीफा अब्दुल हामिद द्वित्तीय (1876-1909) के छेड़े हुए अभियान का नतीजा था. उसने विश्व भर के इस्लामिक समुदाय से खलीफा के हक में उठ खड़े होने के लिए आवाज लगाईं थी. इसी के तहत खलीफा का दूत जमालुद्दीन अफगानी भारत आया और इस्लामिक हुकूमत कायम करने के लिए उसने (भारत के) मुसलमानों से बात की.

उन्नीसवीं सदी के अंत में आये इस खलीफा के सन्देश का नतीजा ये हुआ कि तुर्की से इटली (1911 में) और बाल्कन (1911-1912 में) हुई जंगों के सिलसिले में हर जगह मुसलमानों ने विरोध में एकजुट होना शुरू कर दिया. जब पहले विश्व युद्ध में (1914-18 के बीच) ग्रेट ब्रिटेन और तुर्की की सल्तनत का आमना सामना हुआ तो ये इस्लामिक हुकूमत स्थापित करने की भावना और प्रबल हुई. भारत में इनका नतीजा था खिलाफत आन्दोलन.

युद्ध में तुर्की की हार के बाद जब ट्रीटी ऑफ़ सेव्रेस (10 अगस्त 1920) के हिसाब से सीमाओं का बंटवारा शुरू हुआ तो भारत का मुसलमान चाहता था कि हार-जीत के बाद भी इस्लामिक ज़मीन खलीफा के पास रहे. भारत में इस के लिए खिलाफत आन्दोलन शुरू हुआ तो उसके नेता थे मुहम्मद अली और शौकत अली, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और हसरत मोहनी. इनके अलावा जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक रहे डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी, जो कि कांग्रेस प्रेसिडेंट भी रह चुके थे, वो भी प्रमुख नेता थे.

सभी बड़े उत्तर भारतीय शहरों में खिलाफत कांफ्रेंस हुए, और एक सेंट्रल खिलाफत कमिटी बम्बई में बनी जिसमें सेठ चोटानी प्रेसिडेंट थे और शौकत अली सेक्रेट्री थे. अली बंधुओं ने 1920 में खिलाफत मैनिफेस्टो तैयार किया था और सेंट्रल खिलाफत कमिटी ने तुर्की के आन्दोलन के लिए और स्थानीय खिलाफत फसाद के लिए चंदा जुटाना भी शुरू कर दिया था.

इसी आन्दोलन से जुड़ा एक और नाम है महमूद अल हसन यानि देवबंद फिरके के मौलाना महमूद हसन का. 1851 में बरेली में जन्मे मौलाना महमूद हसन ईसाईयों को उखाड़ फेंकने के लिए खलीफा से बात करने खुद ही तुर्की चले गए थे और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग के लिए अपने खत पर तुर्की के गवर्नर गालिब पाशा का दस्तखत भी करवा लाये थे. उनका इरादा बगदाद के रास्ते बलूचिस्तान होते हुजे भारत पहुँच कर विद्रोह शुरू करने का था. इस मामले को रेशमी ख़त की साजिश यानि “सिल्क लैटर कांस्पीरेसी” कहा जाता है. पंजाब सी.आई.डी. को इसका पता चल गया और मौलाना हसन को मक्का में गिरफ्तार कर लिया गया, उन्हें माल्टा में तीन साल से ज्यादा के लिए कैद रखा गया और 1920 में छोड़ा गया.

इसी खिलाफत आन्दोलन का नतीजा था ‘मोपाला’, जिसमें हजारों हिन्दुओं को क़त्ल कर दिया गया, सैकड़ों अपहरण, बलात्कार और धर्म-परिवर्तन किये गए. एनी बेसेंट ने इसी विभीषिका को देख लिया था जिसके कारण उन्होंने कहा कि भारत में दूसरा खिलाफत आन्दोलन नहीं होना चाहिए. इसके ज़ोर पकड़ने की एकमात्र वजह ये थी कि दुनिया भर के मुसलमान खुद को इस्लामिक खलीफा की प्रजा मानते थे, खलीफा का हुक्म होते ही उन्होंने देश की सीमाएं भूल कर खलीफा का साम्राज्य स्थापित करने की सोची.

फ़ौज में जहाँ राजपूत रेजिमेंट, जाट रेजिमेंट, बिहार रेजिमेंट वगैरह होते हैं, वहां इस्लामिक रेजिमेंट ना होने की भी यही वजह है. खलीफा का हुक्म होते ही इस्लामिक रेजिमेंट क्या करेगी, ये अंग्रेजों को समझ आ गया था तो इस्लामिक रेजिमेंट फिर ख़त्म कर दिया गया. इस आन्दोलन के असफल होने की एक बड़ी वजह थी घोटाले. काफी बड़ी रकम जो खलीफा का साम्राज्य स्थापित करने के नाम पर जमा की गई थी (1.6 मिलियन) उसका गबन हो गया और आन्दोलन के नेताओं पर इस रकम के गबन का अभियोग था. आम मुसलमान का भरोसा इन नेताओं से उठ गया.

खिलाफत आन्दोलन के ख़त्म होने पर इसके नेताओं में से कुछ ने तो अपनी पार्टी बनाकर चुनावों में शामिल होने का प्रयास किया, कुछ कांग्रेस में ही वापस जुड़ गए. मौलाना आजाद और डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी उनमें प्रमुख थे. दिल्ली के दरियागंज इलाके का अंसारी रोड इन्हीं डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी के नाम पर है. मोपला जैसे दंगों और खिलाफत आन्दोलन के गबन को ना रोक पाने के इल्जामों वाले इन्हीं मुख्तार अहमद अंसारी के कुनबे से हमारे भूतपूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी आते हैं.

ये जानना भी अजीब ही है कि ऐसे रसूखदार और अमीर होने के बाद भी ‘अंसारी’ ज़ात के मुसलमानों को भारत के लगभग सभी राज्यों में आरक्षण का लाभ मिलता है. आम लोगों ने खिलाफत आन्दोलन के बारे में सिर्फ एक पैराग्राफ इसलिए पढ़ा है क्योंकि ये आज़ादी की लड़ाई थी ही नहीं. भारतीय राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आन्दोलन के पुनरुत्थान के काल में ये इस्लामिक खलीफा को स्थापित करने की लड़ाई थी. ऊपर से इसके जिक्र के साथ ही मोपला के हिन्दुओं के कत्लेआम (दंगे नहीं कत्लेआम) की बात करनी पड़ती जो सेक्युलरइज्म के खिलाफ और पॉलिटिकली इनकरेक्ट होगा. इसलिए ज्यादातर इतिहास की किताबों में खिलाफत को एक पैराग्राफ के किसी कोने के ब्लॉक में समेट दिया जाता है.

भाषण देने की कला सीखनी हो तो हामिद अंसारी के विदाई भाषण में प्रधानमंत्री मोदी को भी सुनना चाहिए. उन्होंने हामिद अंसारी के पूर्वजों का जिक्र कर के और उन्हें करियर डिप्लोमेट कहके बिलकुल वही किया है जो जॉन ड्राईडेन की एक कविता की शुरूआती लाइन सुनाकर किया जाता है :

A man so various, that he seem’d to be
Not one, but all mankind’s epitome:

इतने तक सुनने पर आपको लगेगा कि आपकी तारीफ की गई है, लेकिन इस कविता की आगे की लाइन कुछ ऐसी है :

Stiff in opinions, always in the wrong;
Was everything by starts, and nothing long;
But, in the course of one revolving moon,
Was chemist, fiddler, statesman, and buffoon

अब आराम से सोचते रहिये कि आपकी तारीफ की गई है या बिलकुल तमीज़ से बिना एक भी अपशब्द कहे गालियाँ दी गई है. कथित राष्ट्रवादियों को मोदी से सीखना चाहिए, किताबें पढ़कर कुछ सीखने की मेहनत तो हो नहीं पाती ना! सफ़ेद दाढ़ी को कॉपी कर लेना अच्छा विकल्प होगा.

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