बक्सर डीएम की आत्महत्या : ‘मसूरी’ के सिलेबस में शामिल हों अध्यात्म और नैतिक शिक्षा

सुबह ज़रा जल्दी हुई आज. आत्महत्या कर लेने वाले आइएएस अधिकारी मुकेश पाण्डेय के बारे में सोच रहा था. विचलित है ज़रा मन. सोचिए ज़रा… किसी होशियार विद्यार्थी का सबसे बड़ा सपना होता है यूपीएससी क्रैक करना. उसमें भी आइएएस पाना, और वह पा कर कलेक्टर बन जाना तो मानो चौरासी लाख योनियों से मुक्त हो जाना है. इतना सब कुछ पा कर भी पांडे जी ख़ाली हाथ ही रहे. कितने निरीह साबित हुए वे… उफ़.

कुछ तो फ़िरंगी तामझाम, ऊपर से लाखों में एक हो जाने की हनक, अधिकारियों को शायद साधारण इंसान नही रहने देता. शिखर पर पहुंच कर अकेला कर देता है शायद उसे. कॉलेज और संघर्ष के दिनों के पीछे छूट गए दोस्तों से इनकी यारबाज़ी क़ायम रहती है या नही, पता नही. होती तो शायद मन की बात साझा कर इनका तनाव कुछ कम हो पाता. सुना है मसूरी की ट्रेनिंग में भी इन्हें ख़ुद को आगे से ‘विशेष’ समझने के लिए प्रेरित किया जाता है.

समाज भी इन्हें शायद ही ‘इंसान’ रहने देता है. या तो ईर्ष्या करेगा इनसे या चाटुकारिता. मैं अपनी ही बात कह रहा हूं, अगर कोई राजनीतिक कार्यकर्ता या कोई पत्रकार यह कहता है कि फलाने अधिकारी से उसकी अच्छी पहचान है, तो मन में पहली प्रतिक्रिया यही होती है- ‘दलाल कहीं के’. जानता हूं, ऐसा सामान्यीकरण उचित नही, लेकिन आम परसेप्शन यही है.

याद आ रहा है, एक आइएएस अधिकारी के भ्रष्टाचार पर कभी एक बड़े अख़बार में लेख लिखा था- ‘ये मेरे हिस्से की धूप भी खा जायेंगे.’ उसे ऑनलाइन पढ़ कर एक दूसरे आइएएस का लम्बा मेल आया था, आलोचना में ही. फ़ेसबुक से पहले की बात है. जी मेल पर ही धन्यवाद दिया तो चैट होने लगी थी.

काफ़ी बड़े अधिकारी थे यहां लेकिन फ़िलहाल किसी देश में ‘शिक्षा अवकाश’ पर थे. ख़ुद खाना बना कर उठे ही थे जैसा उन्होंने बताया, उसके बाद तक़रीबन डेढ़ घंटा तक अपनी तकलीफ़ और तनाव बांटते रहे.

ज़ाहिर है अपन कुछ नही कर सकते थे, शायद ऐसी उस महाशय की उम्मीद भी नही रही होगी, लेकिन सुन तो सकते थे ही. सचिव स्तर का वह अधिकारी अपनी अखबारी दबंग छवि से बिल्कुल उलट एक भावुक इंसान ही लगा था. क्या पता ढेर सारी बातें कह लेने मात्र से वह ज़रा सहज हो गया हो. कम हो गया हो ज़रा सा स्ट्रेस.

मुझे नही पता बक्सर के डीएम की आत्महत्या के पीछे की वजह, लेकिन इस विदारक घटना के बहाने यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि अधिकारियों के बारे में समाज को भी अपनी धारणा बदलनी चाहिए. नौकरशाही को ख़ुद भी ख़ुद को मशीनरी का पुर्ज़ा ही समझते रहने में भलाई है. वे ख़ुद को मशीन समझ कर ख़ुद का ही ज्यादा बुरा करेंगे.

मुकेश बक्सर, बिहार के कलेक्टर थे. ‘जीवन से निराश हूं’, यह लिख कर जान दे दी इन्होंने. सोचिए… कलेक्टर हो जाना भी जीवन के प्रति आशान्वित होने की गारंटी नही है. ज़रूरी है कि ‘मसूरी’ अपने सिलेबस में अध्यात्म और नैतिक शिक्षा आदि भी शामिल कर ले. श्रद्धांजलि…

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