‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में संघ पर ‘असहयोग’ का आरोप कितना नासमझी भरा!

ज़रा बतायें – महात्मा गांधी के नेतृत्व में छेड़े गये 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में काँग्रेस के अलावा किस अन्य दल/ संगठन ने अपने नाम के साथ सहभाग किया था. इस में इस तरह की अनुमति ही नहीं थी. जो भी सहभागी थे, वे सब के सब काँग्रेस के झण्डे तले ही थे.

तो फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कैसे अपने नाम के साथ इस में सहभागी होता? ऐसे में संघ पर ‘असहयोग’ का आरोप कितना नासमझी का है? इस आंदोलन में कम्युनिस्टों की क्या भूमिका थी? यह बात सोनिया गांधी क्यों नहीं उठा रही है ?

संघ ने यह अवश्य कहा था कि इस आंदोलन की सिद्धता पर्याप्त नहीं है, अतः यह सफल नहीं होगा. पर यह एक अभिमत था विरोध नहीं, क्यों कि हजारों स्वयंसेवक इस आंदोलन में सहभागी हुए, लाठी गोली खायी, कारावास भुगता.

वे सब संघ के नाम से जायें – ऐसी स्थिति बिलकुल नहीं थी. अतः वे सब काँग्रेस के झण्डे के तले ही थे. संघ तो नाम का भूखा कभी नहीं रहा. जिन्हें जानना हो, वे उस समय के आंदोलनकारियों की सूची निकालें और उन में कितने स्वयंसेवक थे, पता करें.

मेरे नाना जी और उनके दस स्वयंसेवक मित्रों ने इस आंदोलन में कारावास भुगता. मेरे सगे चाचा (स्वयंसेवक) और अमरावती के पूर्व संघचालक के साथ कम से कम 5 स्वयंसेवकों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जिन्होंने इस आंदोलन में भाग लिया था. ऐसे खंगालते रहेंगे तो इस आंदोलन में सहभागी स्वयंसेवकों की संख्या हजारों में होगी.

पर संघ के तथा डॉ आम्बेडकर सहित कई लोगों के अभिमतानुसार इस आंदोलन की परिणति वही हो सकती थी, जो हुई. चौराचौरी काण्ड के बाद महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को बीच में ही समाप्त किया और कहा कि इस तरह के अहिंसक आंदोलन के लिए भारत की जनता पर्याप्त परिपक्व नहीं है.

अर्थात जो बात संघ ने जो पहले कही, वही बात महात्मा गांधी ने बाद में कही.

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