सिक्का जहाँ गिरा है वहीँ ढूंढिए, स्ट्रीट लाइट के नीचे तो मिलेगा नहीं

एक पुराना चुटकुला कभी-कभी सुनाई देता है जिसमें एक बुढ़िया एक स्ट्रीट लाइट के नीचे कुछ ढूंढ रही होती है. आसपास से गुज़रते कुछ लोगों को काफी देर से मेहनत करती वृद्धा पर दया आई, उन्होंने पूछा माताजी क्या ढूंढ रही हैं? पता चला वृद्धा पांच रुपये का एक सिक्का ढूंढ रही है.

सबने सोचा, कमज़ोर नज़र वाली बूढी की मदद की जाए. काफी ढूँढने पर भी जब सिक्का नहीं मिला तो लोगों ने पूछा माताजी सिक्का कहाँ गिरा था? बुढ़िया ने बताया सिक्का तो उसकी झोपड़ी में गिरा है! लोगों ने सर धुन लिया, फिर पूछा माताजी जब सिक्का झोपड़ी में गिरा था तो यहाँ क्यों ढूंढ रही थी? बुढ़िया बोली, बेटा वहां रौशनी नहीं थी ना, इसलिए यहाँ रौशनी में ढूँढने आई.

कुछ ऐसा ही मामला बिहारी होने के कारण हमें भी दिख जाता है, दूसरों को दिखता है कि नहीं, पता नहीं. हाल में ही हमारे मुख्यमंत्री सुशासन बाबू हर जगह बिहारी मज़दूरों, माफ़ कीजिये कामगारों के होने पर गर्व कर रहे थे. थोड़े पुराने सरकारी आंकड़े मानें तो करीब साठ लाख बिहारी तो सिर्फ मुंबई में होते थे.

बिहार की करीब एक चौथाई आबादी अप्रवासी थी, मतलब तीन करोड़ बिहारी रोजगार की तलाश में बिहार के बाहर रहते हैं. मुझे नहीं पता कि ये सुशासन बाबू की तरह गर्व करने की बात है, या शर्म करने की. इसे प्रधानमंत्री महोदय के हाल के ही मन की बात के आंकड़े से मिलाइए. जैसे आज भारत की ज्यादातर आबादी युवा है, तीस साल में ये सब साठ के भी होंगे.

अब मानसिकता पर आते हैं. हाय वो गाँव का घर, हाय वो आँगन, हाय वो लोग… करते तो देखा ही है ना लोगों को? जहाँ पैदा और बड़े हुए वहां से वो निकलना नहीं चाहता, निकल भी जाए तो वही जगह उसकी यादों में उस से चिपकी रह जाती है. जब वो बूढ़ा और रिटायर होगा, करीब साठ की उम्र में वो अपने उसी पुराने गाँव-कस्बे भाग आना चाहेगा.

अभी भी जब बड़े शहरों में रहने वाले अपने बूढ़े माँ-बाप को अपने साथ लाते हैं तो दो महीने में ही वापस जाने की ज़िद सुनाई देती है. किस्मत से अभी जो युवा बड़े शहरों में रोज़गार के लिए गए हैं, उनके बच्चे तो उसी बड़े शहर में पैदा हुए, बड़े हुए हैं. तो आपके लिए जो आपका गाँव-कस्बा होता है, उसके लिए वही उसका शहर होगा. वो वहां चिपके रहना चाहेगा, आपके ग्रामीण परिवेश से कनेक्ट नहीं होगा.

लाइफ एक्सपेक्टेन्सी भी बढ़ रही है, लोग सत्तर से ऊपर तो आराम से जीते हैं. यानि आज का युवा जिस दिन बूढ़ा होगा, प्रबल संभावना है कि सत्तर की उम्र में वो जिस गाँव में रहना चाहेगा, उस जगह उसके युवा होते बेटे-बहु, बेटी-दामाद ज्यादा से ज्यादा महीने-दो महीने के लिए आना चाहेंगे. साल के बाकी आठ-दस महीने अकेले?

छह महीने में तो जनाब आशा साहनी जैसा अप्रैल से अगस्त हो जाएगा! आठ महीने! कौन से संस्कार, कौन सी परम्पराएं सिखा कर बेटे को आठ महीने अपना रोज़गार छुड़ा कर गाँव में अपने पास खाली बिठा सकते हैं वो भी मुझे नहीं पता. जबरन अपने पास रख लिया तो जिन्दगी भर तो आपसे नाराज़ भी रहेगा, ख़ुशी-ख़ुशी तो आपकी ढलती उम्र में साथ नहीं दे रहा होगा ना?

इतना काफी नहीं था तो संवाद के पुराने तरीके, जैसे किताबें पढना आप छोड़ चुके, भजन-कीर्तन में जा के बैठना ‘इज़ ओह सो मिडिल क्लास’! दिक्कत तो कम नए तरीकों से भी नहीं है ना, फेसबुक-सोशल मीडिया सब बेकार है, कहने से कभी परहेज़ भी तो नहीं रहा बुढ़ऊ!

आज जो आशा साहनी की गल चुकी लाश पर अफ़सोस है, वो कल के कई लोगों के लिए भविष्य होगा. और उस भविष्य से बचने की, उसे सुधारने की कोई तैयारी करने की आपको फुर्सत भी नहीं है. पढने-सुनने में अच्छा तो नहीं लगेगा, लेकिन ये धूप में पके बाल वापस डाई से रंगिये, और सिक्का जहाँ गिरा है वहीँ ढूंढिए. स्ट्रीट लाइट के नीचे तो मिलेगा नहीं.

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