संघे शक्ति कलौ युगे

कुछ दिन पहले मैं जीवन में पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी सार्वजनिक आयोजन में गया था. रक्षा बन्धन के कार्यक्रम में स्वतंत्रता भवन का सभागार खचाखच भरा था. मुझे पहुँचने में देर हो गयी थी किंतु सौभाग्य से डॉ मनमोहन वैद्य का प्रभावशाली सम्बोधन सुन सका.

उस दिन मैंने संघ की कार्यप्रणाली की एक छोटी सी झलक का प्रत्यक्ष अनुभव किया. गेट पर तैनात स्वयंसेवक पार्किंग की व्यवस्था स्वयं देख रहे थे. उसके लिए किसी पुलिस की आवश्यकता नहीं थी. स्वयंसेवकों का अनुशासन और साथ में अतिथियों के स्वागत में मुस्कुराता चेहरा देखते ही बनता था. उन्होंने सभी को चन्दन का टीका लगा कर अभिवादन किया.

मुझे आश्चर्य हुआ कि वहाँ कोई किसी को जानता नहीं था फिर भी ऐसे स्वागत किया जैसे अपने घर के व्यक्ति हों. भवन के अंदर की व्यवस्था भी स्वयंसेवक ही देख रहे थे, कहीं कोई असमंजस की स्थिति नहीं थी. इतने सारे श्रोताओं में जिनमें बच्चे भी थे कहीं कोई कोलाहल नहीं हुआ. डॉ वैद्य के सम्बोधन के पश्चात सभी ने एक साथ “नमस्ते सदा वत्सले…” गाया.

मैं सबसे पीछे बैठा था इसलिए देख पाया कि वहाँ छोटे बच्चे भी सावधान मुद्रा में संघ की प्रार्थना गा रहे थे. मैंने जीवन में पहली बार प्रत्यक्ष देखा कि सेना/पुलिस के अतिरिक्त भी किसी संगठन में ध्वज को प्रणाम किया जाता है. समारोह समाप्त होने के पश्चात सभी लोग परिवार सहित बेहद अनुशासित तरीके से सभागार से बाहर निकल गए.

उसी भवन में सांयकाल रामकथा हुई और उस समय सुबह लगा एक भी ध्वज, बैनर अथवा पम्फलेट बिखरा हुआ नहीं था, सब साफ़ कर दिया गया था. ऐसा अनुशासन तो हम सिनेमाघरों में भी नहीं देखते जहाँ पैसे देकर फ़िल्म देखने जाते हैं. मैं औपचारिक तौर पर किसी भी संगठन से नहीं जुड़ा हूँ. अब फेसबुक के लाइक भी आकर्षित नहीं करते.

मैं तो अपने भारत को जानना चाहता हूँ इसीलिए पुस्तकों से दूर विभिन्न कार्यक्रमों में स्वेच्छा से जिज्ञासावश चला जाता हूँ. एक मित्र ने बड़े स्नेह से 15 अगस्त को महर्षि अरविन्द के जन्मदिन पर बुलाया है. ईश्वर कृपा रही तो पहुँच जाऊँगा. श्री गणेश चतुर्थी के दिन कलकत्ता में रहूँगा. तत्श्चात प्रयाग जाऊँगा. यात्रा अनन्त है. भारत बहुत बड़ा है, जटिल है. संघे शक्ति कलौ युगे.

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