इतना ही श्रेष्ठ है तो हिन्दुस्तान से बाहर क्यों नहीं निकला हिन्दू धर्म!

एक साहब ने एक सवाल उठाया है. पूछते हैं कि अगर इतना ही श्रेष्ठ है हिन्दू धर्म तो हिन्दोस्तान से बाहर क्यों नहीं निकला. उनके प्रश्न का आशय कुछ ये भी है कि इस्लाम इतना श्रेष्ठ है कि पूरी दुनिया में फ़ैल गया… दुनिया में सबसे ज़्यादा तेज़ी से बढ़ने वाला धर्म है.

तो साहब… पूरी विनम्रता से अर्ज़ किया है कि हिंदुत्व ने कभी अपने अनुयायियों को एक दायरे में बाँधने की कोशिश नहीं की. दुनिया के हर धर्म की एकमात्र पवित्र पुस्तक एक ही आराध्य और एक निश्चित पूजा पद्धति है. जैसे आपके यहां कुरआन शरीफ और पैगम्बर साहब PBUH… अब यदि कोई मुसलमान कुरआन शरीफ और पैगम्बर साहब को नकार दे तो मुसलमान रहेगा क्या?

परंतु हमारे हिंदुत्व में ऐसा नहीं. भैया, यहां तो एक नहीं सैकड़ों पवित्र पुस्तकें (holy books) हैं और हज़ारों देवी देवता. जिसे मर्ज़ी पूज लो. जैसे मर्ज़ी पूज लो. अपना नया देवता बना लो. नयी किताब लिख लो. नयी philosophy गढ़ लो. नयी पूजा पद्धति बना लो. यानि धर्म ने पूरी आज़ादी दी है. तर्क करो… सवाल करो… संशोधन करो… upgrade करो… जो चीज़ लगे कि obsolete हो गयी उसे कूड़ेदान में फेंक दो…

ये आज़ादी आप देंगे इस्लाम में? हक़ है मुसलामानों को सवाल पूछने का? तर्क करने का? upgrade करने का? या इस्लाम छोड़ देने का? जनाब, ईशनिंदा (blasphemy) में गर्दन उतार ली जायेगी… संगसार कर दिए जाओगे.

इसके विपरीत हिंदुत्व ने अपने अनुयायियों को सोचने और तर्क करने की आज़ादी दी. इसका नतीजा ये निकला कि हमारे यहां हज़ारों सालों में हज़ारों नए विचारक हुए. उन्होंने हिंदुत्व की अपने हिसाब से व्याख्या की. महावीर हुए.

बुद्ध हुए, उन्होंने हिंदुत्व को एक नयी सोच दी. एक नयी दिशा दी. अपने अनुयायी बनाये. बुद्ध ने हिंदुत्व की जो नयी philosophy प्रस्तुत की वो उस समय पूरे विश्व में फ़ैल गयी. जहां-जहां सभ्यता थी और जहां-जहां विचारक और प्रचारक पहुँच पाये वहाँ-वहाँ बौद्ध एक धर्म के रूप में फ़ैल गया.

सम्राट अशोक ने अपनी सेना को भंग कर पूरे राज्य की मशीनरी को अहिंसा और शांति के प्रसार में लगा दिया. अगले 600 सालों में भारत, चीन समेत समूचा सभ्य समाज ही बौद्ध बन गया. यहां ये याद रखिये कि एक भी आदमी को तलवार के बल पे बौद्ध नहीं बनाया गया.

ये सिलसिला… नई सोच के प्रोत्साहन का सिलसिला आज तक चालू है. आज से करीब 500 साल पहले नानक हुए. उन्होंने एक नयी सोच दी जिसका नतीजा आज sikhism है. ये सब हिंदुत्व के offshoots हैं जो अपनी स्वतंत्रता से पुष्पित-पल्लवित हो रहे हैं. कोई मनाही नहीं, कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं, कोई दुर्भावना नहीं.

इसके विपरीत इस्लाम के पहले 20 अनुयायी यदि छोड़ दें तो उसके बाद आज तक जितने मुसलमान हुए वो या तलवार के डर से हुए या लालच से या धोखे से गोमांस खिला के, कुएँ में गोमांस डाल के या अन्य ज़ोर जबरदस्ती से हुए. कहाँ गयी बांग्लादेश और पाकिस्तान की सारी हिन्दू आबादी. क्या अपनी मर्ज़ी से, हंसी ख़ुशी मुसलमान हुई… नहीं जनाब… इस्लाम की तलवार लील गयी.

और जहां तक तेज़ी से बढ़ते अनुयायी / जनसंख्या की बात है तो वो तो exponential growth का नतीजा है. exponential growth समझते हैं न? 1×4×14×14×14×14 वाली…

और अंधाधुंध बढ़ती आबादी से बहुत ज़्यादा खुश नहीं होना चाहिए साहब… क्यों ? ये जानने के लिए मेरी discovery channel के चूहों वाली पोस्ट खोज के पढ़ लीजिये.

और 100-200 करोड़ हो के भी तो छोटे से इज़राइल का मुकाबला नहीं कर पाते? जब चाहता है पीट देता है. इतनी संख्या बढ़ा के क्या करोगे? आज नमाज़ सड़क पे पढ़नी पड़ती है. कल को सड़क पे सोना पडेगा.साहब,quantity पे नहीं quality पे ध्यान दो. खुदा हाफ़िज़…

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