मुगलसराय बनाम दीनदयाल उपाध्याय नगर : सदा न रहे साहिबी, सदा न जल विस्तार!

एक मित्र ने कहा – मुगलसराय का नाम दीन दयाल उपाध्याय नगर रखना ठीक नहीं! कितना बड़ा नाम है तो बोलने में भी असुविधा होगी. बताओ असुविधा होगी कि नहीं? भाजपा का क्या ये पागलपन है कि 21वीं सदी में भी पुरापाषाण काल जैसी मानसिकता है?

हमने कहा – पहली बात यह कि क्या ठीक है क्या नहीं, इसका निर्धारण लोकतंत्र द्वारा बहुमत प्राप्त करने वाली भारत सरकार/राज्य सरकार तय करती है.

दूसरी बात यह कि नाम चाहे बड़ा हो या छोटा हो, नाम अपने आप में ऐतिहासिक प्रभाव और महत्ता को संजोए हुए रखता है. अब देखिए न.. मुगलसराय नाम इसलिए पड़ा क्योंकि मुगलों की सेना उसी स्थान के आसपास ठहरती थी. यात्रियों के ठहरने वाले स्थान को सराय कहा जाता था.

और वे यात्री कौन थे… तो आक्रांता मुगल सैनिक ही यात्री थे इसलिए इस क्षेत्र को मुगलसराय कहा जाने लगा. जनश्रुति के अनुसार मुगलों की सराय के आसपास हिजड़े और वेश्याएं नाचती थीं, मुगलों के मनोरंजन के लिए. क्या विदेशी हमलावरों की क्रूरता को स्पष्ट करता हुआ यह नाम स्वतंत्र भारत भूमि पर कितना प्रासङ्गिक लगता है ?

चलिए, एक ऐतिहासिक नाम परिर्वतन पर दृष्टि डालते हैं जब इस देश में तथाकथित पुरापाषाण कालीन सोच रखने वाली भाजपा की सरकार नहीं थी. यदि आप कभी दिल्ली गये होंगे तो इंडिया गेट जरूर घूमे होंगे. 42 मीटर ऊंचे इंडिया गेट के सामने खुद को बौना पाते होंगे. आसपास एक छतरी भी दिखी होगी जिसके नीचे कुछ भी नहीं दिखाई देता. इस बात को जानकर आपको कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि दिल्ली का दिल “India gate” एक युद्ध स्मारक है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंडिया गेट का नाम पहले यह नहीं था?

यह गेट इम्पीरियल वॉर ग्रेव कमीशन (IWGC) का ही एक भाग है, जिसकी स्थापना प्रथम विश्व युद्ध में मारे गये सैनिकों के लिए की गई थी. इस गेट का निर्माण अंग्रेज शासकों द्वारा किया गया था. और जो छतरी आप देखते हैं, इस छतरी के नीचे कभी जॉर्ज पंचम की आदमकद मूर्ति रहती थी. आप जिस राजपथ पर चलते हैं उसे Kings way कहा जाता था.

सब समय के साथ बदल गया.. क्योंकि भारत की आजादी के साथ ही यह गुलामी के प्रतीक हमारे लिए अप्रासंगिक हो चले थे अतः इस गेट का नाम इंडिया गेट रख दिया गया. कनौट प्लेस राजीव चौक हो गया.. यदि यूं ही नाम परिवर्तन पर लिखता हूँ तो एक मोटी किताब छप जाएगी. और हां, स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भी कांग्रेस पुरापाषाण कालीन सोच रखती थी इसलिए इस गेट का नाम अंग्रेजों के दिये गए नाम के बदले इंडिया गेट रखा गया था.

देखो मित्र, परिवतर्न संसार का नियम है. धर्मग्रन्थ गीता में कहा गया है.. आज जो तुम्हारा है, कल किसी और का था और परसों किसी और का होगा.. इसलिए व्यर्थ शोक करना उचित नहीं.

और अंत में.. इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है जो समकालीन समाज, देश और काल पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ते हों.

सदा न रहे साहिबी, सदा न जल विस्तार !

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