‘कम्प्युटर’ और ‘ज्यूपिटर’ : बचपन की स्मृतियों के प्राण

इन दो शब्दो के उच्चारण में समानता ‘ध्वनित’ होती है. ध्वनि की समानता के साथ ही इनमें एक और समानता है. “पहला” इस ग्रह की सबसे बड़ी खोज के रूप में सामने आया है. “दूसरा” इस सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है.

इन दोनों शब्दो से पहला परिचय “स्कूल समय” मे हुआ था. पाठ्यपुस्तक से नहीं, किराये से मिलने वाली “कॉमिक्स” से. चाचा चौधरी का दिमाग “कम्प्युटर” से भी तेज चलता है.
और
साबू को जब गुस्सा आता है तो “ज्यूपिटर” पर ज्वालामुखी फटता है.

ये “दो शब्द” तब पहली बार ‘स्मृतिकोष’ मे समाये थे जो आज तक वहीं पर बने हुए हैं.

कार्टूनिस्ट प्राण ने ‘कम्प्यूटर’ शब्द का उपयोग 1969 में किया था और उस समय शायद ही कोई बच्चा या बड़ा ‘कम्प्यूटर’ शब्द को जानता हो. तब आज की कम्प्यूटर, लेपटॉप और 4g मोबाइल चलाने वाली पीढ़ी का इस दुनिया में अस्तित्व ही नहीं था… मेरा भी नहीं.

1969 में विदेशी कॉमिक्स और वहां के ‘सुपर हीरो’ फैन्टम सुपरमैन और मेंड्रेक ब्लॉडी भारतीय बच्चों के दिमाग में छाए हुए थे. और उनका भारतीय बाजार में एकाधिकार बना हुआ था. तब मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से निकले 31 वर्षीय युवा प्राण ने इस एकाधिकार को तोड़ने का निश्चय किया. उसने सोचा कि कुछ नया किया जाये. भारतीय सुपर हीरो यूरोप-अमेरिका के किरदारों से बिलकुल अलग होना चाहिये. तब उनके दिमाग मे चाचा चौधरी के किरदार ने जन्म लिया, जो बूढ़ा, नाटा, गंजा और साधारण शक्ल सूरत का था…पर उसका दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता था और उनके इस किरदार पर “चाणक्य” का प्रभाव पूरी तरह देखा जा सकता है.

जब तक चाचा चौधरी ‘लोटपोट’ में थे वे ठेट गंवई अंदाज में थे और धोती कुर्ता पहनते थे, छोटी मोटी समस्या हल करते थे फिर बाद में जब समस्याएं बढ़ने  लगी तो वो शहर में आ गए. बल की कमी को दूर करने के लिए ज्यूपिटर से साबू को बुलाया गया. जो हर मेहनत भरे काम को पूरा करने से पहले जय बजरंगबली का नारा लगता था. पर बाद में प्राण ने उसे भी “सेकुलर” बना दिया और वो बजरंगबली की जगह हूहू हूबा करने लगा.

चाचा के साथ उनका कुत्ता ‘रॉकेट’ और उनके हाथ में भीमसेनी लट्ठ सदा रहता था. सर पर लाल पगड़ी और घनी लम्बी सफेद मूछें उनकी खास पहचान थीं. चाचा चौधरी और साबू छोटी मोटी समस्याएँ हल करते रहते थे. उनके किरदार में गम्भीरता तब आयी जब डाकू राका ने ”वैद्य चक्रमाचार्य” की दवा पी ली और उसने पूरी दुनिया में आंतक मचा दिया. राका का किरदार उन्होंने “डायमंड कॉमिक्स” के 100 वें अंक के लिए रचा था. जिसे साबू और चाचा चौधरी बड़ी मुश्किल से काबू में कर पाते थे किंतु राका डायमंड कॉमिक्स के हर 100 वें अंक के साथ वापस लौट आता.

चाचा चौधरी भले ही दुनिया की हर समस्या हल कर हमेशा लड़ते झगड़ते रहते थे पर वे अपनी पत्नी बिन्नी और उसके बेलन से बहुत डरते थे.

कार्टूनिस्ट प्राण का जन्म कसूर नाम के कस्बे में 15 अगस्त 1938 को हुआ था जो अब पाकिस्तान में है. उनका पूरा नाम प्राण कुमार शर्मा था. विभाजन के बाद वे भारत आ गए और उन्होंने मुम्बई के “जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स” से डिग्री लेने के बाद दिल्ली से प्रकाशित दैनिक “मिलाप” से 1960 में उन्होंने अपने कार्टून केरियर की शुरुआत की. जबकि उनके पिता प्राण के कार्टून केरियर से नाराज थे और उनको समझाया था कि कार्टून बनाओगे तो इससे “न तो तुम्हारा घर चलेगा, न घर बसेगा”…पर प्राण अड़े रहे… इसके 9 साल बाद चाचा चौधरी का जन्म हुआ… दुनिया के हर कार्टून कैरेक्टर की तरह उनके कैरेक्टर्स की उम्र भी नही बढ़ी… पिंकी, बिल्लू आज भी बच्चे ही हैं जबकि पिंकी के प्रकाशन को 43 साल हो चुके हैं और यदि पिंकी सच में होती तो उसकी बेटी भी आज पिंकी की उम्र से अधिक की होती… बिल्लू की उम्र जरूर बढ़ी और वो बच्चे से किशोरावस्था में आ गया… पर वास्तव में आज वो 50 की उम्र को पार कर जाता..

इन कैरेक्टर्स के अलावा उन्होंने बजरंगी पहलवान, छक्कन, जोजी, ताऊजी, गोबर गणेश, डाकू धमाकासिंह, चम्पू, भीखू की भी रचना की. रमन और श्रीमतीजी भी उनके ही कैरेक्टर थे. रमन एक क्लर्क था जो मंहगाई और छोटी मोटी समस्याओं से जुझता रहता था. जिसके 2 और साथी थे मोगासिंह और खलीफा. एक सिख था तो दूसरा मुस्लिम और ये तीनों ही आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे लेकिन जब कोई बाहरी संकट आता था तो तीनों मिलकर उसका सामना करते थे. इसके द्वारा उन्होंने भारत के सेकुलरिज्म को बताया. 1980 में उनकी कॉमिक्स रमन हम एक हैं का लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था. इस घटना के बाद उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि उन्हें भारत का “वॉल्ट डिज्नी” कहा जाने लगा.

प्राण ने 10 भाषाओं में 500 से अधिक कॉमिक्स लिखे और 2 लाख से अधिक कार्टून बनाये. उनके योगदान को देखते हुए 2001 में “इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कार्टूनिस्ट” ने उन्हें “लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड” दिया. 3 साल पहले आज ही के दिन 6 अगस्त 2014 को कैंसर के कारण उनका निधन हो गया था. मृत्यु के उपरांत 2015 में उनको पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

प्राण और उनके कैरेक्टर्स ने कई दशकों तक करोड़ो लोगों को चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए मजबूर कर दिया. मृत्यु की तीसरी पुण्यतिथि पर सादर स्मरण. प्राण बचपन की स्मृतियों में हमेशा बसे रहेंगे.

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