Liu Xiaobo : दुनिया के राजनीतिक इतिहास में कम्युनिस्टों के दोगलेपन का सबसे बड़ा उदाहरण

4 जून 1989 को चीन की राजधानी बीजिंग के थ्यानमन चौक पर चीनी छात्र लोकतंत्र, स्वतंत्रता और विचार अभिव्यक्ति की आजादी की मांग करते हुऐ प्रदर्शन कर रहे थे. वे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था और अधिकार चाहते थे. जिसे कि चीनी सेना ने युद्धक टैंको से निर्दयता से रौन्द दिया था.

इस घटना में सैकड़ो छात्र मारे गये. इस आंदोलन के पीछे जिनके विचारों की शक्ति थी उनका नाम लियू शियाबायो था जो कि चीन के एक प्रोफेसर थे और अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में विजिटिंग स्कॉलर थे. वे चीन के छात्रों के इस आंदोलन में भाग लेने के लिए स्वदेश वापस लौट आए पर आते ही उनको गिरफ्तार कर लिया गया जहाँ से 2 साल बाद 1991 में उनको रिहा किया गया.

जेल से बाहर आते ही उन्होंने थ्यानमन चौक की घटना में शामिल लोगों की रिहाई का आंदोलन शुरू कर दिया तो उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया और 3 साल के लिए जेल में डाल दिया.

2008 में लोकतांत्रिक सुधारों के लिये उन्होंने एक घोषणा पत्र जारी किया जिसे चार्टर 08 के नाम से जाना जाता हैं. इस घोषणा पत्र के कारण उनको 25 दिसम्बर क्रिसमस के दिन फिर से गिरफ्तार कर लिया गया ताकि क्रिसमस होने के कारण अधिक लोगों का ध्यान इस ओर न जाये. ठीक 1 साल बाद इसी क्रिसमस के दिन उन्हें 2009 में 11 साल की सजा सुनाई गई.

उनके संघर्ष को देखते हुए लियू शियाबाओ को 2010 में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया लेकिन चीन ने उन्हें समारोह में जाने की अनुमति नही दी. 10दिसम्बर 2010 अंतर्राष्ट्रीय मानावाधिकार दिवस के दिन उन्हें ये पुरस्कार दिया गया. वे उस दिन भी जेल में ही थे, उन्हें “ओस्लो” जाने की अनुमति नहीं मिलने के कारण समारोह में उनकी “खाली पड़ी कुर्सी” पर पुरस्कार रखकर ये कार्यक्रम संम्पन्न किया गया.

जीवन के आखिरी 28 सालों में से 13 साल उन्हें जेल में ही बिताने पड़े. जेल में रहने के दौरान ही उन्हें लीवर केंसर हो गया लेकिन उन्हें इसके इलाज के लिये चीन से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गयी, जेल में ही रहते हुए 61 वर्ष की आयु में 13 जुलाई 2017 को उनकी मृत्यु हो गई..

15 जुलाई को उनका अंतिम संस्कार किया गया. तब चीन ने इतनी कृपा जरूर कर दी कि उनकी पत्नी, मित्र और निकट सम्बंधियो को अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति दे दी. लेकिन चीनी सरकार की क्रूरता यहीं खत्म नही हुई. उनके अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियों को समुद्र में बिखेर दिया गया ताकि उनकी स्मृति में कोई स्मारक भविष्य में न बना दिया जाये.

भारत में वामपंथियो का प्रिय नारा रहा है “आजादी”..

इनकी हर रैली, समारोह में जोर शोर से “रंग बिरंगी लफ्फाजी” और नाच-गाने, संगीत के साथ “आजादी” के नारे लगाए जाते हैं, छाती पीटी जाती हैं, कश्मीर, बंगाल, असम, केरल की आजादी के जयकारे लगाये जाते हैं… “अफजल की बरसी” से लेकर “महिषासुर शहादत दिवस” तक जोर शोर से मनाए जाते हैं… मां दुर्गा को अपशब्द कहे जाते हैं और ये सब किया जाता हैं ‘विचार अभिव्यक्ति की आजादी’ ओर ‘लोकतंत्र’ की दुहाई देकर… JNU इसका सबसे बड़ा गढ़ रहा हैं. भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और संगठन जोर शोर से कन्हैया छाप देशद्रोही छात्रों का हर स्तर पर पुरजोर तरीके से समर्थन करते हैं.

भारत में आजादी की मांग करने वाले “कामरेडो” और “लाल सलाम” की रट लगाने वाले वामपंथियों, कम्युनिस्टों, माओवादियों, मार्क्सवादियों, लेनिनवादियों, स्टालिनवादियों और JNU के युवा काम_रेडो ने ‘लियू शियाबाओ’ के इस सारे घटनाक्रम के बारे में एक शब्द नहीं बोला और पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साधे रहे क्योंकि बंधुआ मजदूर (भारतीय कम्युनिस्ट) कभी अपने मालिक (चीन) के खिलाफ नहीं बोला करते. और उनको सारी स्वतंत्रता, विचार अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र को खतरा केवल भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ही नजर आता है चीन जैसे साम्यवादी देश में नहीं!

दुनिया के राजनीतिक इतिहास में कम्युनिस्टो के दोगलेपन का इससे बड़ा दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY