नौनिहालों का भी ये मानवाधिकार कि योग्य उन्हें शिक्षा दें, नक़ल से इंटर पास शिक्षामित्र नहीं

बलिया जिले में एक स्टिंग हुआ. मास्टरनी जी से पूछा गया कि कला को अंग्रेजी में क्या कहते हैं. मास्टरनी जी ने बोर्ड पर ‘Cola’ लिख दिया. मास्साब से पूछा कि बताइए जनवरी की स्पेलिंग क्या है. गुरुवर ने लिख दिया ‘Janwari’. विद्यालय में किसी को 7 तक पहाड़े याद नहीं. मैडम जी को 69 और 89 में अंतर नहीं पता.

ये उप्र के एक विद्यालय की दुःखद तस्वीर है. इसी प्रकार एक स्टिंग हरदोई में हुआ. कमिश्नर साहब आये. चेकिंग की, मास्साब से पूछा – बताइए सर, प्रदेश का प्रधान कौन? सर नहीं बता पाए बेशर्मी से हँस दिए. मास्साब से कहा कि ‘कृतार्थ’ लिख कर दिखाइए. मास्साब ने जवाब में बेशर्म हँसी हँस दिए.

ये हाल है सरकारी प्राथमिक और उच्चतर शिक्षा का. विडम्बना यह है कि हम वन्दे भारत जगतगुरुम का पावन उद्घोष सदियों से कर रहे हैं. गर्व है हमें नालंदा और तक्षशिला की थाती पर. इन्हीं शिक्षकों के बल पर हम पुन: विश्व गुरु बनने का सपना देखते हैं.

अभी हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में शिक्षामित्रों की नियुक्ति को अवैध बता दिया. वो सारे शिक्षामित्र जो सहायक अध्यापक बन गए हैं उन्हें शिक्षक पात्रता परीक्षा देनी होगी. तभी उनका चयन वैध माना जायेगा. अन्यथा उन्हें अपनी नौकरी खोनी होगी.

कोई भी व्यक्ति जो शिक्षा की दुर्दशा से परिचित है इस कदम को उचित ठहराएगा. किन्तु ये विचलित करने वाला है कि स्वयं शिक्षकों का एक समूह इस सराहनीय निर्णय की भर्त्सना कर रहा है. इसे मानवता विरोधी बताया जा रहा है यहाँ तक कि उनकी रोटियों की दुहाई दी जा रही है.

सर्वप्रथम तो कपिल सिब्बल और उन जैसे कई कद्दावर वकीलों की फ़ौज खड़ी कर देने वाले शिक्षामित्र गरीब कैसे हो सकते हैं? द्वितीय ये गरीबी या मानवता का मामला है ही नहीं. और यदि है भी तो नौनिहालों का भी ये मानवीय अधिकार है कि उन्हें शिक्षा काबिल शिक्षकों से मिले, नक़ल से इंटर पास शिक्षामित्रों से नहीं.

वैसे भी अराजक लोगों को शिक्षक कहा भी नहीं जा सकता. एक गुरु के भाषण में मैंने सुना था कि शिक्षक दीपक की बाती की भांति स्वयं जलकर शिष्यों के भविष्य को प्रकाशित करते हैं. यहाँ तो ये लोग बस और रेल रोक रहे हैं. आत्महत्या कर रहे हैं, लूटपाट, यहाँ तक कि कत्ल तक की धमकी दे रहे हैं. ये किस प्रकार हमारे भविष्य को संभालेंगे?

कुछ सिरफिरों ने तो धर्म परिवर्तन तक की धमकी दे डाली. जैसे उच्चतम न्यायालय का निर्णय सिर्फ हिन्दुओं या ईसाईयों के लिए है. जिन कथित शिक्षकों को इतना भी नहीं पता कि कोर्ट का ये निर्णय धर्म के आधार पर नहीं है वो क्या बच्चों को समाज की शिक्षा दे पाएंगे.

एक मक्खी पत्रकार इन्हें सड़क पर जाने की सलाह दे रहे हैं चूँकि ये संख्या में अधिक हैं. संख्या में तो हत्यारे और बलात्कारी भी बहुत हैं सर. लगे हाथों उन्हें भी सड़क पर उतरने की सलाह दे ही डालिए न सर. और सड़क पर उतर कर ये क्या करें ? सड़क तोड़े? पटरी उखाड़े? बस और ट्रेन्स में आग लगा दें?

क्या आत्महंता हो जाएँ? यदि हाँ, तो क्या आप अराजकता का आह्वान नहीं कर रहे, ताकि समाचारों का थोडा सा गुड़ इकठ्ठा हो और आप जैसी गन्दी मक्खियाँ वहां भिनभिना सकें? थोड़ी तो शर्म कीजिये सर. मगर आपको क्यों आएगी सर…

ग़ालिब ने आप जैसे मक्खी पत्रकारों के लिए ही लिखा है –
काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब
शर्म तुमको मगर नहीं आती

हम उन सभी शिक्षकों के साथ हैं जो योग्य हैं क्योंकि भारत के भविष्य का निर्माण अनगढ़ हाथों से नहीं हो सकता. आप भी इस तथ्य को समझें और शिक्षक होने की निर्धारित न्यूनतम अर्हता को पूरा करने की कोशिश करें, क्योंकि शिक्षित शिक्षक ही सक्षम भारत का निर्माण कर सकता है.

अगर हम सच में वन्दे भारत जगतगुरुम का नारा पुन: आसमान में गुंजायमान होता देखना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत हमें कहीं न कहीं से तो करनी ही होगी. एक शुरुआत यहीं से सही.

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