धर्मनिरपेक्षता : संविधान के साथ राजनीतिक ‘नियोग’ का परिणाम

समसामयिक विमर्शों पर अर्थपूर्ण चर्चा के लिए इस पटल का सदुपयोग करने के उद्देश्य से एक विद्धवत मित्र से यह निश्चित हुआ था कि “राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, हिन्दू -राष्ट्रवाद एवं उसके भविष्य के प्रारूप” जैसे विषयों पर व्यापक मंथन प्रारंभ किया जाए.

यह भी निश्चित हुआ कि इस हेतु संदर्भ एवं प्रसंग का प्रारंभ 1947 की समयरेखा से किया जाए. मेरे प्रस्ताव को पर्याप्त सम्मान देकर मेरे प्रिय तेजस्वी मित्र ने विमर्श को 1947 से प्रारंभ किया और उसमें लोकप्रियता का एक आयाम और जोड़ते हुए अत्यंत ही पटुता से भारत गणराज्य के प्रधानमंत्रियों के कार्यकालों का सिंहावलोकन करते हुए 2019 तक अपने विश्लेषण को धाराप्रवाह प्रस्तुत करने में सफल रहे.

संभव है कि विमर्श के इस क्षेत्र में जंहा तर्क-वितर्क संभावित है ऐसे में मै उनसे इस शब्दद्वंद्व में प्रतिभागी बनने योग्य क्षमता नहीं रखता होऊँ यद्यपि मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे प्रिय विद्धवत मित्र इस विषय में विशालहृदयता धारण कर मुझे अनुग्रहित करेंगे.

आपने लेख 1947 से शुरू तो किया लेकिन चतुराई से वास्तविक प्रारंभ 2014 से ही किया. सभी के विषय मे पूर्ण परिदृश्य को आधार बनाया और मोदीजी के लिये केवल हिंदुत्व की कसौटी प्रस्तुत कर दी. मेरा आग्रह सबकुछ 1947 से ही प्रारंभ करने का था.

ताकि लोगों को यह भी समझ आये कि कैसे तत्कालीन कांग्रेसी भाग्य विधाताओं ने एक विचित्रतम विभाजन स्वीकार किया था जिसमें धर्म के आधार पर विभाजन तो हुआ किन्तु एक राष्ट्र तो मुस्लिम राष्ट्र बना और दूसरा” विचित्र “धर्म निरपेक्ष “.

किसी भी तथाकथित बुद्धिजीवी ने इस विषय पर कभी गंभीरता से सार्थक व्यापक विमर्श करने की आवश्यकता नहीं समझी बस उन महान नेताओ का “दर्शन प्रसाद ” समझ कर शिरोधार्य करने का आदर्श मात्र प्रस्तुत कर दिया.

लोगों को जानना चाहिए कि हिन्दुओं के मुख्य आराध्य त्रय में एक भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के जीर्णोद्वार पश्चात लोकार्पण के कार्यक्रम में प्रथम प्रधानमंत्री चाचा नेहरू ने कितना महान और कालजयी स्टैंड लिया था यह कहकर कि “इससे देश में धर्मनिरपेक्षता को लेकर सही संदेश नहीं जाएगा.” यद्यपि उनकी इस “राष्ट्रोपकारी “नसीहत को धता बताते हुए इसी समारोह में देश के प्रथम सर्वोच्च संवैधानिक शीर्ष राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी सगर्व सम्मिलित हुए थे.

वहाँ तो कोई मंदिर – मस्जिद विवाद नहीं था? एक विशेष मंदिर का जीर्णोद्धार का कार्यक्रम था फिर आखिर कैसे यह धर्मनिरपेक्षता को हानि पहुंचा रहा था?

अकारण नहीं था वह! क्योंकि उसी दिन जवाहलाल नेहरू ने स्वयं छद्म धर्मनिरपेक्षता के रुप में हिन्दुओं के दुर्भाग्य की पहली ईंट रख दी थी और यह सर्वथा झूठा नैरेटिव सेट कर दिया कि हिंदुत्व के किसी भी विग्रह का उत्थान भारत में धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक स्वरुप को क्षति पहुंचाएगा. जिसे कुछ समय बाद और विकृत करके ,”हिंदुत्व के विकास को अल्पसंख्यकों के पराभव, पीड़ा, असुरक्षा एवं दमन का स्वाभाविक कारक मान लिया गया.”

दुर्भाग्य से लाल बहादुर शास्त्री जैसे महापुरुष भी कांग्रेस की इस दुर्भाग्यपूर्ण पार्टीलाइन से इधर उधर नहीं हो पाये, सिवाय एक सोमवार के व्रत के.

लौह महिला इंदिरा जी भी हिंदुत्व के लिए सीधे कुछ भी नहीं कर पाई बल्कि उनकी मृत्यु एक और दुर्भाग्य साथ लेकर आई जिसने हिन्दुओं के सबसे समीपस्थ सिख धर्म (यद्यपि कोई भी हिन्दू इसे अलग धर्म नहीं मानता) को अकारण हिन्दू-सिख संघर्ष का नाम देकर शत्रु के रूप में स्थापित कर दिया, वह तो हिन्दू धर्म की संघर्षशीलता एवं उसका अतीतजन्य अनुभव था कि उसने इसे कांग्रेस-सिख के यथार्थ में परिवर्तित कर दिया और सिखों को हिन्दुओ का शत्रु होने से बचा लिया.

हाँ! संजय गांधी ने वास्तविक शक्ति के उपयोग का जो उदाहरण हिंदुहित में किया उसका यह धर्म आज तक अभिनंदन करता है और करता रहेगा, लेकिन उसे कांग्रेस या तत्कालीन शक्तिकेन्द्र की उपलब्धि तो नहीं कहा जा सकता.

राजीव गांधी द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मुद्दे को फिर से हवा देने का एकमात्र स्पष्ट कारण उनका बोफोर्स मामले में फंसा होना और उनकी लोकप्रियता में हुए अनअपेक्षित भारी क्षय की प्रतिपूर्ति करना मात्र था.

और फिर उन्ही ने वह महान काम किया जिसमें वे अपने नानाजी से भी आगे निकल गए, “शाह बानो प्रकरण “, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि इस विशिष्ट धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के मुस्लिम नागरिकों की निजी धर्म संहिता “शरीयत” भारत के नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत से टकराव के समय विधानों से उच्च मानी जायेगी और इसके लिये संविधान संशोधन के रूप में नैसर्गिक न्याय की जननी माने जाने वाले संविधान के साथ राजनीतिक “नियोग ” से भी पीछे नहीं हटा जाएगा.

नरसिम्हा राव के विषय में अवश्य कृतज्ञ मौन साधकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी जा सकती है. किन्तु यह भी स्मरण रहे कि उसके बाद के अटल जी के धर्मसहिष्णु एवं हिंदुहित के लिए किए गए निरापद दूरगामी प्रयासों के बाद पुनः सत्ता में आई कांग्रेस ने दस साल तक हिन्दुओं को अपने ही देश में दिन में तारे दिखा दिए थे.

कैसे इन दस वर्षों को स्किप किया जा सकता है बंधु?

जब न्याय के किसी भी निकृष्टतम प्रारूप से भी अनापेक्षित, “लक्षित साम्प्रदयिक हिंसा अधिनियम” के रूप में हिन्दुओं को कानूनन प्रतिरोधहीन एवं संघर्ष की स्थिति में निर्णायक रुप से पूर्णतः अक्षम बना देने का कुत्सित प्रयास अपने चरम पर था.

स्पष्ट रुप से हिन्दुओं के कानूनन नरसंहार को संविधान बनाया जाना तय था यदि मोदी के नेतृत्व में यह राष्ट्रवादी सरकार नहीं बनती तो. याद तो होगा महानतम अर्थशास्त्री जी के अनमोल वचन हिंदुओं एवं राष्ट्र की समस्याओं के लिए तो, “मेरे हाथ मे कोई जादू की छड़ी नहीं है.” और अल्पसंख्यकों के लिए संजीवन से भी महान कालजयी वचन, “देश के समस्त संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है.”

समझ सकते हैं इस भेदभाव की चरम मनोवृति को कि किस तरह से हिंदुबाहुल्य वाले इस सनातन राष्ट्र में हिन्दुओं को ही बलात “नियोग” निषेचित, संकरित संविधान के द्वारा दीन, हीन एवं निर्बल बनाये जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा था.

हां ! यह हिन्दू समाज कृतज्ञ है नरेंद्र दामोदरदास मोदी एवं मोहन भागवत का जिसने हीनभाव से ग्रसित हताश हिन्दुओं को आत्मबल और जिजीविषा से संचित किया फलतः हिन्दू अपने आत्मगौरव के लिए उठ खड़े हुए और देश ने स्वतंत्रता के पश्चात पहली बार पूर्ण सक्षम दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी सरकार को संसद में अपराजेय कार्यरत रूप में देखा.

अब बात करते हैं मोदी की!

यहाँ मैं आपसे सहमत हूँ कि मोदीजी के समक्ष हिंदुत्व के उत्थान के एक ऐसे प्रारूप के विकास की अपेक्षा है जो हिन्दुओं को अपना ऐतिहासिक आत्मगौरव पुनः प्रदान करें और सम्पूर्ण राष्ट्र को उचित वातावरण में श्रेष्ठता के पथ पर भी अग्रसर कर सकें.

और यहीं एक और दुष्प्रचारित नैरेटिव हमारे सामने आ खड़ा होता है” हिंदुत्व एवं विकास के पूरक” होने का. इसे भी बड़ी चतुराई से आरोपित किया गया है, “चित भी मेरी और पट भी मेरी” की तर्ज पर, कांग्रेस के इस दुष्प्रचार की ही बदौलत जनता में यह असमंजस रहा है कि भाजपा सरकारे जो हिंदुत्व पर जोर देंगी वे विकास के अपने लक्ष्य को कभी प्राप्त ही नहीं कर पाएंगी और साम्प्रदायिकता के आरोपों के विपक्षी जाल में उलझी हुई रह जाएंगी.

गुजरात में मोदी ने 3 बार के शासनकाल से इस भ्रम का पूर्णरूपेण परिमार्जन कर दिया और हिंदुत्व के साथ विकास की अवधारणा को उत्कर्ष पर प्रतिष्ठित कर दिया जिसके पारितोष में ही उन्हें जनता ने पूर्ण एवं स्पष्ट जनादेश के साथ देश की बागडोर सौंप दी.

आज भारत के प्रधानमंत्री विदेशी दौरों पर सगर्व भगवदगीता बांटते हैं और वे विभूतियां इसे गर्व के साथ स्वीकार करके कृतार्थ अनुभव करती हैं, यह है मोदी का हिंदुत्व.

आज उसी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का प्रधानमंत्री केदारनाथ की प्रथम पूजा में सम्मिलित होकर अभिषेक करता है और मीडिया में गर्व के साथ पीताम्बर, त्रिपुण्डन एवं रुद्राक्षमय होकर प्रकट होता है, यह है मोदी का हिंदुत्व.

चुनोतियाँ भी कई आई हैं और आएंगी क्योंकि यह एक संपूर्ण युद्ध है जिसमें शत्रु भी अत्यंत बलिष्ट एवं दुष्ट है.

अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले को उनकी छत्रछाया में विकसित हिंदुत्व के शरीर पर आई एक चोट अवश्य कहूंगा जिसे वर्तमान में हुए दुष्ट संहारों के अभियान से भर तो दिया गया है लेकिन पूर्ण राहत तभी मानी जायेगी जब मोदी ऐसा उपाय करेंगे कि वे “ऐसा फिर से करने की सोच भी ना सके”.

अब प्रश्न यह है कि आखिर क्यों हिन्दुओं को अपने आत्मगौरव एवं उत्थान के उद्देश्यों को अनावृत रखने की विवशता है? केवल इसलिए कि कुछ बुद्धिपिशाच उसे अनुचित रूप से विकृत निरूपण करके फिर से नये नैरेटिव आरोपित कर देंगे जिसका नुकसान हिंदुत्व, भाजपा और मोदी की छवि को होगा और वही आगे चलकर फिर से चुनावों में सत्ता की क्षति के रूप में सामने आ सकता है?

यदि ऐसा है तो मैं उन समस्त हिन्दू राष्ट्रवादियों से यह कहना चाहूँगा कि ऐसा करके आप स्वयं हिंदुत्व की अवधारणा को संदेहास्पद बना रहे हैं. आखिर क्यों हम हिन्दू एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत नहीं करते जिसमें हमारे हिंदुहित के मनोरथ विश्व के समक्ष प्रस्तुत हो सके और ना केवल वे परिपूर्ण हो बल्कि विश्व को जनकल्याण की नई दिशा प्रदान करें.

जब महाशक्ति एवं धर्मनिरपेक्षता का अग्रोहा होकर अमेरिका अपनी मुद्रा पर लिख सकता है, “In God we trust”,
जब इंडोनेशिया घोषित मुस्लिम राष्ट्र होकर अपनी मुद्रा पर गणेश जी को स्थान दे सकता है,
तो भारत क्यो अपने सनातन धर्म प्रतीकों को लेकर हीन भाव अनुभव करता है?
क्या गणेश जी के चित्र वाले नोट उपयोग में लेने वाले इंडोनेशियाई मुस्लिमों को हज करने नहीं जाने दिया जाता?
फिर क्यों भारत के इस विचित्र धर्मनिरपेक्षता के सांचे में हमारे आदर्श देव भी फिट नहीं बैठते?
कब तक हम इन प्रश्नों से बचेंगे?
क्या यह बेहतर समय नहीं है कि जब हम एक आदर्श हिन्दू प्रारूप को लेकर चर्चा करें, इतिहास के स्वर्णिम पन्नों से उत्कृष्ट उद्धरणों एवं तत्कालीन प्रचलित व्यवस्थाओं के संदर्भो का सदुपयोग आज की नवव्यवस्थाओं के निर्माण में करें.

मैं समझता हूं कि इसपर व्यापक विमर्श अपेक्षित है, हमें भी सदा चुनाव के मोड़ में रहने की आवश्यकता नहीं है और ना ही अनावश्यक सफाइयां देते रहने की, और मौन रहने का अपराध तो बिल्कुल ना करें, अपने स्तर पर अपने धर्मगौरव को स्मरण कर यथायोग्य प्रतिकार एवं अभिव्यक्ति अवश्य दर्ज करवाएं.

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