कुण्डलिनी, चक्र, विविध शरीर व प्राणायाम

हठयोगप्रदीपिका आदि ग्रन्थों में उल्लिखित चक्रों व कुण्डलिनी के वर्णन को पढ़कर बहुत लोगों को इस विषय में कौतुहल हो जाता है. यह स्वाभाविक ही है. किन्तु समस्या तब होती है जब यह सब पढ़कर “निष्कर्ष व क्रियाएँ” तय कर ली जाती हैं क्योंकि साधना की किसी भी धारा के ग्रन्थ में सब कुछ नहीं लिखा जाता. बहुत कुछ श्रुति परम्परा से चला आ रहा होता है. उन श्रुतियों से अनभिज्ञ व्यक्ति केवल ग्रन्थ को पढ़कर रहस्य को ठीक-ठीक नहीं जान सकता और उस विषय में क्रियाशील होते ही अवश्य ही अपनी अस्थायी अथवा स्थायी हानि कर बैठता है. इन हानियों से बचाने हेतु एक परम्परागत चेतावनी दी जाती रही है कि
सम्बन्धित साधना के पूर्वदीक्षित समर्थ गुरु से क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करें.

अस्तु एक मित्र की जिज्ञासा के कारण इस विषय पर लिखा जा रहा है.

चक्रों की संख्या ६, ७, ८, अथवा ९ बताई गई है. अन्य संख्याएँ भी हो सकती हैं. सर्वाधिक प्रचलित संख्या ७ है. धरातल पर सीधे खड़े/बैठे मानव के शरीर में अवरोही क्रम में निम्नोक्त ७ चक्र बताए गए हैं जिनमें विविध शक्तियाँ अन्तर्निहित कही गई हैं –

सहस्रार चक्र ⇒ मुक्ति
आज्ञा चक्र ⇒ विवेक, स्वयं पर नियन्त्रण व सभी में आत्मभाव
विशुद्धि चक्र ⇒ स्वानुभूति व सत्यनिष्ठा
अनाहत चक्र ⇒ प्रेम, भक्ति व सहानुभूति
मणिपूर चक्र ⇒ अकेले होने, खतरा उठाने, दाँव लगाने, सन्देह व तर्क करने, अन्धविश्वास त्यागने आदि का सामर्थ्य
स्वाधिष्ठान चक्र ⇒ जिजीविषा, क्रोध, लोभ, मोह आदि पशुभाव, पथ्यापथ्य-बोध व सन्तोष
मूलाधार चक्र ⇒ रति

अर्थात् उपर्युक्त में से किसी गुण का अभाव सम्बन्धित चक्र के सुषुप्त होने का सूचक है.

शरीर को काटने पर ये ७ चक्र दिखाई नहीं पड़ते क्योंकि ये स्थूल शरीर में नहीं प्रत्युत सूक्ष्म शरीर में होते हैं किन्तु स्थूल शरीर में इनके संगत बिन्दु (corresponding points) अवश्य होते हैं जो वस्तुत: अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ (endocrine glands) हैं. यह अविस्मरणीय है कि प्रत्येक अन्त:अंग अन्त:स्राव भी करता है. पुन: देखें –

सहस्रार चक्र ⇒ मस्तिष्क (brain)
आज्ञा चक्र ⇒ पीनियल व पिट्युटरि ग्रन्थियाँ (Pineal and Pituitary glands)
विशुद्धि चक्र ⇒ थायरॉइड व पैराथायरॉइड ग्रन्थियाँ (Thyroid and Parathyroid glands)
अनाहत चक्र ⇒ हृदय (Heart)
मणिपूर चक्र ⇒ नाभिमूल अथवा धरन (Umbilicus)
स्वाधिष्ठान चक्र ⇒ मूलाधार व मणिपूर के मध्य में
मूलाधार चक्र ⇒ शुक्राशय (Seminal vesicle) अथवा योनि (Vagina)

स्वाधिष्ठान व मणिपूर को एक ही चक्र मानने पर ६ चक्र होते हैं. मणिपूर व अनाहत के मध्य में एक चक्र लेने पर ८ चक्र होते हैं. ब्रह्मरन्ध्र के ठीक ऊपर एक और चक्र लेने पर ९ चक्र होते हैं. शिशु की खोपड़ी में ऊपर की ओर जहाँ त्वचा स्पन्दित होती दिखती है, उसे ब्रह्मरन्ध्र कहा गया है.

यह ध्यातव्य है कि उपर्युक्त ग्रन्थियाँ “चक्रों के संगत बिन्दु” हैं न कि स्वयमेव चक्र. इन बिन्दुओं को ही चक्र कहना काव्य (Poetry) है किन्तु ऐसा ही समझना छद्म विज्ञान (Pseudo-science) की कोटि में आता है. यथा नाभिमूल को ही मणिपूर चक्र समझना, हृदय को ही अनाहत चक्र समझना, पीनियल को ही आज्ञा चक्र समझना आदि. अस्तु ऐसा समझना अवश्य निरापद है कि कोई चक्र व उसका संगत बिन्दु परस्पर प्रभावकारी होते हैं.

प्राय: ७२००० नाडियाँ कही गई हैं किन्तु शिवसंहिता में इनकी संख्या ३५०००० बताई गई है जिनमें १४ प्रमुख हैं. इनके नाम हैं – सुषुम्ना, इडा, पिंगला, गान्धारी, हस्तिजिह्विका, कुहू, सरस्वती, पूषा, शंखिनी, पयस्विनी, वारुणी, अलम्बुषा, विश्वोदरी व यशस्विनी. इनमें प्रथम तीन प्रमुख हैं और इन तीनों में भी सुषुम्ना प्रमुख है. चक्रवत् ये भी सूक्ष्म शरीर में होती हैं.

सार्द्धलक्षत्रयं नाड्यः सन्ति देहान्तरे नृणाम्.
प्रधानभूता नाड्यस्तु तासु मुख्याश्चतुर्दश॥
सुषुम्नेडा पिंगला च गान्धारी हस्तिजिह्विका.
कुहूः सरस्वती पूषा शंखिनी च पयस्विनी॥
वारुण्यलम्बुषा चैव विश्वोदरी यशस्विनी.
एतासु त्रिस्रो मुख्याः स्युः पिंगलेडासुषुम्निकाः॥
(शिवसंहिता २-१३,१४,१५)

मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) के कशेरुकों (मनकों) के मध्य में छेद होता है जिससे होकर मेरु-रज्जु निकलती है जो तन्त्रिका तन्त्र का एक महत्त्वपूर्ण भाग है. “सुषुम्ना” नाडी इसी मेरु-रज्जु में अवस्थित कही जाती है. मेरु-रज्जु के बाहर उससे लिपटी दो अन्य नाडियाँ “इडा व पिंगला” बताई गई हैं. जब नाक का वाम स्वर चलता है तब इडा सक्रिय कही जाती है और जब दक्षिण स्वर चलता है तब पिंगला सक्रिय कही जाती है. जब दोनों स्वर समानरूपेण चल रहे हों तब सुषुम्ना सक्रिय कही जाती है. चक्रों को सुषुम्ना नाडी में अवस्थित बताया गया है. सुषुम्ना ही समस्त चक्रों को ऊर्जा प्रदान करती है और उन्हें सक्रिय रखती है. तीनों ही प्रमुख नाडियाँ मूलाधार चक्र से निकलती हैं जहाँ “कुण्डलिनी शक्ति” (मौलिक काम-ऊर्जा) सुषुप्तरूपेण अवस्थित कही गई है. कुण्डलिनी शक्ति चक्रों को “अतिरिक्त ऊर्जा” प्रदान कर सकती है किन्तु इसके लिए इसे जाग्रत होना होगा. विशेष घटनावश कभी-कभी अल्पकाल के लिए कुण्डलिनी जाग्रत भी हो जाती है. उस समय की अनुभूति अति असामान्य होती है. कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होने पर ऊपर उठती है और किसी सुषुप्त चक्र को जाग्रत भी कर सकती है. जाग्रत चक्र ही पूर्णत: सक्रिय होता है. जो चक्र एक बार पूर्ण वेग से चलने लगता है वह पुन: नहीं रुकता. पूर्ण वेग से चलते चक्र को पूर्ण विकसित पुष्प की उपमा दी जाती है. किशोरावस्था आते-आते सभी सहज (normal) लोगों का मूलाधार चक्र अवश्य जाग्रत हो जाता है और प्राय: यही चक्र पूर्णत: सक्रिय हो पाता है. समस्त चक्रों के जाग्रत व पूर्णत: सक्रिय हो जाने पर मनुष्य “कृतार्थ अथवा कृतकृत्य” कहलाता है.

कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में अवस्थित होती है, अत: रतिविषयक किञ्चिदपि विकृति साधना में उन्नति को अशक्य (impossible) बना देती है. कामविकृति (sexual abnormality) को “अपरति” भी कहा गया है. प्रमुखत: इसके ४ रूप हैं –
१. पूर्ण क्लीवता.
अर्थात् बाह्य कृत्य व संवेदन (sensation) दोनों की अक्षमता.
२. संवेदन की क्षमता तथा बाह्य कृत्य की अक्षमता.
अर्थात् इच्छाओं की उपस्थिति किन्तु उनकी तृप्ति की अशक्यता.
३. बाह्य कृत्य की क्षमता किन्तु संवेदन का पूर्ण अभाव.
४. विकृत बाह्य कृत्य होने पर ही संवेदन होना.

किसी समुदाय में उपर्युक्त रूपों की उपस्थिति का आधिक्य उसके आध्यात्मिक उन्नति हेतु अयोग्य होने का सूचक होता है. अत: साधक को प्रारम्भ से ही (from the very beginning) रतिविषयक किसी भी “मौलिकता” विचित्र रुचियों, विचित्र इच्छाओं अथवा भयों, सञ्कोचों आदि का सर्वथा परित्याग कर देना चाहिए. सहज रति (normal sex) को “उत्तमा रति” भी कहा गया है क्योंकि इसके २ परिणाम हैं – प्रेम व वैराग्य. ये दोनों ही आध्यात्मिक उन्नति करने वाले हैं.

यह अविस्मरणीय है कि कुण्डलिनी का जागरण साधना की सफलता हेतु अनिवार्य अथवा वाञ्छित नहीं है. बहुत-से साधक कुण्डलिनी के जाग्रत हो जाने पर उसे सँभाल नहीं पाते और अपने मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं क्योंकि कुण्डलिनी कल्पना में ले जाती है और कल्पना को नियन्त्रित करना अति दुष्कर हैै. कल्पना से बचकर रहना अपेक्षाकृत सरल होता है. केवल सुषुम्ना की सहायता से भी साधना पूरी की जा सकती है. इस साधना में जैसे-जैसे उन्नति होती जाती है वैसे-वैसे कुण्डलिनी जाग्रत होती जाती है अर्थात् जो चक्र जाग्रत कर लिया जाता है उस तक कुण्डलिनी उठ जाती है. इस साधना में “चैतन्यवृद्धि” (growth of consciousness) व “अन्तरात्मा के जागरण” (awakening of conscience) की चेष्टा की जाती है. यह साधना “राजयोग” कहलाती है. इसे “अष्टांग योग” भी कहते हैं. यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि – इसके ८ अंग हैं. प्रथम ५ अंगों का समूह “बहिरंग” कहलाता है तथा शेष ३ अंगों का समूह “अन्तरंग”. बहिरंग साधन है तथा अन्तरंग साध्य है. भगवान् श्रीकृष्ण ने राजयोग को “आत्मसंयमयोग” कहा है. गीता के चतुर्थ अध्याय के २७वें श्लोक में इसका संकेत है तथा षष्ठ अध्याय में इसका विधिसहित वर्णन है. चैतन्यवृद्धि व अन्तरात्मा का जागरण समस्त साधनाओं का अनिवार्य अंग है. राजयोग में इस पर सीधे ही (directly) कार्य किया जाता है तथा अन्यों में प्रकारान्तर से (indirectly).

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे.
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥
(गीता ४-२७)

एक अन्य साधना में मूलाधार चक्र के जाग्रत होने के पूर्व ही आज्ञा चक्र को जाग्रत करने की तथा मूलाधार चक्र की जाग्रति को टालने की चेष्टा की जाती है. इसे “हठयोग” कहा गया है. हठयोग के अनुसार अनियन्त्रित शरीर में कोई भी साधना पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकती. हठयोग को “इन्द्रियसंयमयोग” कहा जा सकता है. गीता के चतुर्थ अध्याय के २६ वें श्लोक में इसका संकेत है.

श्रोत्रादीनिन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति.
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥
(गीता ४-२६)

श्रीभगवान् के अनुसार हठयोग का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है. यह राजयोग के “बहिरंग” का परिपूरक (supplementary) है अत: इसका साधक यदि राजयोग से बचता है तो वह मूढ व मिथ्याचारी होता है. अर्थात् हठयोग “बहिरंग राजयोग” का ही विस्तार मात्र है.

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्.
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते॥
(गीता ३-६)

“साँख्ययोग” भेदसहित सम्यक् ज्ञान (right knowledge) व बोध (understanding) पर आधारित है. इसमें राजयोग की समस्त विधियों का यथावश्यक उपयोग किया जाता है.

श्रुति, स्मृति तथा लोक व निर्दिष्ट स्वकर्मों को करना “कर्मयोग” है. अनासक्त होकर इसका पालन करने वाला आत्मवान् होता है तथा किसी भी साधना में शीघ्र उन्नति करता है.

श्रीभगवान् के अनुसार राजयोग का भी स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है. वह साँख्ययोग व कर्मयोग का परिपूरक है. श्रीभगवान् के अनुसार साँख्ययोग व कर्मयोग में केवल इतना भेद है कि प्रथम की साधना वैराग्य होने पर कर्म को त्यागकर अर्थात् संन्यास लेकर होती है जबकि द्वितीय की साधना कर्मयोगपूर्वक होती है.

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ.
ज्ञानयोगेन साँख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
(गीता ३-३)

श्रीभगवान् के अनुसार अधिकांश लोग कर्मयोग से ही उन्नति करते हैं और जो लोग साँख्ययोग से लाभान्वित होते हैं वे वस्तुत: पूर्वजन्मों में कर्मयोग पर चल चुके होते हैं. अर्थात् कर्मयोग अपरिहार्य है तथा साँख्ययोग “कर्मयोग रहित राजयोग” ही है.

सन्न्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयस्करावुभौ.
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते॥
(गीता ५-२)

“भक्तियोग” अनाहत चक्र पर केन्द्रित होता है. यह राजयोग का विकल्प है. अर्थात् राजयोग की ही भाँति यह भी कर्मयोग का परिपूरक है. यह “कर्मयोग” से मिलकर अवश्यमेव फलदायक होता है. इन दोनों को संयुक्तरूपेण “महायान” कहा गया है अर्थात् “सर्वाधिक लोगों के लिए कल्याणकारी”. बौद्धों का महायान तो कथनमात्र ही महायान है.

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते.
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता॥
(गीता १२-२)

अर्थात् “जो मुझमें मन को एकाग्र करके मेरी उपासना करते हैं उन्हें मैं श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त, सदा योगयुक्त तथा योगिओं में भी श्रेष्ठ मानता हूँ.”

अस्तु जीव के पञ्च कोश कहे गए हैं. “स्थूल शरीर” (Physical body) को “अन्नमय कोश” कहा गया है. शरीर के धातुओं, रक्त, श्वास-प्रश्वास आदि की चालिनी प्राणापानादि शक्तियों सहित समस्त इन्द्रियों को “सूक्ष्म शरीर” (Astral body) अथवा “प्राणमय कोश” में अवस्थित कहा गया है. मन को “मनस् शरीर“ (Mental body) अथवा “मनोमय कोश” में अवस्थित कहा गया है. बुद्धि को “कारण शरीर” (Causal body) अथवा “विज्ञानमय कोश” में अवस्थित कहा गया है. आत्मा को “आनन्दमय कोश” में अवस्थित कहा गया है. इन कोशों अथवा शरीरों को रथ के अवयवों की उपमा दी गई है.

स्थूल शरीर “रथ” है.
सूक्ष्म शरीर “अश्व” है.
मन “प्रग्रह” (लगाम) है.
बुद्धि “सारथी” (कोचवान) है
तथा आत्मा “रथी” (सवारी) है.

श्वास-प्रश्वास के नियन्त्रण से प्राणापानादि नियन्त्रित होते हैं. प्राणापानादि के नियन्त्रण से इन्द्रियाँ नियन्त्रित होती हैं. इन्द्रियों के नियन्त्रित होने से मन नियन्त्रित होता है तथा मन के नियन्त्रित होने से बुद्धि नियन्त्रित होती है जिसका फल समाधि है.

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:.
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:॥
(गीता ४-४२)

नासिका से भीतर व बाहर जाती वायु को क्रमश: श्वास व प्रश्वास कहा गया है. गीता में उनकी संचालिका शक्तियाँ क्रमश: प्राण व अपान कही गई हैं. अन्यत्र मल-मूत्र-रेतस् आदि का निष्कासन करने वाली शक्ति को अपान कहा गया है. क्रमश: १० प्राण कहे गए हैं – प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त व धनञ्जय.

प्राणायाम सूक्ष्म शरीर पर नियन्त्रण का प्रमुख साधन है. इसी कारण साँख्ययोग, राजयोग व हठयोग में “प्राणायाम” को अनिवार्य बताया गया है. किन्तु समर्थ गुरु के निर्देशन में ही इसका अभ्यास करें अन्यथा रुग्ण हो सकते हैं.

तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:. (योगसूत्र २-४९)

अर्थात् “आसन लगाकर श्वास व प्रश्वास की गति में विच्छेद करना प्राणायाम है.”

श्वास की गति अनायास ही चलती है. उसे आयासपूर्वक चलाना उसकी गति में विच्छेद करना है.

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभि: परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्म:. (योगसूत्र २-५०)

अर्थात् “बाह्यवृत्ति (रेचक), आभ्यन्तरवृत्ति (पूरक) व स्तम्भवृत्ति (कुम्भक) इन तीन क्रियाओं वाला प्राणायाम देश, काल व संख्या के आधार पर दीर्घ अथवा सूक्ष्म होता है.”

सायास श्वास छोड़ना बाह्यवृत्ति है.
श्वास भरना आभ्यन्तरवृत्ति है.
श्वास जहाँ हो, वहीं उसे रोक देना स्तम्भवृत्ति है. यह स्तम्भवृत्ति का प्रधान भेद है जिसे केवलस्तम्भवृत्ति (केवलकुम्भक) भी कहते हैं. केवलस्तम्भवृत्ति द्वारा विचार-प्रवाह को तत्क्षण रोका जा सकता है.

स्तम्भवृत्ति के दो अन्य गौण भेद भी हैं. श्वास को बाहर ही रोक देना बाह्यस्तम्भवृत्ति (बाह्यकुम्भक) है जो रेचकपूर्वक होती है तथा श्वास को भीतर ही रोक देना अन्त:स्तम्भवृत्ति (अन्त:कुम्भक) है जो पूरकपूर्वक होती है. अन्त:स्तम्भवृत्ति की तुलना में बाह्यस्तम्भवृत्ति अधिक लाभकारी होती है. यही कारण है कि “रेचक व बाह्यकुम्भक” का अभ्यास अपेक्षाकृत अधिक किया जाता है. अधीरता (nervousness) को तत्काल दूर करने हेतु इन दोनों का प्रयोग किया जाता है. शास्त्रों में भी रेचक व बाह्यकुम्भक का ही अधिक उल्लेख प्राप्त होता है. मूलबन्ध, उड्डीयान बन्ध व जालन्धर बन्ध भी बाह्यकुम्भक के साथ ही लगाए जाते हैं. अधीरता व कामवेग के नियन्त्रण हेतु मूलबन्ध को सर्वाधिक प्रभावी कहा गया है. मूलबन्ध लगाए बिना पूरक व अन्त:कुम्भक करने से इन ४ व्याधियों की शक्यता होती है – हर्निआ, स्वप्नदोष, अर्श (बवासीर) व हृदयाघात. अत: प्राणायाम का अभ्यास आरम्भ करने के पूर्व बन्धों का अभ्यास अनिवार्य है.

“देश” से तात्पर्य है कि हिमालयादिवत् शीतल व उच्च देश में प्राणायाम करना. देश का अन्यार्थ है – शरीर का स्थानविशेष, जिस पर ध्यान को एकाग्र करके प्राणायाम किया जाता है.

“काल” से तात्पर्य है कि तारों की उपस्थिति में अथवा सूर्य की अनुपस्थिति आदि में प्राणायाम करना. काल का अन्यार्थ है – मुहूर्तादि अवधिविशेष, जब तक प्राणायाम किया जाता है.

“संख्या” से तात्पर्य है कि पूरक, रेचक अथवा कुम्भक करते समय एक निश्चित संख्या में ॐ अथवा अन्य शब्द अथवा कोई मन्त्र कहना.

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थ:. (योगसूत्र २-५१)

अर्थात् “बाहर अथवा भीतर जाती श्वास को विपरीत दिशा में ले जाना प्राणायाम की चौथी क्रिया है.”

तत: क्षीयते प्रकाशावरणम्. (योगसूत्र २-५२)

अर्थात् “प्राणायाम से प्रकाश (ज्ञान) का आवरण (मोहादि-दोष-समुच्चय) क्षीण हो जाता है.”

धारणासु च योग्यता मनस:. (योगसूत्र २-५३)

अर्थात् “और मन विविध विषयों पर एकाग्र होने की योग्यता पा लेता है.”

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे.
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा:॥
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति.
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा:॥
(गीता ४-२९,३०)

अर्थात् “कुछ यज्ञकर्ता अपान (प्रश्वास) में प्राण (श्वास) की आहुति देते हैं
(अर्थात् बाह्यकुम्भक का अभ्यास करते हैं),
तथा कुछ यज्ञकर्ता प्राण में अपान की आहुति देते हैं
(अर्थात् अन्त:कुम्भक का अभ्यास करते हैं),
और प्राणायामरूपी यज्ञ में संलग्न कुछ अन्य निश्चित आहार-विहार वाले यज्ञकर्ता प्राण व अपान की गतियों को रोककर प्राणों में प्राणों की ही आहुति देते हैं
(अर्थात् केवलकुम्भक अथवा बाह्यान्तरविषयाक्षेपी प्राणायाम का अभ्यास करते हैं).
ये सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं तथा यज्ञ द्वारा पापों का नाश करने वाले हैं.”

श्रीभगवान् ने “नाडीशोधन प्राणायाम” (कथित अनुलोम-विलोम प्राणायाम) को भी अति महिमावान् बताया है.

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो:.
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण:.
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स:॥

अर्थात् “बाह्य विषयों को बाहर ही करके,
दृष्टि को दोनों भौओं के मध्य में करके,
नासिका में विचरने वाले प्राण व अपान को सम करके,
नियन्त्रित मन व बुद्धि वाला,
मोक्ष की चेष्टा में संलग्न
इच्छा, भय व क्रोध से रहित जो मुनि है
वह सदा मुक्त ही है.”

नाडीशोधन प्राणायाम न केवल सर्वाधिक सरल व सर्वाधिक प्रभावकारी प्राणायाम है अपितु वह आरम्भ में अनिवार्य भी होता है. इसे सहजरूपेण करना चाहिए अर्थात् बलप्रयोग नहीं करना चाहिए. इसमें श्वास भरने की अपेक्षा श्वास छोड़ने पर किञ्चित् अधिक बल देना चाहिए.

प्राणायाम से मन की प्रसन्नता भी होती है. एक प्रसन्न मन सहजतया साधना में संलग्न हो जाता है.

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्.
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य.
(योगसूत्र १-३३,३४)

अर्थात् “सुख, दु:ख, पुण्य व अपुण्य विषयों में क्रमश: मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न होता है.”
“अथवा प्राण को छोड़ने व धारण करने से चित्त प्रसन्न होता है.”

यद्यपि प्राणायाम आसनस्थ होकर (बैठकर) किए जाते हैं तथापि खड़े होकर भी प्राणायाम किए जाते हैं जिनका प्रयोजन कर्मेन्द्रियों पर नियन्त्रण व स्वास्थ्य-संवर्धन होता है. ऐसे प्राणायाम अंग-चालन-सहित किए जाते हैं. यथा सूर्य-नमस्कार आदि.

मनुस्मृति में भी प्राणायाम की प्रशंसा की गई है.

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मला:.
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषा: प्राणस्य निग्रहात्॥
(मनुस्मृति ६-७१)

अर्थात् “जिस प्रकार गर्म किए जाते हुए धातुओं के मल दग्ध हो जाते हैं उसी प्रकार प्राण के निग्रह से इन्द्रियों के दोष दग्ध हो जाते हैं.”

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते….

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