मैकमोहन रेखा और एशिया के 2 महादेशों का रक्तरंजित संघर्ष

चीन के कब्जे से पहले तिब्बत एक स्वतंत्र देश था दूसरी ओर कुमाऊं और गढ़वाल भी स्वतंत्र राज्य थे. इतिहास में तिब्बत और गढ़वाल राज्यों के बीच मित्रता और शत्रुता के मिले जुले सम्बन्ध थे. आपस में युद्ध और व्यापार चलते रहते थे.

गढ़वाल में तिब्बत को हूणदेश और तिब्बतियों को हूण या हूणिया कहा जाता था. एक बार गढ़नरेश “महिपति शाह” ने तिब्बत के “दापागढ़” के बौद्ध विहार पर पर कब्जा कर अपने सेनापति “भीमसिंह” के भाई को वहां का प्रशासक नियुक्त कर दिया. लेकिन उस समय गढ़वाल के “आयुधधारी क्षत्रिय” एक दूसरे के हाथ का बनाया हुआ खाना नहीं खाते थे और खाना बनाते समय “केवल लंगोट” पहनते थे. इस कमजोरी का लाभ उठाकर तिब्बती सैनिकों ने गढ़वाली सैन्य शिविर पर हमलाकर खाना बना रहे लंगोटधारी सैनिकों को मार डाला और तिब्बत गढ़वाली नियत्रंण से स्वतंत्र हो गया.

कालान्तर में सहअस्तित्व की भावना से दोनों राज्यों में व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध भी बने. भारत के व्यापारी नेलंग-जादुंग, नीती-माणा और मिलम क्षेत्र से तिब्बत की मंडियों मे अनाज, कपड़ा, औषधियां और अन्य सामान पहुंचाते थे. बदले में वहां से ऊन, हींग और चट्टानी नमक जैसी सामग्री गढ़वाल और कुमाऊं लाते थे. परंतु सीमा विवाद तब भी बना हुआ था.

अंग्रेजों के आगमन के बाद भी यह सीमा विवाद बना रहा तो ब्रिटिश शासन ने इस विवाद को हल करने के लिये 1914 में भारत-तिब्बत सीमा को तय करने के लिये एक समझौता तिब्बत के साथ किया. इस समझौते के आधार पर भारत-तिब्बत सीमा का सर्वे किया गया, चूंकि हेनरी मैकमोहन के नेतृत्व में शिमला में सर्वेक्षकों और नक्शानवीसों की मदद से यह परिकल्पित सीमा रेखा नक्शे पर तय की गयी थी. तो इसे मैकमोहन लाईन नाम दिया गया.

हैनरी मैकमोहन ब्रिटिश विदेश सचिव थे और मैकमोहन ने भारत की और से उस सीमा रेखा को निर्धारित करने वाले समझौते और नक्शे पर हस्ताक्षर किये. जबकि तिब्बत की ओर से वहां की सरकार के प्रतिनिधि लोंचेन सात्रा ने हस्ताक्षर किये.

मैकमोहन रेखा पश्चिम में भूटान से लेकर 890 किमी के क्षेत्र को रेखांकित करते हुए नक्शे पर खींची गई… इस रेखा ने ब्रह्मपुत्र नदी तक के करीब 260 किमी क्षेत्र की सीमा का निर्धारण किया… जब यह समझौता हुआ तब तिब्बत स्वतंत्र देश भले ही था किंतु वह उस समय चीन से उसी तरह संरक्षित राष्ट्र था जैसे आज भूटान को भारत का संरक्षण प्राप्त है… इसलिये चीन ने इस समझौते को मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उसके अनुसार तिब्बत को इस प्रकार के समझौते का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था… चीन ने मैकमोहन रेखा के दावे को खारिज कर अपने नये नक्शे जारी किये… जिसमें उसने मैकमोहन रेखा के दक्षिण में 65 हजार वर्ग किमी क्षेत्र को दक्षिणी तिब्बत बताया… चीन आज भी इसी अवधारणा पर डटा हुआ है…

“डोकलाम” भूटान का ही भाग हैं पर चीन उसे दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा मानता है. वो उस क्षेत्र में सड़क बनाकर उसे अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता है. भारत मैकमोहन रेखा के आधार पर उसे भूटान का हिस्सा मानता है और यही है भारत चीन सीमा विवाद की असली जड़ …जिसको लेकर “ड्रेगन” के साथ 1962 में एक खूनी युद्ध हो चुका है जिसमें भारत ने अपनी बहुत सारी जमीन गवां दी… मैकमोहन रेखा को लेकर विवाद आज भी जारी है और यही कारण है कि उस युद्ध के 55 साल बाद एशिया के 2 महाकाय देशों की सेनाएं एक बार फिर हिमालय की गोद में आमने सामने खड़ी हैं.

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