संस्कृति की सुरक्षा और ‘अ’सरकारी सरकारी नीतियां

जिन्होंने इतिहास के पन्नों में वक़्त बिताया होगा, वह जानते होंगे कि सोवियत रूस के विघटन में आधुनिक पश्चिमी संगीत, जींस जैसे आधुनिक पहनावे और औरतों के श्रृंगार-प्रसाधन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. इतिहास ने यह भी बताया होगा कि क्रांतिकारी परंपरा के अनुसार लगभग हर कम्युनिस्ट शासक ने अपने देश-काल को सुसंस्कृत करने के लिए तरह-तरह के नियंत्रण और प्रतिबंधों का इस्तेमाल किया है. साम्यवादी रूस को भी संस्कृति के भ्रष्ट होने से बहुत डर लगता था.

इतिहास पढ़ने वाले दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी/बर्लिन का विभाजन भी जानते होंगे. उन्हें मालूम होगा कि इस बंदरबांट के बाद पश्चिमी बर्लिन अमेरिका के हाथों में गया था और पूर्वी बर्लिन पर सोवियत रूस का नियंत्रण था. कम्युनिस्ट शासक का डर यहाँ भी हावी था और वह पूर्वी बर्लिन को अपने हिसाब से सु-संस्कृत करने में लीन थे.

दरअसल यह सत्ता और व्यवस्था की चारित्रिक खामी है. हर प्रकार की व्यवस्था का जन्म देश-काल के भले के उद्देश्य से होता है. लोकतांत्रिक सत्ता का दावा होता है कि वह शासक नहीं बल्कि सेवक है. साम्यवादी सत्ता तो खुद को हाशिये मने बहुमत का प्रतिनिधि घोषित करती ही है. लेकिन चरित्र की खामी से कैसे बच पायेगा कोई? कभी बच पाया है? सेवक, सेवा भाव भूलकर नियंत्रक बन जाता है. नियंत्रण की हदें बढती हैं. वह धीरे-धीरे आपका बिस्तर नियंत्रित करने की जुगत में लग जाता है. साम्यवादी सत्ता तो भीतरी डर से ही त्रस्त होती है. उसे हमेशा साजिशों का डर लगा रहता है और इस डर में वह हाशिये यानि की बहुमत की रोटी का रंग भी जांचने लग जाती है.

सोवियत रूस ने इन्हीं डरों से पाश्चात्य संगीत (रॉक & रॉल), जींस, औरतों के कॉस्मेटिक्स आदि पर प्रतिबन्ध लगाया हुआ था. स्टालिन को लगता था कि इनसब माध्यमों से कहीं पूँजीवाद लोग रूस में न घुस जाएँ और सर्वहारा की संस्कृति को भ्रष्ट कर दें. हालाँकि वह खुद बेहद रसिक और शौक़ीन इंसान रहा है, लेकिन सत्ता को अपना चरित्र दिखता कब है? अब जनता, चाहे किसी देश-काल की हो, हल्का-फुल्का ही सही पर विरोध दर्ज कराते रहती है.

तो 1950 के दशक की शुरुआत में ही स्तिल्यागी (मने स्टाइलिश) नाम से एक आन्दोलन शुरू हुआ. ये पाश्चात्य कपड़े पहनें, पाश्चात्य संगीत सुनें. हालाँकि अगले दस साल के भीतर ही इसे पूरी तरह से ख़त्म कर दिया गया. अगले दो दशक के दौरान वहां संगीत की खूब कालाबाजारी हुई. जनता सुलगती रही. 1986 में रॉक लैब फेस्ट हुआ जिसमें पीटर ममोनोव ने “आय एम डर्टी” गाना प्रस्तुत किया. यह बहुत प्रसिद्ध हुआ. युवा वर्ग सत्ता के विरोध स्वरुप लाल चौक (रेड स्क्वायर) पर जा-जाकर गांजा पीने लगा. इसके कुछ ही समय बाद पीट्सबर्ग में तेलेविजर नाम के एक बैंड ने “गेट आउट ऑफ़ कण्ट्रोल” गाया, और यह कण्ट्रोल को आउट करने के लिए लगभग आखिरी प्रहार साबित हुआ.

ठीक इसी तरह जर्मनी में चलकर देखते हैं. पूर्वी जर्मनी में रूस की तरह का प्रतिबन्ध कायम था, वहीं पश्चिमी जर्मनी अमेरिका की तरह उन्मुक्त. 1987 में डेविड बोवी और फिल कॉलिंस की प्रस्तुति से फसाद शुरू हुआ. हुआ यह कि पश्चिमी जर्मनी के लोगों ने अपने पूर्वी भाइयों को संगीत का आनंद देने के लिए बर्लिन की दीवार पर लाउडस्पीकर लगा दिया. जनता मजे लेने लगी. कम्युनिज्म को संस्कृति पर खतरा महसूस हुआ. पुलिस लाठियां लेकर पहुँच गयी. जनता दीवार और लाउडस्पीकर की सुरक्षा में मस्त थी. उसके अगले साल माइकल जैक्सन की प्रस्तुति ने आग और भड़काया, परिणाम पूर्वी जर्मनी में दंगे हो गए. जनता ने जमकर पुलिस को पीटा और पहली बार “टीयर डाउन द वाल” का नारा पैदा हुआ. साल के अंत तक दीवार जमींदोज हो चुकी थी.

दरअसल इतना इतिहास मैं पागलपन के दौरे में नहीं बतिया रहा हूँ. दो साल पहले अपने देश में पॉर्न पर प्रतिबन्ध लगाया गया था. लोग इस पर व्यंग्य कर रहे थे. सरकार के फैसले का मज़ाक बन रहा था. वहीं, कुछ संस्कृति-रक्षक भी थे, जो पक्ष में तर्क गढ़ रहे थे. अभी इतिहास गढ़ने का दौर चल पड़ा है कि प्रताप ने अकबर को हरा दिया था. आगे संभव है कि लालकिला का मोदी द्वारा बनवाया जाना भी पढ़ाया जाने लगे.

आप यकीन करिए, संस्कृति की सुरक्षा का सरकारी प्रयास इस तरह से शुरू हुआ है, जो बढ़कर बिस्तर नियंत्रित करने तक पहुँच सकता है. सरकारें आपको बतायेंगी कि आप क्या देखें और क्या नही? क्या पढ़ें और क्या नहीं? क्या खाएँ और क्या नहीं? आगे चलकर वह यह भी कह सकती है कि फलाने मुहूर्त में सेक्स न करें, फलां उम्र तक सेक्स न करें, फलां उम्र के बाद सेक्स न करें.

बाकी, ऊपर के ऐतिहासिक उदाहरणों से किसी निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकता है. हम बस इतना कहेंगे कि हाँ, भारत जैसे देश में, जहां धर्म और सेक्स निषेध की श्रेणी में आता हो, वक़्त लगेगा माहौल बनने में, पर बनेगा जरूर. इसी देश का अतीत धर्म और सेक्स आदि पर बड़ी स्वच्छंद सोच रखता था. खूब विमर्श किये जाते थे. आज बेशक से सच कह देना भी देशद्रोह हो गया हो.

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