मेकिंग इंडिया गीतमाला : रफ़ी-बलबीर से बात करते सुनिए तबले को

फिल्मी गानों में हारमोनियम का प्रयोग हमेशा ही मुझे सुहाया है, सो इस गाने में भी है. सब कुछ तो है इसमें… मदन मोहन साहब का संगीत… रफ़ी साहब की बेमिसाल गायकी… इठलाता बल खाता तबला… कैफ़ी आज़मी के सिचुएशन के मुताबिक ठीक-ठाक से बोल… बस दो चीज़ों की तरफ तवज्जो दीजिए… पहली सह गायक के तौर पर इस्तेमाल हुई आवाज़ और दूसरी कांच की पट्टियों की आवाज़…

कुछ साल पहले इसी धुन पर बना एक पंजाबी गायक का भजन भी बड़ा लोकप्रिय हुआ था, ‘अरे द्वारपालों, कन्हैया से कह दो, द्वारे सुदामा गरीब आ गया है’.

हाँ, मूल गीत में रफ़ी साहब के साथ सह गायक थे बलबीर जी. ये उस ज़माने में इंडस्ट्री में आये थे, जब मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और किशोर कुमार की तूती बोलती थी. बचा-खुचा मार्केट मन्ना डे और महेंद्र कपूर ने कैप्चर किया हुआ था.

मुझे नहीं पता कि बलबीर जी को कभी सोलो सॉंग मिला हो. जितने भी गीतों में इनकी आवाज़ इस्तेमाल हुई, बस दूसरे या तीसरे गायक के रूप में, जो परदे पर हीरो के किसी मित्र का किरदार निभाने वाले एक्स्ट्रा-नुमा अदाकार पर फिल्माई गई.

बहरहाल स्थापित आवाज़ों के बीच एक नई और अनसुनी सी आवाज़ हमेशा ताज़गी का एहसास करा देती है. जैसे लता मंगेशकर – आशा भोंसले के दौर में फिल्म दाग के गाने ‘नी मैं यार मनाना नी’ में लता जी के साथ मीनू पुरुषोत्तम की आवाज़.

खैर ये किस्सा और गीत फिर कभी, अभी तो रफ़ी-बलबीर से बात करते तबले को सुना जाए.

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