भाजपा की सांस्कृतिक थाली में लुढ़कते बैंगन

‘संस्कारी सेंसर बोर्ड’ ने कैची चलाने का नया कीर्तिमान स्थापित किया है. नवाजुद्दीन सिद्दीकी की नई फ़िल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज़’ पर 48 कट लगाए गए हैं. संस्कारी अध्यक्ष को फ़िल्म के अंतरंग दृश्यों पर आपत्ति थी. 48 कट लगाने का मतलब होता है छोले-पूरी को ‘गिलकी की सब्जी’ बना देना. जब इतनी आपत्ति थी तो ‘ए’ प्रणामपत्र भी दे सकते थे.

पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनाने का मौलिक विचार पता नहीं किस विद्वान् ने दिया होगा. जिस फ़िल्म निर्माता की कोई फ़िल्म पुणे फ़िल्म संस्थान की लाइब्रेरी में नहीं रखी जा सकी, आज वो देशभर के फ़िल्म निर्देशकों को फ़िल्म मेकिंग सिखाने की कोशिश कर रहा है.

बात यही खत्म नहीं हुई. जब फ़िल्म निर्माता किरण श्रॉफ सेंसर बोर्ड सदस्यों से मिलती हैं तो उन्हें कहा जाता है ‘आप औरत होकर ऐसी फिल्में कैसे बना सकती हैं’. एक सदस्य ने तो उनके कपड़ों पर ही आपत्ति ले डाली.

80-90 के दशक में पहलाज निहलानी की फिल्मों में जब हीरोइन बरसात में भीगी गाना गाती थी, तब ये आपत्ति कहाँ गई थी. इनकी फिल्मों में फूहड़ गाने, द्विअर्थी संवाद, आइटम सॉंग सभी मिलते हैं.

मैने पहले भी कहा था कि ‘भाजपा की सांस्कृतिक थाली में बैंगन लुढ़क रहे हैं’. इनके पास मनोज तिवारी जैसे कलाकार हैं जो ‘इंदू सरकार’ के प्रमोशन में नज़र नहीं आते लेकिन शाहरुख़ की फ़िल्म के लिए अनुष्का के सामने घुटनों पर आ जाते हैं.

कोई कह रहा था कि मौजूदा सरकार को सांस्कृतिक थाली की जरूरत नहीं है. उन लोगों के साथ मेरी सहानुभूति है. विचारधारा का सूत्रपात बचपन में पढ़ी किताबो, प्रेरक फ़िल्मो जैसे मनोरंजन के साधनो द्वारा ही होता है. आज जो करोड़ों सेकुलर लोग आपके आसपास फैले हुए हैं वो उसी सांस्कृतिक विचारधारा का परिणाम है जिसके लिए कांग्रेस ने विशेष प्रयत्न किये होंगे.

आज आप गिनाए कि मौजूदा मनोरंजन साधनों से प्रेरित होकर कितने बच्चे राष्ट्रवादी बन रहे होंगे, वो भी ऐसी स्थिति में जब आप ‘पीछे’ से बाजीराव पेशवा पर बन रहे धारावाहिक को प्रमोट करने के लिए कोई मदद नहीं करते, जब आपके नेता एक अधेड़ अभिनेता की प्रेम कहानी को प्रचारित करने के लिए पलक-पांवड़े बिछा देते हैं. जिस दिन मोदी जी रिटायर हुए, उस दिन भाजपा का क्या होगा, राम जाने.

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