क्यों प्रेमचंद लोकप्रिय थे, लोकप्रिय हैं और लोकप्रिय रहेंगे

प्रेमचंद क्यों लोकप्रिय हैं? सीधे-सीधे कहूँ तो उनका लेखन सरल था. अब इस कथन पर परेशान मत हो जाइयेगा और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया भी ना दीजिएगा. ज़रा ठन्डे दिमाग से सोचें, विचार करने पर हम पाएंगे कि सरल होना सबसे अधिक कठिन है.

अनेक उदाहरणों से इसे प्रमाणित किया जा सकता है. क्लिष्टता साहित्य को आम जन से दूर कर देती है. और ऐसा साहित्य विश्वविद्यालयों की दीवारों पर किसी अर्थहीन डिग्री की तरह फ्रेम करके टांगने के काम आता है या फिर अलमारी में बंद होकर दीमक का भोजन बनता है. इनका मूल्य जनसामन्य के लिए किसी रद्दी से अधिक नहीं.

हो सकता है यह बात कई साहित्यकारों की भावना को आहत करे. आजकल वैसे भी बात-बात पर भावना के आहत होने का युग है. और जिनकी भावनाएं आहत होती हैं वे हर तरह से कितने कमजोर और असुरक्षित होते हैं, कहने की आवश्यकता नहीं.

ऐसे लोग विचार, चिंतन, दर्शन के धरातल पर कहीं भी खड़े नजर नहीं आते. सब कुछ हवा हवाई होता है. ये शब्दों के बाज़ीगर होते हैं. और बाज़ीगर हों या जादूगर, यह किस काम आते हैं, बताना यहां जरूरी नहीं.

सत्य तो यह है कि लेखन में तथ्य और तर्क सही हों तो उसे सरल शब्दों मे ही परोसना पड़ता है, जब लेखन में क्लिष्टता हो तो लेखक और पाठक दोनों के भ्रमित होने की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.

वैसे भी जीवन को सरल बना कर ही सर्वाधिक आनन्द पाया जा सकता है. ऐसे में ऐसा साहित्य किस काम का जो जीवन को और क्लिष्ट बना दे.

सरल सोचो, सरल लिखो, सरल समझो, सरल बोलो, जहां तक हो सके सब कुछ सरल कर दो, फिर सरल हो कर सरलता से जीवन का परम आनंद उठाओ. ईश्वर और प्रकृति, सब कुछ सरल है, कृपया इसे क्लिष्ट ना बनायें.

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