प्रोफ़ेसर मुनीष बिंदल : इंजिनियर वही जिसके अविष्कार से सामान्य लोगों का जीवन सुधरे

प्रोफेसर मुनीष बिंदल राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. आपने सन 1991 में प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) से रासायनिक अभियांत्रिकी में बी टेक की डिग्री प्राप्त की. तत्पश्चात आपने सामाजिक कार्यक्षेत्र में दस वर्षों से अधिक समय तक एक स्वयंसेवक के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया. मुनीष जी ने डॉ कलाम की आत्मकथा ‘अग्निपंख’ से प्रेरणा ली. जिस प्रकार अग्नि मिसाइल का निर्माण किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी उसी प्रकार विकास को धरातल पर लाने के लिए समाज के सभी वर्ग के लोगों की भागीदारी प्राथमिक आवश्यकता है ऐसा प्रो० मुनीष जी प्रायः मुझे समझाते हैं. बीमारी के कारण स्वयंसेवक की सक्रिय भूमिका त्यागने के उपरान्त आपने मास्टर ऑफ़ टेक्नोलोजी की पढ़ाई पूर्ण की और 2009 में शिक्षक बन गए. सम्प्रति आप भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (का०हि०वि०वि०) में अपनी पीएचडी पूरी कर रहे हैं.

पवन त्रिपाठी बताते हैं कि 1991 में मुनीष जी आईटी से केमिकल से बीटेक करने के बाद अच्छी नौकरी में गये थे. वहां से छोड़कर 1991 में संघ के प्रचारक हो गए थे. उसी क्रम में संघ के सर-कार्यवाह शेषाद्रि जी के सहायक रहे. 2004 में उन्हें हेपेटाइटिस-बी हो गया तो संघ ने घरेलू जीवन के लिए निर्देश किया. नही जाना चाहते थे. गजब जीवट है… उन्होंने इस बीमारी से गजब पंगा लिया और जीते. बंगलुरू, प्रशान्ति कुटीर से योग, प्राकृतिक चिकित्सा सीखी और बीमारी को हरा दिया. आज वह इसके विशेषज्ञ भी है. फिर नये सिरे से जीवन प्रारम्भ किया. मुनीष जी ने संघकार्य के साथ ही एमटेक किया, इस समय बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कोटा टेक्निकल यूनिवर्सिटी में तैनात हैं. उन्होंने करियर देर से शुरू किया और समाज-राष्ट्रकार्य कभी बन्द नहीं किया. मुझे गर्व है मै उनके साथ रहा. मेरे जीवन में बहुत कुछ उनका दिया हुआ है.

यह तो था आपका संक्षिप्त परिचय. अब मैं बताता हूँ कि मैं मुनीष सर से कैसे मिला. कुछ माह पूर्व मैं पवन त्रिपाठी जी के यहाँ गया था. लखनऊ से लौटते समय जल्दबाजी में अपनी एक टी शर्ट त्रिपाठी जी के घर पर छोड़ आया. मैंने उनसे बड़ी मिन्नतें कीं कि “हुजूर हमाई शर्ट कैसे भी कर के पहुँचवा दीजिये, मैं गरीब आदमी हूँ इस चीकट गरमी में दो शर्ट के सहारे गुजारा न हो सकेगा.”

सो त्रिपाठी जी ने ‘पवन’ की गति से मुनीष जी के हाथों उस टी शर्ट के साथ एक टी शर्ट फ्री देकर हम तक पहुँचवा दी. साथ में ढेर तारीफों के पुल बाँध दिए कि लड़का बहुत होशियार है, विज्ञान आधारित विषयों पर लिखता है. अपनी प्रशंसा सुनने के बाद हम तो फूले न समाये.

मैंने सोचा होंगे कोई स्वयंसेवक मुझे क्या! अनेकों देश-विदेश के विद्वानों को तो हम फेसबुक पे ऐसे ही निबटा दिया करते हैं. लेकिन मुझे क्या पता था कि किससे पाला पड़ने वाला है. जिस केमिस्ट्री ने कभी मेरी लुटिया डुबोई थी मुनीष सर उसके शिक्षक निकले. मुनीष सर ने मेरे कुछ आर्टिकल पढ़े और अपनी पीएचडी के टॉपिक के बारे में बताया.

राजस्थान के 60% गाँवों के भूजल में फ्लोराईड नामक तत्व अधिक मात्रा में पाया जाता है. मुनीष सर ने मुझे कुछ शोध पत्र दिए थे जिन्हें पढ़ कर मैंने जो समझा उसके आधार पर फ्लोराईड की भयावहता को समझाने का प्रयास कर रहा हूँ. यह बहुत ही घातक रसायन है जो शरीर में स्थित कोशिकाओं में कोलाजेन नामक प्रोटीन की संश्लेषण प्रक्रिया को बाधित करता है, जिसके कारण शरीर की अस्थियों और त्वचा की आयु कम हो जाती है.

कोलाजेन की कमी से व्यक्ति का शरीर वृद्धावस्था से पूर्व ही बूढ़ा दिखने लगता है. कोलाजेन वस्तुतः कोशिकाओं से बने ऊतकों को जोड़ने में गोंद का कार्य करता है जिससे मांसपेशियों में लचीलापन और मजबूती दोनों रहती है. यदि दाँत टूट जाएँ तो पुनः नहीं उगते किंतु फ्रैक्चर हुई हड्डी कोलाजेन की सहायता से अपनी मरम्मत कर लेती है. शरीर में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से कोशिकाएँ कोलाजेन का निर्माण नहीं कर पातीं जिसके कारण एक बार फ्रैक्चर हुई हड्डी पुनः जुड़ नहीं पाती.

यही नहीं, फ्लोराईड ‘डीएनए रिपेयर एंजाइम सिस्टम’ की प्रक्रिया को भी नुकसान पहुँचाता है. इसे समझने का प्रयास करें. शरीर की कोशिकाओं में न्यूक्लियस होता है जिसमें क्रोमोसोम होते हैं. क्रोमोसोम के अंदर डीएनए और प्रोटीन अणु होते हैं. डीएनए में मौजूद जीन सीक्वेंस से ही हमारी शारीरिक संरचना, लिंग, बोलचाल का तरीका, हावभाव, व्यवहार, सोच विचार सब कुछ निर्धारित होता है. कोशिका डीएनए की सुरक्षा के लिए कुछ विशेष प्रकार के एंजाइम उत्पन्न करती है जो विपरीत परिस्थितियों में डीएनए को खराब होने से बचाते हैं.

जब व्यक्ति बूढ़ा होने लगता है तो इस डीएनए रिपेयर एंजाइम सिस्टम की प्रक्रिया धीमी पड़ने लगती है. भूजल में स्थित फ्लोराईड की 1 पीपीएम मात्रा जब शरीर में जाती है तो डीएनए रिपेयर एंजाइम सिस्टम को 50 प्रतिशत तक बाधित करती है. यह ऑस्ट्रिया के Seibersdorf Research Center के डॉ वोल्फगांग क्लाइन के शोध से सिद्ध हुआ है.

ज़रा सोचिये यदि डैमेज हुआ डीएनए उस कोशिका में हो जो शुक्राणु बनाती है तो जन्म लेने वाले बच्चे का क्या होगा? उसके शरीर की कोशिकाएं डैमेज हुआ डीएनए रेप्लीकेट करती रहेंगी और संभव है कि यह अनुवांशिक हो जाये. इस प्रकार कोई विशिष्ट रोग अथवा अपंगता एक पीढ़ी से दूसरी में चली जाएगी. फ्लोराइड से कैंसर की संभावना भी बढ़ती है.

एक अन्य शोध पत्र के अनुसार फ्लोराईड पौधों के लिए भी विष के समान है. पौधों में फ्लोराईड की मात्रा अधिक होने से उनकी ऊँचाई में कमी आ जाती है. पत्तों की संख्या, पुष्प/ फल उत्पन्न करने की क्षमता में गिरावट आ जाती है. परिणामस्वरूप पेड़ पौधों का विकास रुक जाता है.

प्रोफ़ेसर मुनीष बिंदल अपने पीएचडी शोध में भूजल में से फ्लोराईड को निकालने की युक्ति खोज रहे हैं. वैसे तो विश्व भर में इस विषय पर अनेकों शोधकार्य हो रहे हैं किंतु मुनीष सर का कहना है कि फ्लोराईड रिमूवल की तकनीक ऐसी होनी चाहिए जो मार्केट में आसानी से बिक सके, प्रयोग करने में सरल हो और सस्ती हो जिससे सभी वर्ग के लोग क्रय कर सकें.

मैंने जब पूछा कि आपने इस विषय को क्यों चुना तो उन्होंने उत्तर दिया कि वैसे तो यह विषय “Interdisciplinary” है क्योंकि इसमें पर्यावरण विज्ञान, जीव विज्ञान, जियोलॉजी, मेडिकल साइंस इत्यादि कई विषय सम्मिलित हैं परंतु लीड रोल केमिकल इंजीनियरिंग वाले को ही निभाना चाहिए क्योंकि फ्लोराईड रसायन का व्यवहार केमिस्ट्री में ही पढ़ाया जाता है और एक इंजिनियर का कर्तव्य है कि वह समाज को कुछ ऐसा अविष्कार कर के दे सके जिससे सामान्य लोगों के जीवन में सुधार आये.

जिस ‘ग्राम विकास परियोजना अभियान’ की चर्चा मैं कुछ दिनों से कर रहा हूँ और जिसका प्रारंभ श्री महामना रामकथा से होगा उसके पीछे मुनीष सर का विज़न ही है. ऊपर दिए चित्र में प्रोफेसर बिंदल (बाएं), आइआइटी बीएचयू के पूर्व निदेशक प्रोफेसर सिद्धनाथ उपाध्याय जी (दाहिने) के साथ बैठे हैं.

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