पाकिस्तान का तो पहला राष्ट्रगान भी रचित है एक हिन्दुस्तानी द्वारा, उसका अपना क्या है?

13-14 अगस्त 1947 की रात 12 बजे ‘पाकिस्तान’ के जन्म के समय जो राष्ट्रीय गान रेडियो पाकिस्तान और कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना साहेब के भाषण के बाद गाया गया था उसके बोल थे “ऐ सरज़मीन-ए-पाक” ! इस राष्ट्र गीत को भारत वर्ष के बाशिन्दे उर्दू के शायर श्री जगन्नाथ आज़ाद ने मोहम्मद अली जिन्ना के खास अनुरोध पर रचा था. 1947 से लेकर 1954 तक पाकिस्तान का अवाम और सरकार इसी नज़्म को पाकिस्तान का “नेशनल ऐन्थम” मान कर सलाम करती रही.

जब 1950 में पाकिस्तान के हुक्मरानों को इसका इल्म हुआ कि उनका नेशनल ऐन्थम तो एक हिन्दुस्तानी “हिन्दू” ने लिखा है, तो पाकिस्तान में सुगबुगाहट होने लगी. लोगों ने और इल्मकारों ने उर्दू के पूरे साहित्य को ढूंढ मारा, उन्हें कहीं पर भी कोई नज़्म या इबारत नहीं मिली जिसे संगीत में पिरोकर नेशनल एंथम कहा जा सके. क्योंकि उर्दू के फनकार तो महज इश्क, शबाब, कबाब, और प्यालों में ही डूबे रहते थे. बहुत खोजबीन करने के बाद सिर्फ एक बन्दिश मिली जिसे इकबाल ने पिरोया था. उसके बोल थे “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” अब भला पाकिस्तानी कट्टरपंथी हिन्दोस्तां को कैसे सारे जहां से अच्छा कुबूल करते.

फिर पूरे पाकिस्तान में गहरी खोज खबर ली गई. आखिर मुल्ला अहमद चागला ने एक नज़्म की शिरकत की उसे संगीत की धुनों से नवाजा मियां हाफिज जालन्धरी ने. इस नज़्म को 13 अगस्त 1954 से पाकिस्तान का नेशनल एंथम मान लिया गया. पर इस में भी लोगों को यह ऐतबार है कि इस गाने को संगीत की धुन से संवारा है मियाँ जालन्धरी और जालन्धर हिन्दुस्तान में है.

पाकिस्तान अपनी जिस्म से चाहे कितनी भी धूल झटक ले उसके ज़हन में जो हिन्दुस्तानियों की खुशबू रग रग में भरी है उससे पाकिस्तान का छुटकारा पाना नामुमकिन है. वैसे भी देखा जाय तो पाकिस्तान में उसका अपना है क्या? आबादी हिन्दुस्तानी ही है, उसका अपना कुछ भी नहीं है. कलचर, रीति, रिवाज, खान, पान पहनावा ओढना सब कुछ हिन्दुस्तान की सजावट है.

आज पाकिस्तान में जो कुछ बचा है वह है महज बिला बजह खून, खराबा, मक्कारी, बदमाशी, वहशीपन, गरीबी, पीठ में छुरा भौंकने की आदत और बचा क्या है? बलात्कार और हिन्दुस्तानियों के विरुद्ध जहर उगलना.

पाकिस्तान को तो “जगन्नाथ आजाद” का शुक्रगुजार होना चाहिये था जिन्होंने जिन्ना के कहने पर आजादी के दिन उनकी लाज बचाने के लिये पाकिस्तान का प्रथम राष्ट्रीय गान रचा. वैसे जगन्नाथ जी पाकिस्तान का खून खराबा देखकर दिल्ली शरणार्थी बनकर आ गये थे, उन्होंने उर्दू के अखबार मिलाप, में काम किया, फिर सरकारी नौकरी में आकर रोजगार समाचार के सम्पादक रहे. फिर उनकी सेवाएं जम्मू काश्मीर में दी गई जहां पर उन्होंने पी आर ओ का काम किया. सरकारी नौकरी से रिटायर होकर लम्बे समय तक बह जम्मू विश्व विद्यालय में उर्दू विभाग में प्रोफेसर रहे.

पाकिस्तान की हरकतों को देख कर, आज अगर “जगन नाथ आजाद” जिन्दा होते तो पाकिस्तान का पहले राष्ट्र गान के बोल कुछ इस तरह के लिखते :-

ऐ सिरफिरे ना पाक ….ऐ सिरफिरे नापाक !
जर्रे जर्रे में झलके तेरे नापाक इरादे साफ ।
दुश्मनी हिन्द से करेगी तुझे सुपुर्दे खाक ।
तेरी आतंकी वहशीयाने पर रोता है गालिब आज ।
दामन जो पकड़ा चीन का मत फूल दिले नादान ।
चीर कर रख देंगे तुझे, ऐ सिरफिरे नापाक ।।

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