फेसबुक अड्डा : अपने ही वज़ीर के हाथ पिटता जतन से बिठाया गया मोहरा

कई साल पहले (सन 1994 में) फ्लोरिडा की डायना डुयशर के साथ एक अनोखी घटना हुई. वो टोस्ट खा रही थीं, और जैसे ही उन्होंने अपने टोस्ट में से एक टुकड़ा काटकर उसे अपनी प्लेट में रखा तो उनका ध्यान गया कि ये क्या? बेखयाली में काटे गए टोस्ट में वर्जिन मैरी की सी शक्ल उभर आई थी! उन्होंने अपने टोस्ट को एक पोलीथिन में पैक किया और सहेज लिया. कई साल बाद (नवम्बर 2004) इन्टरनेट युग आ चुका था और लोग इ-बे पर चीज़ों को नीलाम करने लगे थे. उनका आधा खाया हुआ टोस्ट (जिसमें वर्जिन मैरी दिख रही थीं) 28000 डॉलर का बिका.

बिलकुल असंबद्ध चीज़ों में कोई एक ढर्रा ढूंढना इंसानी फितरत होती है. बादलों में कभी हाथी-घोड़े तो कभी बड़े नेताओं का सा रूप ढूंढना भी कोई नयी बात नहीं है. दूसरे विश्वयुद्ध के समय जब जर्मनी वाले लन्दन पर बमबारी कर रहे थे तो लोग ये भी कयास लगा रहे थे कि किन इलाकों में बमबारी होने की संभावना ज्यादा है, कहाँ कम है. इस हिसाब से लन्दन के सुरक्षित कोने खोजे जा रहे थे. जर्मन हथियारों में वी-वन राकेट भी था, जो गाइडेड मिसाइल की तरह का था. कई अंदाजे लगाए गए, कई गणनाओं के हिसाब से सुरक्षित ठिकाने बनाए गए. बाद में पता चला कि सारी गणनाएं गलत थीं. वी-वन राकेट के दिशा ढूँढने वाले सिस्टम में गड़बड़ी थी, उसे किसी पक्के ठिकाने पर दागा ही नहीं जा सकता था.

ऐसा ही मार्स मिशन, यानि मंगल पर राकेट भेजने के दौर में भी हुआ था. उस दौर के कैमरे उतनी अच्छी क्वालिटी के तो नहीं थे इसलिए मंगल के पास से जो तस्वीरें भेजी गई उसमें मनुष्य की सी आकृति उभरती थी. वैज्ञानिक तो ये समझ सकते थे लेकिन पत्रकारों के लिए मंगल की जमीनी सतह की ये तस्वीर क्रन्तिकारी हो गई. दर्जनों अखबारों ने उस दौर में हैडलाइन छापी, “मंगल पर इंसानी चेहरा” (Human face on Mars). बाद में कैमरे बेहतर होने लगे और अब जब पक्का उसी जगह की मंगल ग्रह की तस्वीरें आती हैं, तो वहां कोई इंसानी चेहरा नहीं बनता. बिखरे पड़े पत्थर और उबड़ खाबड़ जमीन के गड्ढे साफ़ साफ़ दिख जाते हैं.

अनियमितताओं को जोड़ता प्रारूप ढूंढना इंसानी फितरत है. चांदनी चौक टू चाइना जैसी फिल्मों में ही आलू पर गणेश जी बने नहीं दिखते. यहाँ गणेश जी की मूर्ति का दूध पीना और ईसा की मूर्ती की आँखों से आंसू टपकने लगना होता रहता है. विविध संस्कृतियों वाले माने जाने वाले भारत में एकता देखनी हो तो आप हाथ से, वो भी दाहिने हाथ की सिर्फ उँगलियों से खाना खाने में भी देख सकते हैं. छुरी-कांटे या चॉप-स्टिक की संस्कृति से आये लोग भी यहाँ आकर बदले हैं, दोनों हाथ खाने में लगाने के बदले एक हाथ से खाते दिखेंगे. ये साड़ी के मिलते जुलते रूपों में भी दिखेगा. ये इसमें भी नजर आएगा कि रसोई और साड़ी जो स्त्रियों के अधिकार क्षेत्र का था वहां तो संस्कृति बची रही, चलती रही, लेकिन संस्कृति के जो पक्ष पुरुषों के जिम्मे थे वो नहीं बचे रहते. उनपर बाहरी प्रभाव आसानी से दिख जाएगा.

ये एक सेट पैटर्न है, इस तयशुदा ढर्रे से अलग चीज़ें ढूंढना लगभग नामुमकिन काम है. अगर आप ढूँढने निकलते भी हैं तो आप एक-आध अपवाद ढूंढ सकते हैं, अपवाद कभी बार बार नहीं होगा. ये बिलकुल वैसा है जैसे टी.वी. न्यूज़, या अखबारों में बलात्कारी का नाम बताया जाना. जैसे ही बलात्कारी का नाम नहीं बताया जा रहा हो, वो समुदाय विशेष का ही होगा. मंदिरों में हर रोज़ होने वाली करोड़ों की प्राचीन मूर्ति की चोरी जैसी घटनाएं मुख्य समाचार नहीं होंगी, चर्च की खिड़की का शीशा फूटना प्राइम टाइम न्यूज़ होगा. गोपालकों की पिटाई में किसी का मारा जाना राष्ट्रीय बहस का मुद्दा होगा, करोड़ों की गौ तस्करी और अक्सर तस्करों-चोरों द्वारा पुलिस और किसानों पर चलाई गई गोलियां खबर नहीं बनाई जाती. इनमें अलग कुछ ढूंढना, अपवाद ढूंढना है.

ऐसा ही अपवाद “चक्रव्यूह” फिल्म का अभय देओल वाला किरदार भी होता है. वो पुलिस की तरफ से नक्सलियों में घुसपैठ करने पहुँचता है और उसे बाद में नक्सलियों से ही सहानुभूति हो जाती है. असल में उसे एक नक्सल लड़की से प्यार हो गया होता है. इसका नतीजा ये होता है कि जिन लोगों ने उसे प्लांट किया होता है, आखिर में वो उनके ही हाथ मारा जाता है. ऐसी स्थिति के लिए हम भी कह सकते हैं कि उसे किसी पुलिस ने नहीं मारा था, उसे दोनों पक्षों में चल रही लड़ाई ने मार दिया. ऐसे प्लांट किये जाने में भी सेट पैटर्न होता है, जो ये गुप्तचर जैसे विभाग पालता-पोसता है वो युद्ध जीतेगा और जो इस पर ध्यान नहीं देता, वो निस्संदेह हारेगा. शिवाजी, हर्षवर्धन और शुरूआती मौर्य सम्राट सब इनकी वजह से जीतते रहे और जिन्हें सोमनाथ के पास आ जाने पर भी इस्लामिक आक्रमण का इन्तजार रहा वो हारे.

समय बदलने के साथ लड़ाई तीर-तलवार से आगे आकर तोपों पर पहुंची, फिर वहां से राकेट-मिसाइल पर. अब हार्ड टैक्टिस नहीं सॉफ्ट, प्रोपोगेन्डा वॉर का ज़माना है. प्रचार के तरीकों से मनोबल तोड़ा जाता है. बहुत धीरे धीरे अपने पक्ष में शामिल किया जाता है. इसका सबसे हालिया उदाहरण हिंदी पट्टी को सोशल मीडिया पर ही दिखा था. महीनों की मेहनत से बनी एक आई.डी. से दर्जनों जगह प्रवेश के बाद धुआंधार कवितायेँ चस्पा की गई थी. एक दिन अचानक “पेटीकोट” ने सैकड़ों भावनाओं को आहत कर दिया. कभी कभी ऐसी ही हरकतों के प्रयास में “चक्रव्यूह” फिल्म जैसा अपवाद हो जाता है. फिर जतन से बिठाया गया मोहरा अपने ही वज़ीर के हाथ पिट भी जाता है. लेकिन ये भी अपवाद ही है, जो कि आम तौर पर नहीं होता.

जब तक इसे सीखने-समझने की कोशिश के बदले टू मिनट मैग्गी टाइप लोग ऐसी घटनाओं पर झटके खाते रहेंगे, तबतक “पेटीकोट” पहनाया भी जाता रहेगा और सरे-बाजार उतारा भी जाता रहेगा. अपवाद इसमें भी ढूंढना मुश्किल ही है.

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