हिंदुत्व बचा है इसलिये भारत है और भारत है इसलिये हिंदुत्व भी है

अंग्रेज जब किसी देश को अपना उपनिवेश बनाते थे तो उनकी मंशा वहां दीर्घ-काल तक शासन करने की रहती थी और इसलिये वो अपने साथ ऐसे लोग लाते थे जिनका काम उस देश में प्रचलित धर्म, रिवाज, व्यवस्थायें और मान्यताओं का अध्ययन करना होता था. फिर उस अध्ययन के आधार पर वो उस देश में दीर्घकालीन शासन के सूत्र निकालते थे.

ऐसे ही कई अध्ययनकर्ताओं के द्वारा भेजी गई रिपोर्टों के आधार पर अंग्रेजों ने भारत को तोड़ने के तीन सूत्र ढूंढ निकाले थे और अपने लोगों को इन्हीं सूत्रों पर काम करने को कहा था. भारत-विखंडन की योजना के ये तीन सूत्र थे: –

1. हिन्दू समाज का अ-राष्ट्रीयकरण
2. हिन्दू समाज का अ-समाजीकरण
3. हिन्दू समाज का अ-हिन्दुकरण

आजकल चूँकि हिंदुत्व और राष्ट्र के संबंधों को परिभाषित करते हुए भ्रम फैलाया जा रहा है इसलिये अंग्रेजों के उपरोक्त योजना के प्रथम सूत्र का विश्लेषण चीजों को स्पष्ट करेगा.

अंग्रेज जब हमारे ग्रंथों को अनुवादित करने और समझने गये तो उन्होंने देखा कि यहाँ के हिन्दू समाज के लिये यह भारत भूमि माता है, देव-तुल्य है, इसका धर्म और राष्ट्र परस्पर अवलंबित है. ये हिन्दू अपनी भारत-भूमि के प्रति अखंड श्रद्धा रखता है और जब तक वो इस देश के लिये ऐसी पवित्र श्रद्धा-भावना रखेगा हम यहाँ लंबे समय तक शासन नहीं कर पायेंगे इसलिये हिन्दू समाज का अ-राष्ट्रीयकरण करो.

इस देश के लिये जो इनकी श्रद्धा है उसे खत्म करो और इसी सूत्र के तहत आर्य-द्रविड़ थ्योरी और आर्यों के बाहर से आने का मिथक गढ़ा गया. हमें समझाया गया कि तुम क्यों इस देश के लिये मरे जा रहे हो? तुम तो मध्य एशिया से यहाँ आये हो और ये तो तुम्हारी आदि-भूमि है ही नहीं जो इसके लिये इतना मोह पाल रहे हो.

अफ़सोस कि जिस बात को अर्थात ‘हिंदुत्व और राष्ट्र यहाँ पर्याय है’ अंग्रेज समझ गया था, उस बात को लेकर यहाँ भ्रम फैलाने के प्रयास चलते हैं.

राष्ट्र शब्द सर्वप्रथम ऋग्वेद में परिभाषित है जिसके अर्थ में केवल भूमि नहीं है बल्कि राष्ट्र शब्द में भूमि, वहां के लोग, वहां की संस्कृति सब समाविष्ट है इसलिये उसके प्रति दायित्व और कर्तव्य पालन का आदेश केवल राजा के लिये न होकर सर्वप्रजा के लिये है और इसलिये हरेक से ये अपेक्षा है कि वो राष्ट्र के लिये के जागृत पुरोहित बन कर मुस्तैद रहे.

अपेक्षायें यहीं तक नहीं है, वेद हम हिन्दुओं के लिये निर्विवाद रूप से सब ग्रंथों के ऊपर वरीयता रखता है पर वेदों में क्या देवताओं और ईश्वर के साथ राष्ट्र की अर्चना का आदेश नहीं है? अगर नहीं है तो ऋग्वेद में ऋषि क्यों कहता है –

यस्ये॒मे हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा यस्य॑ समु॒द्रं र॒सया॑ स॒हाहुः ।
यस्ये॒माः प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

अर्थात, महिमावान हिमालय जिसका गुण गा रहा है. नदियों समेत समुद्र जिसके यशोगान में निरत है, बाहु सदृश दिशाएं जिसकी वन्दना कर रही हैं उस परम राष्ट्र देव को हम हविष्य अर्पण करें.

फिर अथर्व वेद में भी ऋषि कहता है कि राष्ट्र की उत्पत्ति ही लोक-कल्याण की इच्छा से हुई है इसलिये ये देव-तुल्य है और इसलिये प्रजाजनों को बल और ओज से युक्त इस राष्ट्र की उपासना करनी चहिये.

अथर्व वेद इस भावना को और आगे ले जाता है और कहता है, ये भूमि तेरी माँ है और तू इसका पुत्र है, इसी को बहुत बाद में चाणक्य ने भी कहा था कि देश की सीमा उसके लोगों के लिए माँ के आँचल के सदृश होती है जिसकी रक्षा करना उसकी हरेक संतान का कर्तव्य है.

अब राष्ट्र के प्रति अगर हमारे कुछ कर्तव्य हैं तो उसका निर्वहन कैसे हो, राष्ट्र के रक्षण, उसकी समृद्धि के सूत्र क्या-क्या हों, उसके निवासियों की भावनाएँ कैसी हों, इसका आदेश भी वेदों में है. इसी का अनुपालन इस देश में सबने किया.

राम जब राष्ट्र को असुर-विहीन करने के लिये संकल्पित होतें हैं तो उसके मूल में राष्ट्र और उसके प्रजाजनों की सुरक्षा ही थी, पांडववीर और कृष्ण जब भारत के पश्चिमी छोर से एकदम पूर्वी किनारे तक जाकर रिश्ते करते हैं तो उसके पीछे भी इसी एकात्म-धारा को सुदृढ़ करने की कामना थी.

राष्ट्र अलग और धर्म अलग होता तो शंकराचार्य को कोई ज़रूरत नहीं थी कि वो गंगाजल से रामेश्वरम् के अभिषेक का विधान तय करते या चारों कोनों पर मठों की स्थापना करते.

शंकराचार्य अगर बौद्धों और वैष्णवों से संघर्ष करते हुये दिखते हैं तो उनका ये संघर्ष सिर्फ सनातन को बचाने के लिये नहीं था, वो तो राष्ट्र-रक्षा के उस वैदिक आदर्श का अनुपालन कर रहे थे जो कहता है, “समानो मंत्र: समिति समानी समानं व्रतं सहचित्तमेषाम”. राष्ट्र संकट में है तो प्रजाजनों का मन, उनके संकल्प, उनके विचार, उनके लक्ष्य और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के रास्ते भी एक समान हो.

अथर्व वेद ने तो ये भी कहा कि तू इसके लिये प्रयास कर कि सबको एक विचार से युक्त कर दे. शंकराचार्य का शास्त्रार्थ इसी के लिये के लिये था ताकि सबको एक कर दें ताकि भारत बचा रहे.

सोमवती अमावस्या या किसी कुम्भ या मकर-संक्रांति पर हम नदियों में नहाने को पुण्य-प्राप्ति का अवसर मानते हैं, ठीक है पर ये भी राष्ट्रीय चेतना ही है जिसे धर्म लेकर बढ़ता है, अगर न होती तो हम पुण्य-स्नान के लिये सिन्धु, गंगा, यमुना, नर्मदा सरस्वती, कावेरी, गोदावरी और गंडक ही क्यों चुनते जो इस भारत भूमि में प्रवाहमान है या रही है? हम टेम्स, टिगरिस, आमेजन, और नील को भी मोक्ष-दायिनी नदियों के रूप में चुन सकते थे, हम गोवर्धन को ही क्यों पूजते हैं, हिमालय ही हमारे लिये आराध्य क्यों है एटलस, रॉकी या आल्प्स क्यों नहीं?

जब हम सुबह बिस्तर छोड़ते हैं तो धरती को विष्णु पत्नी कहकर नमन करते हैं तब क्या राष्ट्र और धर्म अलग रहता है? स्नान से पूर्व जब जल में ‘गंगा च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती…’ कहते हैं तो क्या धर्म और राष्ट्र एक नहीं हो जाता?

इसका अर्थ ये है कि भारतीय चेतना में ‘हिंदुत्व’ की धारा और ‘राष्ट्रीयता’ की धारा अलग-अलग नहीं बह रही है बल्कि दोनों एक ही है. भारत और हिंदुत्व दोनों समानार्थी हैं. आप भारत को निकाल दीजिये तो हिंदुत्व नहीं दिखेगा और हिंदुत्व को अलग कर दीजिये तो भारत, भारत नहीं रहेगा.

आप कह सकते हैं कि महाराणा प्रताप का संघर्ष क्षेत्रीय था, ऐसा ही आप शिवाजी के बारे में भी कह सकते हैं पर बाहर वाले ऐसा नहीं कहते थे. यहाँ इस राष्ट्र में कोई महाराष्ट्र भले हो या रहा हो, कई जनपद भले रहें हो पर हमको एक सूत्र में हिंदुत्व बांधता है, हमको वो भूमि एकबद्ध रखती है जो हिमालय से आरंभ होकर हिन्दू सागर तक विस्तृत है.

ओल्ड-टेस्टामेंट और अरब वालों को ये बात आसानी से समझ में आती है, आपको नहीं आती. पैगंबरे-इस्लाम के समय भी यहाँ कई राजे-रजवाड़े थे, सब अपने क्षेत्र में सीमित पर उन्होंने जब यहाँ आने के लिये अपने लोगों को निर्देशित किया तो ग़ज़वा-ए-सिंध, ग़ज़वा-ए-पाटलिपुत्र या ग़ज़वा-ए-मगध नहीं कहा, उनका कथन था ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ यानि जो हिन्द पर ग़ज़वा करेगा. उनके लिये वो पूरी भूमि ही भारत थी.

श्री राम जन्मस्थान पर खड़े किये गये संरचना का टूटना नोबेल विजेता वी एस नॉयपाल को राष्ट्रीय चेतना का जागरण इसीलिये लगा था क्योंकि राम किसी धर्मविशेष के आराध्य से से अधिक राष्ट्रनायक थे. गांधी, नेहरू, तिलक, भगत सिंह, बोस, पटेल अगर ‘राष्ट्रनायक’ हैं उन्हीं अर्थों में राजा पृथु, भगीरथ, राम, कृष्ण और शंकराचार्य भी वही हैं.

हमें हिंदुत्व और राष्ट्र में किसी एक का चयन करना पड़े तो किसे चुनेंगे? ये तो प्रश्न ही व्यर्थ है क्योंकि चयन दो भिन्न वस्तुओं के बीच किया जाता है जब दोनों ही एक हो तो चयन का प्रश्न ही नहीं है.

और राष्ट्र और धर्म को एक न मानने और उनके बीच किसी एक के चयन की अपेक्षा हमसे ही क्यों? कोई यहूदी अपनी प्रतिश्रुत भूमि के बिना अपने धर्म की कल्पना कर सकता है? कोई मुस्लिम अरब भूमि से इतर अपने मजहब को मुकम्मल मान सकता है? ज़रथ्रुष्ट की भूमि के बिना मजूसियत पूर्ण होगी? अगर नहीं तो फिर हिंदुत्व और भारत को ही अलग-अलग करके क्यों देखा जा रहा है या इसे अलग करने का प्रयास क्यों चल रहा है?

हिंदुत्व बचा है इसलिये भारत है और भारत है इसलिये हिंदुत्व भी है.

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