Catches win Matches : वोटों का व्यापार जगत

राजनीति संभावनाओं की वह मंजिल है जहां सफलता प्राप्त करने लिए व्यक्ति/दल को एक नई लीक का चुनाव करना पड़ता है. इसलिए आज तक राजनीति की कोई स्पष्ट परिभाषा कागजों पर उतर नहीं पाई. क्योंकि राजनीति में कोई तय सिद्धांत नहीं होते जिसकी लीक पर चलते हुए कोई राजनेता सफल हो जाए. मार्ग का चुनाव स्वंय ही करना पड़ता है. राजनीति समकालीन परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती है और जो व्यक्ति तात्कालीक परिवर्तन और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए राजनीति करता है, प्रायः वह सफल रहता है.

दरअसल बिहार के गैंगस्टर और पूर्व राजद संसद मो. सैयद शहाबुद्दीन को राजीव रौशन मर्डर केस में 9/9/2016 की तारीख जब पटना हाई कोर्ट द्वारा जमानत मिली थी तो राजद का कैडर वोटर M के तुष्टिकरण को साधा गया था. न्यायालय से जमानत मिलने 10 सितम्बर 2016 को सुबह में शहाबुद्दीन जब भागलपुर केंद्रीय कारा से निकले तब उनके स्वागत में वर्तमान महागठबन्धन सरकार के कई मंत्री और तमाम समर्थक पलकें बिछाए खड़े थे. मीडिया भी था.. उन्होंने जेल से बाहर आते ही मीडिया के सम्मुख होकर कहा था – “लालू ही मेरे नेता और नीतीश परिस्थितियों के मुख्यमंत्री”.

इस बयान के बाद शहाबुद्दीन को कितनी राहत मिली यह तो पता नहीं लेकिन इस बयान के जरिये लालू ने बिहार की 17% प्रतिशत मुस्लिम आबादी में अपने हिस्से के वोटों को जरूर बढ़ा गये.

अब आते हैं इस के बाद होनेवाली घटनाओं पर दृष्टि डालें तो इस बयान से सियासी हलचल मची. अचानक नीतीश कुमार की अंतरात्मा जग उठी और बिहार सरकार गैंगस्टर शहाबुद्दीन को पटना हाई कोर्ट से मिली जमानत को रद्द करवाने हेतु सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में चली गयी. जहां पर वकील प्रशांत भूषण पहले से ही बिना पैसे लेकर शहाबुद्दीन के जमानत रद्द करवाने के लिए लड़ रहे थे.

16 सितम्बर वह तारीख थी जब बिहार सरकार की ओर से शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने हेतु याचिका डाली गई थी और 30 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करते हुए टिप्पणी की थी – “ऐसे लोगों को बाहर नहीं रहना चाहिए क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में राजीव रौशन मर्डर केस के गवाह प्रभावित होने का खतरा है.”

दिलचस्प तथ्य यह कि शहाबुद्दीन को जब जमानत मिली थी तब बिहार सरकार की ओर से 20 लोगों को सरकारी सुरक्षा दी गयी थी क्योंकि शहाबुद्दीन को जमानत मिलने के बाद उन 20 लोगों की जान को खतरा था. 1 आदमी को बाहर निकालने के लिए जब 20 लोगों को सरकारी सुरक्षा दी गयी, क्या 20 लोगों की सुरक्षा के लिए शहाबुद्दीन को अंदर नहीं रखा जा सकता था?

इन 21 दिनों की तमाम सियासी उठा-पटक का सार यह था कि लालू ने अपने इशारे पर शहाबुद्दीन को जेल से बाहर करके अपने मुस्लिम वोट्स गेन किये और उसके बाद नीतीश कुमार “सुशासन बाबू” की छवि कायम रखते हुए शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करवाकर अपने हिन्दू मत को गेन किया. और मोहरा बना शहाबुद्दीन जो कि अब जेल में है.

अब आईये बिहार के तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हैं.

शुक्रवार, 28 जुलाई को जब बिहार में NDA सरकार बनी तो जदयू सांसद खुर्शीद आलम उर्फ फिरोज अहमद ने विधानसभा के सदन में “जय श्री राम” के नारे लगाए थे. विधानसभा सदन में नयी सरकार के प्रथम दिन की कार्यवाही जब समाप्त हुई उसके बाद सदन से बाहर निकलकर खुर्शीद आलम ने मीडिया के सामने on camera जय श्रीराम बोलते हुए एक उत्तेजक बाइट दे डाली! फिर क्या था.. हिंदुओं का एक धड़ा तुष्ट हो गया और राष्ट्रवादियों की भावनाएं फेसबुक पर बिछने लगीं..

इसका अंत तो होना ही था. खुर्शीद आलम के इस बयानबाजी से मुस्लिम समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई और एक मुस्लिम संगठन इमारत-ए-शरिया के मुफ़्ती सुहैल अहम कुरैशी ने फतवा जारी किया जिसमें विधायक को जय श्री राम के नारे लगाने के लिए मुस्लिम समाज से बेदखल किया.

कहा जाता है कि इस मामले को लेकर नीतीश कुमार असहज हुए. उन्होंने खुर्शीद आलम से माफी मांगने को कहा. खुर्शीद आलम भी मुस्लिम होकर मुस्लिमो से बैर नहीं लेना चाहते थे. मुफ़्ती के सामने पेश होकर उन्होंने माफी मांगी, बीवी से पुनः निकाह किया और मुस्लिम समाज में दाखिल हुए.

इस घटनाक्रम में खुर्शीद अहमद ने हिन्दू मतदाताओं की सहानुभूति भी बटोरी और मुस्लिम समाज के अपने कैडर वोटों को भी मजबूत किया.

यह मात्र एक उदाहरण है – सहानुभूति लेना और खुद को स्थापित करना. कहावत है कि राजनीति में जो जनभावनाओं को अंगीकार करना जानता है वही नेता सफल बन सकता है.

Cricket के खेल में एक प्रसिद्ध कहावत है – “Catches win Matches”

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