फर्क सिद्धांत और नीति का : सिद्धांत बदलना अवसरवादिता, नीति बदलना कूटनीति

पराभव काल से भारत के लोगों के साथ एक बड़ी समस्या रही है कि अधिकांश जनसमूह ‘भावनात्मक बुद्धि’ के प्रभाव में अधिक रहा और कुछ जनसमूह ‘तार्किक बुद्धि’ के प्रभाव में अधिक रहा. ‘भावनात्मक बुद्धि’ और ‘तार्किक बुद्धि’ का जिनमें संतुलन था वह या तो बहुत छोटा वर्ग था या कुछ सीमित काल के लिए रहा.

जब ‘भावनात्मक बुद्धि’ हावी हो जाती है तब मनुष्य तर्क करता ही नहीं है, अंधश्रद्धावान, अति अहिंसावादी अथवा ‘सेकुलर’ बनता है और जब ‘तार्किक बुद्धि’ हावी हो जाती है तो मनुष्य तर्क नहीं बल्कि कुतर्क करने लगता है और ‘लिबरल’, ‘कूल ड्यूड’, ‘वामी’ बनता है.

कुतर्की व्यक्ति का उद्देश्य होता है अतीत को कुरेदना, इतिहास को खोदना, छिद्रान्वेषण करना, दूसरों के दोष ढूँढना, स्वयं को उच्च कोटि का बुद्धिजीवी स्थापित करना और बड़े समूह को प्रभावित करना…

भावुक व्यक्ति जो तर्क ही नहीं करता, विवेचना ही नहीं करता, उसका अपना निष्कर्ष ही नहीं होता, वह शीघ्र ही कुतर्की के प्रभाव में आ जाता है और ‘दास’ बनता है.

भारत में यह स्थिति अभी भी बनी हुई है हालांकि धीरे-धीरे कम हो रही है किन्तु बहुत बड़ी संख्या आज भी ‘अनुयायियों’ की है. बहुत जल्दी प्रभाव में आते हैं और भेड़ों की तरह ‘फॉलोअर’ बनते हैं.

अभी एक कुतर्क सुनने में आया ‘शत्रु का शत्रु, मित्र नहीं होता है’ बल्कि ‘शत्रु का शत्रु, शत्रु होता है’… पर हमने सुना था लोहा लोहे को काटता है, हीरा हीरे को काटता है, विष को विष ही काटता है?

मगध को नंद वंश से मुक्त कराने के लिए चाणक्य ने भी अनेक क्षेत्रीय राजाओं को साथ लिया. जानते थे कि सभी महत्वाकांक्षी थे, अवसरवादी थे, षड्यन्त्रकारी भी थे, फिर भी उनको साथ लिया फिर एक-एक करके सबको ठिकाने लगाया.

चाणक्य भी यदि यही सोचते कि ‘शत्रु का शत्रु, मित्र नहीं होता है’ तो पूरा जीवन अकेले ही रह जाते या थोड़े बहुत समूह के साथ अपने लक्ष्य को अपने साथ ही लिए हुए ही जीवन व्यतीत कर जाते. बल्कि यदि शत्रु के शत्रु को शत्रु ही समझते रहते तो यह आशंका अधिक होती कि छोटे-छोटे शत्रु मिलकर चाणक्य की ही हत्या कर देते.

मित्रता अलग विषय है, अनुबन्ध, सन्धि अथवा गठबन्धन अलग विषय है. ‘सिद्धान्त’ अलग है, ‘नीति’ अलग है. जो अपने सिद्धान्त बदलता है वह अवसरवादी है, जो नीति बदलता है वही कूटनीतिज्ञ है.

नीतियों का निर्धारण देश, काल, परिवेश और परिस्थिति के अनुसार किया जाता है. जो उस समय की श्रेष्ठ नीति हो उसके अनुरूप निष्कर्ष लिया जाता है, कर्म किया जाता है. कोई नीति कल्याणकारी भी हो सकती है, विनाशकारी भी हो सकती है.

किसी का मूल्यांकन नीतियों के आधार पर नहीं बल्कि सिद्धान्तों के आधार पर किया जाता है और इस आधार पर किया जाता है कि उसकी नीतियाँ सृष्टि के सिद्धान्त के अनुरूप हैं या विरुद्ध हैं.

यहाँ श्रीमद भगवद गीता अध्याय 5 श्लोक 18 का उल्लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है –

विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि च एव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥

इसकी व्याख्या इस वीडियो से समझें

  • अशोक सत्यमेव जयते

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