सोशल मीडिया के डर से थरथराती मेन स्ट्रीम मीडिया

सोशल मीडिया अभी बालपन में है. धीमे-धीमे विकसित हो रहा है. सबके पास तलवार, सबके पास म्यान. जब 80 के दशक में वीसीआर आया तो फ़िल्म उद्योग को अपनी बर्बादी दिखने लगी थी. एक फ़िल्म के गाने के बोल थे ‘टीवी वीडियो बहुत हुआ, सबके सिर में दर्द हुआ, टिकट कटा के सिनेमा जा, आएगा बड़ा मज़ा’. हालांकि सिनेमा आज भी मौजूद है और वर्तमान में उसके प्रतियोगी बढ़ गए हैं.

आज टीवी, न्यूज़ चैनल, इंटरनेट से सिनेमा का मुकाबला है. सोशल मीडिया को इस परिवार का सबसे छोटा बच्चा कह सकते हैं. जैसे-जैसे ये बच्चा बड़ा और समझदार होता जा रहा है, वैसे ही मेन स्ट्रीम मीडिया को डर सताने लगा है. अख़बार नेट पर उपलब्ध हो ही गए हैं, कल को पत्रकारिता का क्या होगा.

टीवी चैनल तो बाकायदा सोशल मीडिया को खतरनाक साबित करने पर आमादा हैं. तो आगे क्या होने जा रहा है? क्या तकनीक आधारित सूचना तंत्र खुद को ही खा जाएगा या फेसबुक और व्हॉट्सएप जिम्मेदार मीडिया की तरह विकसित होंगे?

जी हाँ, बिलकुल विकसित होंगे और मुख्य मीडिया को सुधरने के लिए विवश करेंगे. अख़बारों और न्यूज़ चैनल की अहमियत बनी रहेगी. बस ये फर्क जरूर आएगा कि आज की तरह वे किसी खबर को दबा नहीं सकेंगे.

अखबारी पत्रकारों को भी सोशल मीडिया कचरा नज़र आता है. कुछ दंभी पत्रकार जो केवल शहर की पत्रकारिता करते हैं और इस बात को लेकर अहंकार से भरे रहते हैं. आज किसी अधिकारी की पोल खोलेंगे तो शाम को प्रेस क्लब में अपने साथियों के सामने बाकायदा ‘वाचन’ किया जाता है कि क्या निपटाया है. केंद्र की राजनीति के बारे में पूछ लो तो बगले झाँकने लगते हैं.

ये कुछ अखबारी पत्रकार सोशल मीडिया से नफरत का नाटक करते हैं लेकिन फ़ोटो-शोटो डालने के लिए इसका उपयोग जरूर करते हैं. इतनी ही तकलीफ है तो दफा हो जाओ फेसबुक और ट्विटर से. व्हॉट्सएप आज ही अनइंस्टाल कर दो. इसके बिना पत्रकारिता करके दिखाओ. लेकिन वो तो होगा नहीं क्योंकि बैठे-बैठे काम जो करना है.

फेसबुक तो कहीं नहीं जाने वाला, हाँ आपका पता नहीं. यदि 80 के दशक में सिनेमा खुद को नहीं सुधारता तो आज उसका कोई नामलेवा नहीं होता. अहंकार न कीजिये, उसकी भी एक उम्र होती है.

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