सद्गुरु का नृत्य और देवताओं का आकाश से फूल बरसाना

स्वामी ध्यान विनय के साथ कोई गीत सुनना दोगुना आनंद देता है. गीत के अनुभव के साथ, गीत की ताल पर उनकी ऊंगलियों की थाप और उनका गीत से अधिक उसके संगीत के साथ एकाकार हो जाना. फिर चाहे उनके सामने टेबल हो या खाली मटका. उनकी लहराती ऊंगलियों के साथ उनके चेहरे पर आये भाव को देखकर ही कोई भी ध्यानमग्न हो जाए, फिर मेरी तो बात ही क्या.

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स्वामी ध्यान विनय

ऐसे ही उनके साथ दो दिन पहले पहली बार भवानी अष्टकम सुन रही थी. चूंकि उसके साथ श्लोक के अर्थ भी लिखे हुए थे तो मैं साथ में पढ़ती भी जा रही थी… एक एक शब्द का उच्चारण संगीत के साथ मेरे ह्रदय पर जादुई असर कर रहा था. लगा जैसे इस समय श्लोक के अर्थ पढ़ना इतना आवश्यक नहीं जितना उसको आँख बंद कर उसमें डूब जाना.

समाप्त होने पर मैंने उनसे पूछा क्या मन्त्र के अर्थ पता न हो तब भी वो उतने ही असर करते हैं? उनका जवाब था हाँ बिलकुल करते हैं. लेकिन जैसे आप किसी गीत के बोल पर ही अटक जाती हैं और तब मैं कहता हूँ कि इस गाने में तबला सुनिए, इस में एक बार गिटार का एक तार जो छन्न से बजा है वो सुनिए, तो इस गीत में हारमोनियम सुनिए, तो बांसुरी सुनिए, तब उस गीत का असर एक अलग स्तर पर जाकर होता है. लेकिन उसे वही समझ सकता है जिसे संगीत का ज्ञान हो कि इस गीत में कौन सा स्वर है, कौन सा राग है, इस राग का आरोह अवरोह क्या है, इसके कौन कौन से स्वर विकृत और/या विवादी हैं, राग की जाति क्या है, किस ताल में निबद्ध है… तो उस पर गीत अलग तरह से काम करेगा. क्योंकि संगीत की समझ न होने पर आपको ये तो अनुभव होगा कि पता नहीं क्यों ये गाना बहुत अच्छा लग रहा है लेकिन संगीत की समझ होने पर आपको पता चलेगा कि गाना क्यों अच्छा लग रहा है. और वैसे भी ब्रह्माण्ड में जो संगीत विद्यमान है उस संगीत से जब किसी गीत का संगीत एकाकार हो जाता है और आप उस तल पर जाकर अनुभव कर पाते हैं तो वो संगीत ही आपको ध्यान की ऊंचाइयों तक ले जाता है.

खैर ना उस ध्यान की, ना इस “ध्यान” की ऊंचाइयों तक पहुँचने की मेरी पात्रता अभी है, लेकिन कई बार कोई गीत संगीत मुझे इतना अधिक प्रभावित करता है कि उसके पीछे कारण मैं खुद समझ नहीं पाती. हाँ उसके पीछे जो मुख्य कारण मुझे दिखाई देता है वो है उस समय की आप की परिस्थितियों के कारण उपजा भाव. ऐसे ही एक लम्बी पीड़ा से गुज़रने के बाद दो दिन पहले यह गीत प्रकट हुआ और लगा जैसे यह गीत उस पीड़ादायी यज्ञ में अंतिम आहुति था.

कारण यहाँ बहुत सारे हैं –
पहला यह गीत सद्गुरु पर फिल्माया गया है.
दूसरा उस गीत पर सद्गुरु का नृत्य.
तीसरा उस गीत का उद्देश्य.

हालांकि यह गीत हिन्दी में नहीं है इसलिए उसका एक भी बोल मुझे समझ नहीं आया लेकिन उसका एक एक दृश्य जैसे उसके नृत्य के साथ एकाकार कर गया. यहाँ एक मुख्य कारण यह भी है कि जब आप पीड़ा में होते हैं तो इतने संकुचित रहते हैं कि अपनी खोल से बाहर निकल कर देख ही नहीं पाते कि अस्तित्व लगातार हम पर किसी न किसी रूप में कृपा बरसा रहा है, ये तो हम ही हैं जो अपने सारे दरवाज़े बंद करके बैठे हैं.

आपकी हर पीड़ा प्रसव पीड़ा के समान है, आपकी आत्मा उस पीड़ा से गुज़रकर ही प्रेम को जन्म देती है… इस प्रेमसँख्या को बढ़ाइए… और पृथ्वी ही नहीं पूरे ब्रह्माण्ड में गूंजने दीजिये किलकारियां… छोटी छोटी खुशी की किलकारियां, प्रेम की किलकारियां…

आप अपने सारे दरवाज़े खोल दीजिये और साक्षी भाव से देखिये कैसे अस्तित्व आपके दरवाजों के बीच की दीवारों को भी गिरा रहा है. आप चारों तरफ से खुल चुके हैं और आप पर अस्तित्व बरस रहा है जिसे हमारे ग्रंथों में देवताओं द्वारा फूल बरसाने से तुलना की गयी है.

इस वीडियो को देखते हुए बस मुझे यही अनुभव हुआ जैसे आकाश से देवता फूल बरसा रहे हैं और मेरी अंतरात्मा भी जैसे सद्गुरु की नृत्य मुद्रा के साथ एकाकार होकर नृत्य कर रही है. वास्तव में ऐसा होता है या नहीं उसे देखने वाली आँखें तो ध्यान में उतरकर ही मिल पाएगी लेकिन उस ध्यान में उतरने के पूर्व की तैयारी है ये इस भाव का आना कि फूल बरस रहे हैं. आपकी दुनिया आपके अंतर्मन के भाव से ही चलती है. आप जैसा भाव करेंगे आपके आसपास की दुनिया वैसे ही संचालित होगी.

वैसे ही आप जब योगियों की ऊंगलियों की एक एक हरकत को समर्पण के भाव के साथ देखेंगे तो अनुभव होगा कि वो यूं ही नहीं उठ रही होती जैसे हमारी आपकी, उनका लहराना ऐसे अभिमंत्रित करता है जैसे कि कोई मंत्र. क्योंकि उनका इस धरती पर प्रादुर्भाव ही इस उद्देश्य से किया गया होता है. इसलिए उनके बोलने का तरीका, चलने का तरीका, देखने का तरीका, एक एक भाव भंगिमा अस्तित्व द्वारा संचालित होती है, जो किसी वृहद्द उद्देश्य के लिए होती है. फिर चाहे वो ओशो की आँखें और ऊंगलियों का लहराना हो, मुरारी बापू का कथा बांचते हुए किसी गीत पर भाव विभोर हो जाना हो, श्री श्री रविशंकर का किसी गीत पर थिरकते हुए लोगों को फूल बांटना, या सद्गुरु का नृत्य करना और फिर यहाँ तो स्वामी ध्यान विनय को साक्षात देख पाने का सुअवसर होता है मेरे पास.

स्वामी ध्यान विनय कई बार कह चुके हैं सबकुछ ब्रह्माण्ड के नाद पर ही तो टिका है. कोई भी गीत, स्वर, राग नाद के बिना संभव नहीं. ये पूरा संसार ही नादात्मक है. और जब वो कोई बात कहते हैं तो अस्तित्व उसे और विस्तृत रूप से समझाने के लिए मेरे सामने जादू की तरह कोई न कोई ऐसा उदाहरण अवश्य प्रस्तुत कर देता है जिससे स्वामी ध्यान विनय को मुझे छेड़ने का अवसर मिल जाता है कि हम कह रहे हैं तो आपको यकीन नहीं, अब जब आपके सद्गुरु कहने आये हैं वही बात, तो यकीन हो गया.

जी हाँ उनकी इस बात की पुष्टि करता हुआ सद्गुरु का एक वीडियो और मिला है. ऊपर दिये वीडियो को देखकर मेरी बात से आप सहमत हैं तो सद्गुरु की इस बात से भी सहमत होंगे जो उन्होंने शास्त्रीय संगीत के बारे में कही है –

Music is just a pleasant arrangement of sounds. We may add words to the music. These words have meanings, but the meanings are not existential. We make up the meanings. They are psychological and cultural. They are not existentially true. But sound is an existential reality. It is a reverberation that exists. Every kind of arrangement of these reverberations has different kinds of impacts on the human system and on our surroundings. There are some experiments that have been conducted to show how cows produce more milk if you play a certain kind of music. This is just one silly usage of it but it is actually true. Sound patterns, if used properly, can have a tremendous effect because physical existence is essentially a complex amalgamation of reverberations or sounds.
Indian classical music is the only form of music that has a formula behind it, which can be used in many permutations and combinations.

If you arrange sounds in a certain pattern, it has a certain kind of impact. In this culture, we explored different patterns and came up with mantras. A mantra is a technically correct arrangement of sound, but it need not necessarily be aesthetically pleasing. With a mantra, the technical correctness is more important than the aesthetic enjoyment that one may have. Indian classical music is a modification of mantras, where aesthetics become as important as the technical arrangement of sounds.

Indian classical music is the only form of music that has a formula behind it, which can be used in many permutations and combinations. All the other forms of music are just playing it by the ear. There is no technical perfection. But with Indian classical music – especially in southern India – there is so much mathematics involved. A musician is always counting, and eventually learns to count without counting because there is a mathematical formula over which the entire musical structure is built.

When I say a mathematical formula, we must understand the entire physical universe can be reduced to mathematical formulas. This is what modern science is endeavoring to do. Mathematics is not something that we made up. Mathematics is the backbone of creation itself. It is one way of interpreting physical creation. This is why a mathematical backbone is expected for any new theory that comes up. Otherwise it is not considered real because there is a fundamental geometry in the universe. Music is an arrangement where initially, if you are learning, it feels like numbers. After some time, it feels like geometrical patterns. After that, it just flows like a river, depending on how much mastery you have over it.

 

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