देश को मेक इन इंडिया से अधिक ज़रूरत है भारत निर्माण की

कुछ माह पूर्व मप्र सरकार ने दलितों को मन्दिर का पुजारी नियुक्त करने का आदेश जारी किया गया था… जिसको कि पारम्परिक पुजारी समुदाय के जोरदार विरोध के कारण स्थगित कर दिया गया.

यह निर्णय उचित था या अनुचित यह आमजन की समझ के बाहर है. यदि सरकार इस योजना की जगह प्रत्येक मन्दिर के साथ एक संस्कृत पाठशाला खोले ओर उसमें आरक्षण का पालन कर संस्कृत शिक्षकों को नियुक्त करे तो उसका समाज के किसी वर्ग द्वारा विरोध नहीं किया जाता.

इसी पाठशला मे योग आयुर्वेद पारम्परिक वेदिक ज्ञान और धार्मिक ग्रंथों की विज्ञान सम्मत पढ़ाई भी कराई जाये. इससे ना सिर्फ रोजगार बढ़ेगा बल्कि इससे हिन्दू धर्म और संस्कृति के अध्ययन और मनन के लिये भी लोगो में अभिरुचि बढ़ेगी.

इसी प्रकार प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर एक गोशाला खोली जा सकती है. जहां गाय के दूध और दुग्ध उत्पादों के प्रसन्सकरण की ईकाई लगाई जाये. साथ ही देशी गोबर की खाद, देशी बीज और आयुर्वेदिक पौधों की नर्सरी भी इसी परिसर में प्रारम्भ की जाये.

इन सारी योजनाओं का व्यय मन्दिरों में आने वाली दानराशि से किया जा सकता है. जिसकी निगरानी के लिए हिन्दू संतों एक राष्ट्रीय समिति बनाई जाये.

इन योजनाओं से कितने लोगों को रोजगार मिल सकता है और हिंदुत्व का कितना भला होगा, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं. और लगता नहीं कि इन योजनाओं का विरोध समाज का कोई भी वर्ग करेगा. इन योजनाओं से गोरक्षा के साथ गोरक्षकों को भी रोजगार और गोसेवा करने का अवसर मिलेगा साथ ही जमीनी स्तर पर कितना बड़ा राष्ट्रवादियों के वोट बैंक का जनाधार बन जायेगा इसका अंदाजा लगाना कोई कठिन काम नहीं है.

इसका मतलब ये नहीं है कि मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया बन्द कर दी जाये. पर सरकार को मेक इन इंडिया के साथ भारत निर्माण योजना भी शुरू करना चाहिये. जिससे कि सूटेड बूटेड इंडियन के साथ साथ आम भारतीयों का भी कुछ विकास हो सके.

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