मरने से पहले सरदार उधम सिंह ने थूक दिया था अंग्रेजों पर

उधम सिंह के शब्दों में उनके समय के क्रांतिकारियों, करतार सिंह सराभा और भगत सिंह, की प्रतिध्वनि सुनाई देती है. ओ’ड्वायर को मारने से पहले उन्होंने कहा था:

“मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता, मरने से मुझे कोई समस्या नहीं है. बुढ़ापे तक इंतज़ार करने का क्या मतलब है? उससे कुछ नहीं होनेवाला. मरना ही है तो जवानी में मरना बेहतर है. ये बेहतर है क्योंकि मुझे पता तो है कि मैं क्या कर रहा हूँ!”

थोड़ी देर रुकने के बाद उन्होंने फिर कहा: “मैं अपनी मातृभूमि के लिए मर रहा हूँ.”

13 मार्च 1940 को दिए गए एक बयान में उन्होंने कहा था:

“मैंने अपना विरोध जताने के लिए गोली चलाई थी. मैंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के भारत में लोगों को भूख से मरते हुए देखा है. मैंने ही वो किया (गोली चलाई)… पिस्तौल तीन या चार बार चली. मैं अपने विरोध के लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा. ऐसा करना मेरा कर्म था. थोड़ा और बढ़ा दो (मेरी सज़ा). सिर्फ इसलिए कि मैंने अपनी मातृभूमि के लिए ये विरोध किया, मुझे इस सज़ा से कोई समस्या नहीं. दस, बीस या पचास साल या कि मुझे टाँग ही दो (फाँसी पर)… मैंने अपना कर्म किया है.”

जब जज एटकिन्सन ने पूछा कि उन्हें इस संदर्भ में कुछ कहना है कि ‘क्यों ना उन्हें कानून के मुताबिक़ ये सज़ा दी जाय’, तो उन्होंने ये बयान दिया:

मैं कहता हूँ ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो. तुम कहते हो भारत में शांति नहीं है! हमारे हिस्से सिर्फ ग़ुलामी है. तथाकथित सभ्यताओं की पीढ़ी दर पीढ़ी ने हमारे ऊपर मानव जाति को ज्ञात हर तरह की घटिया और नीच क़िस्म के अत्याचार किए. तुम्हें बस ये करना है कि अपना इतिहास पलटकर पढ़ लो. अगर तुम्हारे अंदर रत्ती भर भी मानवीय शालीनता है, तो तुम्हें शर्म से मर जाना चाहिए. जिस क्रूरता और रक्तपिपासु प्रवृति के तथाकथित बुद्धिजीवी हैं, और खुद को सभ्यताओं का शासक कहते फिरते हैं, वो दोगले हैं…”

जस्टिस एटकिन्सन: मैं तुम्हारे राजनैतिक भाषण को नहीं सुनने वाला. अगर इस केस से जुड़ी कुछ काम की बात हो, तो कहो.

उधम सिंह: मुझे ये कहना है. मैं विरोध करना चाहता हूँ.
(उधम सिंह ने अपने हाथों में पकड़े काग़ज़ के पन्नों को लहराकर कहा)

जस्टिस एटकिन्सन: क्या वो अंग्रेज़ी में है?

उधम सिंह: मैं तो पढ़ रहा हूँ तुम्हें बख़ूबी समझ में आएगा.

जस्टिस एटकिन्सन: मुझे बेहतर समझ में आएगा अगर तुमने मुझे वो पढ़ने को दे दिया.

उधम सिंह: मैं चाहता हूँ कि पूरी ज्यूरी इसे सुने.

जस्टिस एटकिन्सन: तुम ये जान लो कि तुम जो भी कह रहे हो, उसमें से कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जाएगा. जो भी कहना है केस के संदर्भ में संक्षिप्त रूप में कहो. चलो, बोलो.

उधम सिंह: मैं विरोध कर रहा हूँ. यही मेरा मानना है. मैं तो उस भाषण के संदर्भ में निर्दोष हूँ. ज्यूरी को उस भाषण को लेकर बहलाया गया है. मैं अब इसे पढ़ रहा हूँ.

जस्टिस एटकिन्सन: ठीक है, पढ़ो. और ध्यान रहे उतना ही बोलो कि ‘क्यों ना तुम्हारे ऊपर कानून के हिसाब से सज़ा सुनाई जाय.’

उधम सिंह: (चिल्लाते हुए) मुझे सज़ा से कोई लेना-देना नहीं. ये मेरे लिए कोई मतलब नहीं रखता. मुझे मौत या किसी अन्य चीज़ से फ़र्क़ नहीं पड़ता. मुझे रत्ती भर भी चिंता नहीं है. मैं एक उद्देश्य के लिए मर रहा हूँ. (कटघरे पर ज़ोर-ज़ोर से हाथ मारकर आवाज़ करते हुए उधम सिंह बोलते रहे) हम इस ब्रिटिश साम्राज्य से त्रस्त हैं. (धीमी आवाज़ में पढ़ना जारी रहा) मुझे मरने से डर नहीं लगता. मुझे तो मरने पर गर्व है, गर्व है कि मैं अपने देश को आज़ाद करा पाऊंगा. मुझे आशा है कि जब मैं चला जाऊंगा तो मेरे जैसे हज़ारों मेरी जगह लेंगे और तुम्हारे जैसे घटिया कुत्तों को अपने देश से निकाल बाहर करेंगे; देश को आज़ाद कराएँगे.

मैं एक अंग्रेज़ी ज्यूरी के समक्ष हूँ. मैं एक अंग्रेज़ी कोर्ट में हूँ. तुम लोग भारत जाते हो, और जब वहाँ से आते हो तो तुम्हें पुरस्कार दिया जाता है और हाउस ऑफ कॉमन्स में चुना जाता है. और जब हम इंग्लैंड में आते हैं, तो हमें मौत की सज़ा सुनाई जाती है!

मेरा कोई मतलब था ही नहीं; लेकिन मैं इसे भी स्वीकार करूँगा. मुझे इसके किसी भी हिस्से से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. लेकिन जब तुम्हारे जैसे नीच कुत्ते भारत आएँगे, तो एक समय आएगा जब तुम्हारा भारत से सफ़ाया हो जाएगा. तुम्हारा सारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद चकनाचूर कर दिया जाएगा.

भारत की सड़कों पर मशीनगनें हजारों गरीब औरतों और बच्चों को मार देती है, ताकि तुम्हारे तथाकथित प्रजातंत्र और ईसाइयत का ध्वज लहराता रहे.

तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारा व्यवहार – मैं ब्रिटिश सरकार की बात कर रहा हूँ. मुझे ब्रिटिश लोगों से कोई रंजिश नहीं है. मेरे तो भारत की अपेक्षा ज्यादा अंग्रेज़ मित्र यहाँ हैं. मुझे इंग्लैंड के मज़दूरों से सहानुभूति है. मैं इस साम्राज्यवादी सरकार के ख़िलाफ़ हूँ.

आप लोग तो स्वयं पीड़ित हैं, जो मज़दूर हैं. हर कोई इन गंदे कुत्तों से पीड़ित है; ये पागल जानवर हैं. भारत (में) सिर्फ ग़ुलामी है. क़त्लेआम, लाशों के टुकड़े करना, तबाही फैलाना – यही ब्रिटिश साम्राज्यवाद है. लोग इन बातों को अख़बारों में नहीं पढ़ते. हमें पता है कि भारत में क्या हो रहा है.

जस्टिस एटकिन्सन: मैं अब और नहीं सुनने वाला.

उधम सिंह: तुम और नहीं सुनना चाहते क्योंकि तुम मेरे भाषण को सुनते-सुनते थक गए हो, क्यों? मुझे अभी और भी बहुत कुछ कहना है.

जस्टिस एटकिन्सन: मैं उस बयान से एक भी शब्द और नहीं सुनने वाला.

उधम सिंह: तुमने पूछा कि मुझे और क्या कहना है. मैं कह रहा हूँ. क्योंकि तुम लोग नीच हो. तुम्हें ये नहीं सुनना कि तुम भारत में क्या कर रहे हो.

फिर उधम सिंह ने अपनी ऐनक जेब में रखी और तीन शब्द हिन्दुस्तानी में कहे. और फिर ज़ोर से चिल्लाकर कहा ‘डाउन विथ ब्रिटिश इम्पीरियलिज़्म, डाउन विथ ब्रिटिश डर्टी डॉग्स!’ फिर जब वो जाने के लिए मुड़े तो सॉलिसिटर की टेबल पर थूक दिया. जब वो कटघरे से बाहर आ गए तो जज ने प्रेस से कहा:

“मैं प्रेस को ये निर्देश देता हूँ कि इस बयान का कोई भी हिस्सा रिपोर्ट ना किया जाय जो कि अभियुक्त ने कटघरे से कहा. क्या आप समझ रहे हैं, प्रेस के मेम्बरान?”

(अजीत भारती द्वारा अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद)

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