मायावी राक्षस कालनेमि मरा नहीं, बस बन गया है ‘लालनेमि’

रामायणकाल का मायावी राक्षस कालनेमि रावण का विश्वस्त अनुचर था. यह भयंकर मायावी और क्रूर था. इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक थी. रावण ने इसे एक बहुत ही कठिन कार्य सौंप दिया था .

जब राम-रावण युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति लगने से वे बेहोश हो गए थे, तब हनुमान जी को तुरंत ही संजीवनी लाने का कहा गया था. हनुमान जी जब द्रोणाचल की ओर चले तो रावण ने उनके मार्ग में विघ्न उपस्थित करने के लिए कालनेमि को भेजा.

कालनेमि ने अपनी माया से सरोवर, मंदिर और सुंदर बगीचा बनाया और वह वहीं एक ऋषि का वेश धारण कर मार्ग में बैठ गया. हनुमान जी उस स्थान को देखकर वहां श्रम परिहार के लिए उतर गए.

वहां कालनेमि ने उनका स्वागत किया और जलपान का आग्रह किया. मगर हनुमान जी ने केवल स्नान की इच्छा जताई तो उन्हें सरोवर में स्नान करने कहा.

हनुमान जी जैसे ही सरोवर में प्रविष्ट हुए तो तो एक मगरी ने अकुलाकर उसी समय हनुमान जी का पैर पकड़ लिया. इस पर हनुमान जी ने उसे मार डाला तो वह मगरी एक अप्सरा बन गई.

उसे एक शाप मिला था जिससे वो मुक्त हो गयी. प्रसन्न हो कर उसने हनुमान जी को कालनेमि का सत्य स्वरूप बता दिया. फिर हनुमान जी ने अपनी पूंछ से कालनेमि को जकड़ कर उसका वध कर दिया.

क्या कालनेमि को वाकई मारा था हनुमान जी ने? या जैसे वे चिरंजीव हैं वैसे क्या कालनेमि भी चिरंजीव नहीं है?

मेरा मानना है कि कालनेमि भी मरा नहीं और आज भी है. बस समय के चलते आज उसका नाम लालनेमि वामपंथी हुआ है. विद्वत्ता का स्वांग रचाए हनुमान जी के मार्ग में यथाशक्ति अवरोध उत्पन्न करने की उसकी कुचेष्टा आज भी अनवरत चालू है.

एक कथा में उल्लेख है कि जब हनुमान जी उस मायावी के आश्रम में उतरे तब वो शिवलिंग पर अभिषेक कर रहा था. एक चित्र भी था साथ में. सो, बस थोड़े से फेरफार के साथ प्रस्तुत है.

आज लोकसभा में “लिंचिंग” पर एक जबर्दस्त भाषण में सांसद श्री हुकुमदेव नारायण यादव जी ने कालनेमि का उल्लेख किया. उनका भी मानना है कि कालनेमि आज भी है. अब उनसे मेरा परिचय तो है नहीं कि जान लूँ कि क्या हमारे विचार एक जैसे हैं या नहीं.

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