अंग्रेज़ी गालियां स्वीकार, पर हिंदी में गाली की सृजनशीलता बिल्कुल भी गवारा नहीं!

आज मैं यह सोच रहा था कि यह अमर्यादित शब्द (जिसे बोलचाल की भाषा में गालियां कहा जाता है) भी क्या चीज़ है जिसे हमारा ही समाज जहां एक भाषा में इसको बड़े सहज रूप से स्वीकार भी कर लेता है और बिना हीनता के उसको बोल चाल में प्रयोग भी कर लेता है. वहीं जब यह शब्द, अपनी मातृ भाषा, हिंदी में कोई बोलता है या उसके लिखे को पढ़ता है तो इसी समाज की शुचिता उसे न स्वीकार कर पाती है और न ही इसके कारक को हीनता का बोध कराने परहेज़ कर पाती है.

अब क्योंकि मैं अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में ही संवाद करता हूँ तो मैने जीवन में इस बौद्धिक सामाजिक दोगलेपन को बड़े करीब से न सिर्फ देखा है बल्कि इसको बिना किसी हीन भावना के जिया भी है. मैं यहां पर कोई अपवाद नहीं हूँ क्योंकि अंग्रेज़ी में अमर्यादित भाषा जिन्हें गालियां या abuses कहते हैं, का प्रचलन और उसकी स्वीकार्यता वामपंथी जगत में बहुत पहले से है और आज की हाय-बाय वाली पीढ़ी में तो यह उनके शब्दकोश का हिस्सा है.

मुझे आज इस विरोधाभास की तीव्रता का तब एहसास हुआ जब मैंने, अंग्रेज़ी में यह लेख लिखने की कोशिश की और अंग्रेज़ी की गालियों को जिन्हें लोग बड़े सहज भाव से बोल देते है या लिख देते है, उनका हिंदी में अनुवाद करने का प्रयास किया. मैंने जब कोशिश की तब मेरी लेखनी एक-दो शब्दों के अनुवाद से ज्यादा बढ़ ही नहीं पायी!

मैंने अक्सर यह देखा है कि आंग्ल भाषा के वातावरण से लदे हुये किसी भी बौद्धिक विमर्श में या सामाजिक मेल मिलाप में, अंग्रेजी में फक, शिट, फक यू, बिच, फकर, सन ऑफ बिच, मदरफकर कहा जाना और उसका सुना जाना कोई विशेष नहीं होता है लेकिन इसी बौद्धिक समाज को इसके हिंदी भाई बन्धुओं का कहा जाना या सुना जाना स्वीकार नहीं करता है. इसका अर्थ यही हुआ है कि भारत की बौद्धिकता और बुद्धिजीविता के ठेकेदारों को सिर्फ अंग्रेज़ी की गालियां स्वीकार हैं और उन्हें हिंदी में गाली की सृजनशीलता बिल्कुल भी गवारा नहीं है.

मैं जब अंग्रेज़ी की गालियों का हिंदी में अर्थ लिख रहा तब सबसे अजीब बात यह पता चली कि जहां मुझे अन्य अंग्रेज़ी की गालियों के हिंदी में अर्थ को अपनी लेखनी में जगह देने में हिचकिचाहट थी, वहीं अंग्रेज़ी की गाली “फ़क ऑफ” जो सुनने में वीभत्स लगती है उसका हिंदी में अर्थ आश्चर्यजनक रूप से बड़ा मध्यम है, जिसे हिंदी में “बकवास बन्द” कहा जाता है.

यह वही ‘फ़क ऑफ’ है, जो मुझे हिंदी में कहीं भी आहत नहीं करता है लेकिन जब खिसिया के एक अप्रसांगिक हुआ व सठिया गया वामपंथी कवि डबराल बोल देता है तो अंग्रेज़ी के भावार्थ से आहत एक लेखनी, फेसबुक पर राष्ट्र, राष्ट्रवादिता, हिंदुत्व, संघ और वामपंथ के शास्त्रार्थ को जन्म दे जाती है.

अच्छा है, बहुत अच्छा है, यह शास्त्रार्थ होना चाहिये ताकि इन सब पर चर्चा, भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में और आक्रमकता से हो. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज भी इन विषयों पर चिंतन, पाश्चात्य व वामी दर्शन के परिप्रेक्ष्य में होता है और जिसमें खुद को हिंदुत्व से अलग खड़ा करना तटस्थता की पहली शर्त मानी जाती है.

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