इतनी प्राचीन सभ्यता की एक ज़िंदा कौम, 70 सालों तक कैसे बर्दाश्त करती रही झूठ!

रामचंद्र गुहा उस बौद्धिक गिरोह के सक्रिय सदस्य हैं जिन्हें हिन्दुस्तान के राजपरिवार से सदा भरपूर प्रोत्साहन मिला. इसे दरबारी लेखन भी कहते हैं. रामचंद्र गुहा की तो दुकान ही गांधी ब्रांड को बेचने से चली. लेखन की उसी दुकान से उन्होंने फिर नकली गांधी परिवार को भी खूब बेचा और खूब नाम कमाया. लेकिन आजकल वे वर्तमान के कांग्रेस नेतृत्व से दूर होते नजर आते हैं.

शायद वे समय की दीवार पर लिखा पढ़ने में अपने दूसरे दरबारी लेखकों से अधिक बेहतर दृष्टि रखते हैं. आज उन्होंने एक बार फिर इंदिरा, राजीव और सोनिया से लेकर राहुल की कमी को स्वीकार करते हुए लेख लिखा लेकिन वे अब भी नेहरू के प्रभाव से मुक्त होते नजर नहीं आते. कदाचित यह इसलिए कि गुहा की तो दुकान ही गांधी ब्रांड की है और नेहरू को गांधी के राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता है.

गुहा अपने लेख के अंत में पाठको से यह उम्मीद करते नजर आये कि कोई स्कॉलर अभिलेखागार में कठोर मेहनत कर नेहरू और उनकी विरासत का अधिक वस्तुपरक आंकलन करेगा. अब चूँकि वे स्वयं नेहरू के बारे में जानने के लिए उत्सुक नज़र आये तो मैं उनके लिए नेहरू की नीतियों में कमी और विफलता के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर डाल देता हूँ. विस्तार में लिखने लगूंगा तो एक ग्रन्थ लिखा जाएगा.

बाकी रही नेहरू की सफलता की कहानी तो वो गुहा जैसे दरबारी लेखकों ने लिख लिख कर कई कागज पहले ही बेकार में काले कर रखे हैं. आइये नेहरू की कमियों के बार में बात की जाए जिसके लिए किसी अभिलेखागार में भी जाने की ज़रूरत नहीं.

1. नेहरू, गांधी द्वारा थोपे गए राजनेता थे. वे ज़मीन से जुड़े नेता नहीं थे, ऐसे में उनकी नीतियां कैसे लोक हित में हो सकती हैं. उन्होंने गरीबी देखी नहीं, भोगी नहीं, इसलिए उनकी किसी भी नीतियों में देश का गरीब कभी था ही नहीं. यह उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी जिसका भुगतान भारत आज तक कर रहा है.

2. नेहरू अंग्रेज़ी संस्कृति में पले बड़े थे. गोरी चमड़ी का आकर्षण उन दिनों गरीब और गुलाम हिंदू समाज में था. उसी का वे फायदा उठा ले गए. स्वतंत्र देश के पहले प्रधानमंत्री का एक ‘काला अंग्रेज़’ होना ही देश का अभिशाप बन गया. नेहरू हिन्दुस्तान की आत्मा से दूर थे और इसलिए भारत को इंग्लैंड की स्वतंत्र कॉलोनी बनाने में लग गए. शायद यही कारण रहा कि हम स्वतंत्र हो कर भी स्वतंत्र नहीं हो पाए थे.

3. जिन्ना या मुस्लिम लीग को पाकिस्‍तान का निर्माता कहना बेमानी होगा क्योंकि पाकिस्‍तान का निर्माता और कोई नहीं नेहरू और कांग्रेस का कमज़ोर नेतृत्‍व था. बंटवारे और बाद में दिए गए नेहरू के अनेक कथन, स्वयं ही कांग्रेस की कमज़ोरी तथा उनकी सत्‍ता लोलुपता को बयान करते रहे हैं. सच तो यह है कि कांग्रेस किसी प्रकार से स्वतंत्रता लेना चाहती थी, चाहे फिर वो विभाजन से ही क्यों न हो. कुछ समकालीन कांग्रेसी तो यह तक कहते थे की नेहरू कि महत्वकांक्षाओं के सामने गांधी भी टूट चुके थे.

4. गाँधी ने अनेक योग्य नेताओं की उपेक्षा करके नेहरू को देश का प्रधानमंत्री बनवाया था. गांधी की नेतृत्‍व चयन की भूल और नेहरू की महत्‍वकांक्षाओं का परिणाम था कि आज विभाजित भारत हम देख रहे हैं. आज अगर देश में 18-20 करोड़ मुसलमान स्वतंत्रतापूर्वक रह सकते हैं तो आज से 70 साल पहले 4-5 करोड़ मुसलमान भी रह सकते थे. तब की कांग्रेस के सत्‍ता भोगी नेतृत्‍व का ही परिणाम आज हमारे सामने है. ये पाले हुए इतिहासकार यह क्यों नहीं बतलाते कि तत्कालीन समय में अंग्रेज़ो का भारत छोड़ना अपरिहार्य हो गया था किन्‍तु वास्‍तव में विभाजन अपरिहार्य नहीं था.

5. सेक्युलरिज्म नाम का भयानक जानलेवा रोग नेहरू की ही देन है. यह इसलिए कहा जाना चाहिए कि इस्लाम कभी सेक्युलर नहीं हो सकता. ऐसे में नेहरू ने धर्म आधारित बंटवारे को स्वीकार तो किया मगर अपने घर में बँटवारा मांगने वालों को रोक भी लिया. इससे बड़ी अदूरदर्शिता किसी राष्ट्र की राजनीति में कोई और नहीं हो सकती.

6. नेहरू परिवारवादी थे. हिन्दुस्तान की राजनीति में परिवारवाद का बीज उन्हीं के द्वारा बोया गया था, जो अब विशाल पेड़ बन चुका है. इस की जड़ों ने लोकतंत्र को खोखला कर दिया. इससे किसी तरह बचने में आज सम्पूर्ण देश संघर्षरत है.

7. नेहरू का चरित्र और व्यक्तिगत आचरण कालांतर में कांग्रेस का चरित्र बन गया. जिसने फिर राजनीति और समाज के चरित्र में वो ज़हर घोला जिसका फिर कोई इलाज नहीं. इस पर विस्तार से लिखने पर मुझे अश्लील होना पड़ेगा जिससे मैं बचना चाहूंगा. मगर इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि किसी राजनैतिक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का चरित्र पार्टी पर असर करता है और अगर वो पार्टी देश की प्रमुख पार्टी हो तो वो सत्ता के गलियारे से होते हुए फिर धीरे-धीरे पूरे देश और समाज पर गलत प्रभाव डालती है. और नेहरू का जीवन एक खुली किताब है जिसे मुझे पढ़कर यहां सुनाना ज़रूरी नहीं.

8. नेहरू ने लोकतंत्र नहीं राजतंत्र की तरह देश को चलाया. उदाहरण और प्रसंगो से प्रमाणित किया जा सकता है. उन्होंने कभी दूसरे राजनेता को पनपने नहीं दिया. जो उनके समकालीन थे और समकक्ष भी थे, उनके साथ उनके कटु व्यवहार के अनेक किस्से पढ़े जा सकते हैं. फिर चाहे वो पटेल हों या पूर्व में नेता जी या फिर बाद में डॉ राजेंद्र प्रसाद.

9. नेहरू ने सत्ता का अतिरिक्त केंद्रीकरण किया. पटेल और अम्बेडकर के अतिरिक्त क्या हम उस समय के किसी और नेता-मंत्री का नाम भी जानते हैं.

10. नेहरू की कमज़ोर सैन्य-नीति को तो गुहा भी स्वीकार कर रहे हैं. मगर वह किस हद तक मूर्खतापूर्ण थी उसे बताये बिना नहीं समझा जा सकता. आज़ादी के समय जब माऊण्टबेटन ने सुझाया कि एक शक्तिशाली सेनाध्यक्ष (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) होना चाहिए तो नेहरू ने इसे ठुकरा दिया था. नई सरकार बनने के एक सप्ताह के भीतर ही नेहरू रक्षा मंत्रालय गए थे और वहां काम कर रहे सैन्य अधिकारियों को देख कर क्रोधित हो गए. जबकि ऐसे अधिकारी दुनिया भर में प्रत्येक रक्षा मंत्रालय में देखे जा सकते हैं. उनकी इसी अदूरदर्शिता के कारण भारत की सैन्य-स्थिति कमजोर रही जिसका खामियाजा देश ने 1962 में भुगता.

11. भारत के सामरिक हितों के प्रति नेहरू की उपेक्षा का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि 1952 में अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता देने के प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया. नेहरू ने ही आग्रह किया था कि यह सीट चीन को दे देनी चाहिए.

12. नेहरू की नासमझी कहें या शेख अब्दुल्लाह से अतिरिक्त प्रेम, बहरहाल नेहरू ने ही कश्मीर समस्या दी जिससे देश आज तक जूझ रहा है. अकेले नेहरू ही आज कश्‍मीर के हालात के लिए जिम्‍मेदार हैं. जब कश्मीर पर भारतीय सेना ने 1948 में नियंत्रण कर लिया था तब नेहरू ने भारतीय सेना को वापस बुला लिया और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर बनवा दिया.

13. नेहरू एक छद्म कम्यूनिस्ट थे और रूस तथा चीन की लाल क्रांतियों से प्रभावित थे. फिर भी यदि वे स्वयं को गाँधी का अनुयायी कहते थे, जिनका साम्यवाद से दूर-दूर तक का भी कोई सम्बंध नहीं, तो यह भी नेहरू की एक नीतिगत त्रुटि है, जिसका भुगतान आज तक देश कर रहा है.

14. नेहरू ने वामपंथ को बढ़ावा देकर भारत की शिक्षण संस्थानों पर उनको पदासीन करवा दिया, जो सिर्फ परजीवी हैं. ये वामपंथी बौद्धिक, खून तो भारत का चूस रहे हैं मगर ज़हर देश के युवाओं में भर कर उन्हें देश विरोधी और समाज विरोधी भी बना रहे हैं. नेहरू की गलत शिक्षा नीति से हिन्दुस्तान की आने वाली कई पीढ़ियां बर्बाद हो गई. जेएनयू इसका जीता जागता उदाहरण है.

15. देश की प्राथमिक शिक्षा के प्रति राजकीय उपेक्षा ने तो स्वतंत्र देश की नीव को ही कमज़ोर कर दिया. हिंदी को दोयम दर्ज़ा बना कर नेहरू ने वो नुकसान किया है कि पता नहीं देश कभी उससे उबर भी पायेगा या नहीं.

16. गाँधी के नाम जपने वाले नेहरू ने गाँधी के कई अत्यन्त उपयोगी विचारों को भी रद्दी की टोकरी में फेंक दिया और अपनी साम्यवादी मानसिकता के अनुसार बिल्कुल विपरीत नीतियों पर चले. नेहरू का ज़ोर सिर्फ भारी उद्योगों और बड़े बाँधों पर था, जिनसे उत्पादन भले ही अधिक होता हो, लेकिन रोज़गारों में कमी होती है. इससे जनसंख्या का एक बड़ा भाग रोज़गार से वंचित हो गया और अर्थव्यवस्था पर बोझ बनता चला गया.

नेहरू की नीतियों में कुटीर उद्योगों का कोई नाम नहीं था. उन्होंने इस को बिल्कुल भी प्रोत्साहन नहीं दिया, उलटे उन पर तमाम सरकारी बंदिशें लगाकर उन्हें हतोत्साहित किया. इसका परिणाम सबके सामने है. भारी बेरोजगारी और भयंकर गरीबी देश के लिए अभिशाप बन कर उभरी. उनकी उद्योग नीति के अन्तर्गत हर काम में सरकारी हस्तक्षेप और अर्थव्यवस्था में सरकारी नियंत्रणों की भरमार थी. उनकी इसी समाजवादी आर्थिक नीतियों के कारण देश में इंस्पेक्टर राज और भ्रष्टाचार पनपा. परन्तु अपने पूर्वाग्रहों के कारण वे नीतियाँ बदलने को कभी तैयार नहीं हुए.

विकास के तमाम दावों के बावजूद यह एक तथ्य है कि नेहरू के राज में भारत की आर्थिक विकास दर मात्र 2.5 प्रतिशत वार्षिक रही, जो अत्यन्त ही असंतोषजनक है. नेहरू के समय में खाद्यान्न का संकट हमेशा बना रहा. उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों द्वारा भ्रष्टाचार करने की समस्या उनके सामने ही प्रकट हो गयी थी, परन्तु वे आँखें मूँदे रहे. पिछली सरकार के दौरान देश ने जिस अरबों-खरबों के भ्रष्टाचार को भुगता, उसके बीज नेहरू की नीतियों में ही छिपे थे. नेहरू की आर्थिक नीतियां गरीब विरोधी और गरीबी को पैदा करने वाली थी, जो किसी विशाल देश के लिए विनाशकारी और आत्मघाती होती है.

17. मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल नेहरू की ही देन है. प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरू ने गाँधी के मुस्लिमपरस्त राजनैतिक विचारों को बढ़ावा दिया. इसके पीछे कहीं ना कहीं वोट बैंक की राजनीति भी थी. जिनके कारण देश में सामजिक स्तर पर बहुत हानि पहुँची.

18. नेहरू की विदेश नीति की आलोचना तो उनके खुद के कांग्रेसी भी करते हैं. नेहरू 1947 से 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. इस अवधि में वे अपने विदेश मंत्री भी खुद ही थे. भारत के पहले विदेश सचिव मेनन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है: ”…जब तक भारत स्वतंत्र नहीं हुआ तब तक उसकी अपनी कोई विशेष विदेश नीति नहीं थी… बाद में हमारी नीति जबरन एक व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर रही जोकि विदेश मंत्री जवाहर लाल नेहरू थे.” तिब्बत पर उनका बचकाना दृष्टिकोण और चीन को ना समझ पाना, इसके कुछ एक ऐतिहासिक प्रमाण हैं.

19. सच कहें तो इस्लाम और चीन, दोनों के मूल स्वभाव को समझने में नेहरू से भूल हुई. यह उनकी सोची समझी, व्यक्तिगत हित के लिए रची गई नीति थी या उनकी व्यक्तिगत पसंद, मगर आज इस्लाम और चीन, इन दोनों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता. आज भारत इनमें से एक से आंतरिक और दूसरे से बाह्य रूप से जूझ रहा है. आज की तारीख में यह हमारी प्रमुख समस्या बन गई है.

20. नेहरू की निगाह में सिर्फ वही ज्ञानी था जो अंग्रेज़ी पढता-बोलता था. उनकी दृष्टि में सनातन दर्शन का कोई मूल्य नहीं था और भारत का समृद्ध इतिहास मात्र कल्पना थी. वे उस विचारधारा के छात्र थे जिनकी किताब में हिंदुओं के पास कभी कुछ विशेष नहीं रहा. हिन्दू संस्कृति का मज़ाक बनाने का सिलसिला उनके समय में ही शुरू हुआ. और हर तरफ अंग्रेजी महारानी बन कर विराजमान भी उनकी नीतियों के कारण ही हुई. उसी का दुष्परिणाम है कि रामचंद्र गुहा जैसे अंग्रेज़ी लिखने-पढ़ने वाले ही देश में आज भी बुद्धिजीवी माने जाते हैं.

उपरोक्त तथ्यों के बाद भी कोई नेहरू के गीत गाये तो क्या कहा जा सकता है. यही कहना उचित होगा कि नेहरू की तरह ही नेहरू की वंदना करने वाले तथाकथित बौद्धिक लोग भी देश की नीतियों के लिए नुकसानदायक हैं.

अब तक सिर्फ सोशल मीडिया पर ही राष्ट्रवादी लोग कांग्रेस के वैचारिक पिता यानि जवाहर लाल नेहरू की आलोचना करते थे लेकिन अब तो देश के बड़े-बड़े और जाने-माने लोग भी इसमें शामिल हो गए हैं. और फिर इसमें गलत भी क्या है, नेहरू की अर्थ नीति, विदेश नीति, रक्षा नीति, शिक्षा नीति, मानव संसाधन नीति, उद्योग नीति, तकरीबन सभी नीतियाँ त्रुटिपूर्ण रही, जिसका भुगतान देश निरंतर सत्तर साल से कर रहा है, ऐसे में उनकी वाहवाही कहां तक जायज़ ठहराई जा सकती है.

नेहरू इतने आत्ममुग्ध थे कि उन्होंने स्वयं को ही भारत रत्न दे दिया. वो भी 1955 में जबकि महान नेता और स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री श्रीमान सरदार वल्लभ भाई पटेल साहेब को 1991 में दिया गया. इतिहास के ये दो घटना क्रम ही बहुत कुछ कह रहे हैं.

इसलिए रामचंद्र गुहा, ये आँख मिचौली खेलना बंद करिए और अपने गांधीवादी चश्मे को उतार कर भारत के इतिहास को देखना शुरू करिए. Grow up baby grow up, come out of the shadow of FATHER.

और हाँ, आप जैसे तथाकथित बौद्धिक लोगों का समय अब समाप्त होता है, जब आप लोगों ने एकतरफा इतिहास पढ़ाया. वो ज़माने गए जब अखबार और पत्रिकाओं ने सिर्फ आप जैसो के लेख छाप कर देश की मानसिकता पर कब्जा जमा लिया था. ये सोशल मीडिया का युग है. अब हम जैसे सामान्य लेखक अधिक स्पष्ट और निष्पक्ष, वो भी निस्वार्थ भाव से लिख रहे हैं.

ऐसे में ऐतिहासिक सच जन-जन तक पहुंच रहा है, जिससे कुछ समय बाद देश में नेहरू नाम के साथ वही सब हो, जो माओ और स्तालिन के साथ हुआ तो कोई हैरानी नहीं होगी. हैरानी तो इस बात की है कि इतनी प्राचीन सभ्यता की एक ज़िंदा कौम सत्तर सालों तक तुम लोगों के फैलाये झूठ को कैसे बर्दाश्त करती रही.

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