सही का हीरो : जीवनदीप से दुनिया को रोशन करता एक युवा

जब हम न रहेंगे….

16 फरवरी सन 2015

27 वर्ष का एक दुबला पतला हल्की दाढ़ी वाला युवा अपनी बाइक को अचानक रोकता है. हाँ, पीछे बैठा उसका 22 वर्षीय छोटा भाई चलती बाइक में ही अचानक लस्त होकर लटक सा जाता है.

बड़े भाई रविंद्र को समझ आ जाता है सुमित बेहोश हो गया है.

अभी अभी तो बिलासपुर अपोलो से उसकी डायलिसिस करवा कर वो लौट रहा था. किसी तरह सुमित को संभाल कर बाइक पर सहारे से बैठाता है और मदद मदद चिल्लाता है. लेकिन तेज़ी से आते जाते लोगों में से कोई भी नहीं रुकता. बीच सड़क पर इर्द गिर्द से लोग निकलते जाते हैं.. कुछ तमाशबीन लोग अपनी गाड़ियों को और चालों को धीमा करते हैं लेकिन कोई नहीं रुकता. सुमित की हालत पहले से ख़राब दिखने लगती है.

रविंद्र को पहली बार समझ आता है दुनिया फिल्मों के सीन सी होती है क़िरदार बदल जाते हैं. कभी वो उस तमाशबीन भीड़ का हिस्सा होता है तो कभी भीड़ में तमाशा बनता एक क़िरदार खुद होता है. आज वह तमाशा क़िरदार रविंद्र स्वयं और उसका शायद…. मरता हुआ भाई सुमित था.

बड़ी मुश्किल से दो ऑटोवाले रुकते हैं, एक सुमित को उठाने की बजाय उसके गिरे हुए मोबाइल फोन को चुराकर गायब हो जाता है, और दूसरा ऑटो वाला अंततः रुकता है और भीड़, ट्रैफिक को चीर अपोलो बिलासपुर की ओर बढ़ता है. ट्रैफिक की वजह से धीमा चलता ऑटो रविंद्र को कई प्रकाशवर्ष की दूरी सा लगता. ऑटो से बाहर निकल वह बदहवास सा चिल्लाता रहा हटो, हटो, सीरियस मरीज़ है…. लेकिन उसकी आवाज़ फिल्म के उस फ्रेम की तरह थी जो कि भीड़ से टकराकर उस तक ही लौट आती थी. भयानक सन्नाटे का शोर ली हुई आवाज़.

उसे लगता ये दुनिया इंसान विहीन हो जाये कुछ पल को सुमित्त अस्पताल तक पंहुच जाये. वह कृष्ण होता तो ज़रूर चक्र चला सबको वहीं रोक देता. लेकिन वह एक अदना सा युवा था. भारत का कंप्यूटर पढ़ा हुआ युवा.

अस्पताल के आई सी यू में तेज़ी से सुमित को सी पी आर दिया जा रहा था.

बाहर बैठे रविंद्र को समझ आ रहा था क़ि शायद इस बार सुमित कुछ ज़्यादा ही बीमार है. उसे पहले भी 2 बार हर्ट अटैक हो चुके थे लेकिन दोनों बार वह बचा लिया गया था.

रविंद्र को आईसीयू के बाहर की कुर्सी पर बैठे हुए कैमरे के फ़्लैश की तरह सुमित संग बिताए पल बार बार याद आते रहे.

जब रविंद्र 9 साल का था 5 साल का सुमित खेलते खेलते बुरी तरह गिर गया था. रविंद्र उसे फील्ड पर बैठा बैटिंग करते रहा था.
उस दिन पापा ने रविंद्र से कहा था..

“बेटा वह तेरा छोटा भाई है उसकी रक्षा करना और तकलीफों में साथ देना है तुझे …हमेशा. हम न रहेंगे तो तू ही तो उसका सबकुछ है. हाँ तब भी जब हम न रहेंगे….”

और फिऱ वो देखने लगा सुमित को पापा पुलिस कांस्टेबल की ड्रेस पहने आये दिन कभी इस डॉक्टर कभी उस डॉक्टर के पास ले जाने लगे. सुमित ने दौड़ना बंद सा कर दिया था. बहुत जल्दी थकता. उसे बहुत सरदर्द भी आये दिन होता.

रविंद्र ने पिता और माँ के ख़िलाफ़ जा कर डायलिसिस करवाते रहने का निश्चय किया. क्योंकि उसके माता पिता बचपन से अस्पतालों के चक्कर काटते एक ऐसी बीमारी में थकने लगे थे जो कि ठीक ही नहीं होनी थी.

उसे पिता की ही वह बात हमेशा ज़हन में रही थी कि हम न भी रहे तो तुझे ही छोटे भाई की रक्षा करनी है. हाँ तब भी जब हम न रहेंगे……

डायलिसिस बार बार करने हेतु बनाया जाने वाला फिस्टुला बनवा कर रविंद्र ने सुमित को हर संभव इलाज दिलवाना शुरू किया.

खुद इस समय बैंक की नौकरी करते हुए अस्पतालों के चक्कर, अव्यवस्था, सरकारी नियमों की उलझने, लोगों का असहयोग और अच्छे लोगों का सहयोग सभी अनुभव ज़ैसे प्रकृति उससे करवाने ही यह सब कर रही हो.

रविंद्र को बताया गया राज्य के सरकारी कर्मचारियों के बच्चे की उम्र 18 वर्ष के ऊपर हो जाने पर किसी भी बच्चे को इलाज में सरकारी मदद मिलना बंद हो जाती है.

“यह कैसा कानून है सर? रविंद्र ने एस पी ऑफिस में एस पी साहब से कहा.

सर जो बच्चा डायलिसिस पर हो, हृदय रोगी हो, अच्छे से चल न पाता हो वह आत्मनिर्भर कैसे होगा? और सुमित जैसी बीमारियों के अनेक बच्चे होंगे.”

एसपी ने सरकारी नियम दिखवाये तो दंग थे सब कि मात्र 200 रूपये माह की मदद उसे मिल सकती थी.

ऐसे में रविंद्र ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री इत्यादि को अनेक पत्र लिखे सारे तथ्य और आंकड़े एकत्र कर.

अंततः राज्यपाल का एक पत्र रविंद्र को मिला जिसमें इस नियम को पूर्णतः बदलने की बात थी. अब सरकारी कर्मचारियों के अट्ठारह वर्ष से बड़े बच्चे भी आत्मनिर्भर न हों और परिवार की नियत आय कम हो तो सरकारी मदद का प्रावधान था. (बशर्ते पीड़ित की तनख्वाह/पेंशन रुपये 3050/- से ज़्यादा न हो)

यह जीत रविंद्र की सोच और व्यक्तित्व को पूर्णतः बदलने का एक मोड़ था.

सुमित के इलाज के साथ ही अस्पतालों की सारी व्यवस्था समझना और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल होने के नाते रविंद्र ने याहू, ऑरकुट इत्यादि पर एक नेटवर्क बनाना शुरू कर दिया.

लेकिन आज अपोलो में सुमित नहीं रहा रविंद्र को सुनना ही पड़ा.

सुमित का जीवन, संघर्ष और तकलीफों से भरा था. उन सभी तकलीफों की एक आदत सी इन बीते सालों में लग गयी थी. छोटे भाई से दोस्ती, लड़ाई की अनेक यादें रविंद्र के भीतर थीं.

और यह दुःख, यह ख़ालीपन अस्पतालों का वह अनुभव रविंद्र को किसी दूसरी ओर ही खींच रहा था.

बैंक की नौकरी छोड़ रविंद्र ने अंततः जीवनदीप संस्था की नींव रखी.

जिसमें तेज़ी से लोग जुड़ने लगे. Whatsapp, फेसबुक के आने से इसे गति मिली.

रविंद्र की इमानदारी, परिश्रम, सेवाभाव और ज़ज़्बे की वजह से लोगों ने आर्थिक मदद देना शुरू की. आज हज़ारों लोगों का यह समूह जिसमें इज़ाफ़ा होते ही जा रहा है अनेकों गंभीर मरीजों के जीवन में रोशनी भर रहा है. जिसमें सबसे प्रमुख था एक गरीब बच्चे का किडनी ट्रांसप्लांट करवाना.

सुमित का किडनी ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सकता था. क्योंकि ताकायासु arteritis में इसका फ़ायदा नहीं किंतु रविंद्र को इस बच्चे का ट्रांसप्लांट करवा उस दुःख से राहत मिली जिसे लिए वह जी रहा था.

जीवनदीप, जिस संघर्ष से दीप जला रहा है उसी संघर्ष से रविंद्र ज़ल्द एक एप्प विकसित कर रहे हैं जिनमें भारत के सभी अस्पतालों का डाटा बेस, स्वास्थ्य सम्बंधित सरकारी नियमों की जानकारियां इत्यादि रहेंगी.

रविंद्र लगभग 700 आर टी आई से देश के विभिन्न राज़्यों से आम नागरिकों को जो स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना चाहिए की जानकारी जुटा चुके हैं.

उन्होंने बताया एक आर टी आई के ज़वाब के अनुसार एयर एम्बुलैंस की सुविधा न सिर्फ़ वी आई पी वरन किसी भी आम गंभीर मरीज़ को मिल सकती है नियमानुसार किंतु यह सुविधा कभी न तो सरकारें प्रचारित करती हैं न ही आम व्यक्ति स्वयं को इस लायक समझता है.

सुमित जीवित है रविंद्र में और जीवनदीप में… हाँ वह अमर हुआ है.. उन मासूम बच्चों की आँखों की रोशनी में, किसी और के हीमोग्लोबिन में… मज़्ज़ा में, हाँ वह जीवित है.. तब तक जब तलक मनुष्य जीवित है.

हाँ तब भी जब हम न रहेंगे……

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