सबसे गर्हित अस्पृश्यता : मार्क्सवादियों की फैलाई वैचारिक और सांस्कृतिक अस्पृश्यता

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Bhagwan Singh

बात आज से पैंतीस साल पहले की है. वी.एस. पाठक उन दिनों गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष थे. हड़प्पा सभ्यता और ऋग्वेद के लेखन से पहले मेरी जो समझ थी उससे उनको अवगत कराते हुए यह चाहता था कि वह किसी शोधार्थी से अनुसंधान करायें. मैं अपनी पूरी सामग्री और सहयोग उसे देने को तैयार था.

उन दिनों मेरी नजर में वहां रीडर के पद पर कार्यरत सच्चिदानन्द श्रीवास्तव थे, जो श्रमण संस्कृति पर पाठक जी के निर्देशन में काम कर रहे थे, पर विषय संभल न रहा था. मेरी आरंभ से यह इच्छा थी कि जिन विषयों पर मेरी भिन्न राय है उसके अनुसार उस क्षेत्र में काम करने वाले शोध करें तो वह आधिकारिक भी माना जाएगा और वह लक्ष्य भी पूरा होगा जिसे पूरा करने की सनक मेरी जिन्दगी का दूसरा नाम है.

मुझे हर बार यह लगता रहा कि यह काम जिस स्तर का और जिस जिस सलीके से होना चाहिए, वैसा मुझसे सरकारी काम काज की व्यस्तताओं, पुस्तकों, परामर्शदाताओं और किसी विशेषज्ञ के निर्देशन के अभाव के कारण हो न पायेगा. काम कोई करे, श्रेय किसी को मिले, इसकी मुझे, चिन्ता नहीं थी. इसका होना ज़रूरी है, यह एकमात्र बेचैनी थी.

मुझे समझने में लोग अक्सर कई तरह की गलतियां करते हैं, परन्तु मैं अन्य किसी प्रलोभन की बात तो दूर यशलिप्सा से भी, जो महान पुरुषों की भी दुर्बलता मानी जाती रही है, लगभग विरक्त रहा हूँ. एक बार यह समझ लेने के बाद कि हमारे समाज और इसके इतिहास को जानबूझ कर विकृत किया गया है, मैंने जो संकल्प लिया कि इसको उजागर करके ही रहूँगा, मै इसके लिए अप्रमाद कार्यरत रहा हूं, इसे पूरा करने का सपना मेरे लिए एकमात्र प्रेरणा का स्रोत रहा है.

मार्क्सवाद भी मुझे इसीलिए आकर्षक लगता रहा कि, मेरी अपनी समझ से, यह अन्याय, झूठ और पाखंड को निर्मूल करने का दर्शन है. यदि यह समझ गलत है तो मैं कहूँगा, कभी-कभी गलत समझ सही समझ से`अधिक उपयोगी होती है, और ऐसी गलत समझ के बल पर सही मानी जाने वाली समझ की भी धज्जियां उड़ाई जा सकती हैं.

पाठक जी का वैदिक साहित्य में दखल है, यह जानने के बाद ही मैं उनसे मिलने गया था, परन्तु इस चर्चा में न वह पूरी तरह मेरी बात समझ पा रहे थे, न मैं उनके श्रमण संस्कृति के माध्यम से पश्चिम से सम्पर्क की कल्पना कर पा रहा था. भाषा और साहित्य सम्बन्धी मेरी जानकारी से वह उत्साहित अवश्य हुए थे जिससे हम देर तक बातचीत करते रहे.

उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि जब विश्वविद्यालयों तक में गहन अध्ययन और शोध की प्रवृत्ति बहुत घट गई है, लोग नियुक्ति या पदोन्नति के लिए अनिच्छापूर्वक शोधकार्य करते हैं, यह आदमी, जिसको अपने शोधकार्य का कोई लाभ नहीं मिलना, वह अध्यापन के पेशे से दूर रहते हुए भी कैसे कर सकता है? इतने कठिन साहित्य और विषय पर शोध क्यों करता रहा? फिर वैदिक जिससे संस्कृतज्ञ भी घबराते हैं उसमें इसकी कैसे रुचि हो सकती है?

आश्चर्य उन्हें मेरी स्थापना से तो होनी ही थी कि ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता का साहित्य है और हड़प्पा सभ्यता के उपादान वैदिक जनों के भौतिक जीवन के अवशेष हैं. यदि उसने दशकों का समय लगा कर इतनी लगन से यह शोधकार्य किया भी तो वह अपनी सारी जमा पूंजी दूसरों को सौंपने को क्यों उतारू है?

उसी चर्चा में अध्ययनविधि का हवाला आया और मैंने जब बताया कि मैं मार्क्सवादी हूँ तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उन्होंने कहा, ‘मार्क्सवादी इतिहासकार तो ऐसा मानते हैं, फिर आप मार्क्सवादी कैसे हो सकते हैं?’ तो जो मैंने उत्तर दिया उसका भाव यह था कि जो वैसा मानता है वह मार्क्सवादी हो ही नहीं सकता. वह भाववादी है, वह नस्लवादी है, उसकी सोच उपनिवेशवादी है.

यह अगला आश्चर्य है कि मेरे मार्क्सवादी कहे और माने जाने वाले मित्र अपने तई मुझे कच्चा मार्क्सवादी और कुछ दूर तक दक्षिणपंथी रुझान का मानते रहे और इसे लेकर मेरे मन में उनसे कोई मलाल न था, जब कि मैं उनकी मार्क्सवाद की समझ को गलत मानता रहा जिसे वे कभी स्वीकार कर ही नहीं सकते.

मार्क्सवाद की उनकी एक कसौटी तो यही थी कि यदि मैं मार्क्सवादी हूँ तो मेरी मित्रता ऐसे लोगों से कैसे हो सकती है जो घोषित रूप से दक्षिणपंथी हैं और एक-दो तो संघ से भी जुड़े हैं जिसके प्रति उपहास और तिरस्कार के अतिरिक्त दूसरा कोई भाव उनके मन में है ही नहीं.

इसे मैं अस्पृश्यता का सबसे गर्हित रूप मानता हूँ जिसमें सामाजिक अस्पृश्यता को वैचारिक और सांस्कृतिक अस्पृश्यता तक पहुंचा दिया गया है. यह मार्क्सवाद-विरोधी तरीका है. इसे मैं कम्युनिस्टों में मुस्लिम लीग की मानसिकता के आभ्यंतरीकरण का परिणाम मानता हूँ. इसके अतिरिक्त, घृणा नाज़ियों का हथियार रहा है.

मार्क्सवादी पिछड़ी चेतना को वैज्ञानिक सोच में बदलने का काम करता है, न कि नफरत बांटने का. यह नफरत कैसे संक्रमित हुई और केवल हिन्दू समाज के लिए हुई, इसकी जो पड़ताल नहीं कर सकता वह मेरी समझ में मार्क्सवादी नहीं हो सकता.

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