सिनेमा के बहाने : क्रिस्टोफ़र नोलान: कल्पना, यथार्थ और कहन की बेचैनी

कितने समय से भारतीय या अमेरिकन फ़िल्मों से बाहर ही नहीं निकल पा रहा. कोशिश तो थी कि रशियन, जापानी और चाइनीज़ सिनेमा पर कुछ बात हो सके जिसकी राजनैतिक स्थिरता/अस्थिरता और वैश्विक दृष्टिकोण ने एक पूरी सदी से दुनिया को प्रभावित किया है. पर लगता है थोड़ा मुश्किल है, बावजूद इसके कि इन दिनों में वही फ़िल्में देख रहा हूँ.

पर आज तो बात क्रिस्टोफ़र नोलान की ही होगी जिनकी हालिया रिलीज़ फ़िल्म ‘डनकर्क’ ने सफ़लता के रिकॉर्ड तोड़े हैं. ‘नॉन-लीनियर’ कथानक मेरा पसंदीदा फ़ॉर्मेट है और नोलान उसके बेहतरीन कहानीकार और फ़िल्मकार हैं. बहुत भीतर न भी जाएँ और ऊपरी स्मृति को ही खुरच लें तो ‘मेमेंटों’, ‘इनसेप्शन’, ‘इंटरस्टेलर’ जैसी फ़िल्में तुरंत ज़ेहन में आती हैं.

पिछले बीस साल से भी कम समय में जिन निर्देशकों ने विशव्यापी प्रसिद्धि और साख अर्जित की है उनमें नोलान का नाम शायद सबसे ऊपर ही होगा. नैतिकता, अपराध बोध, समाजशास्त्रीय संबंध, दार्शनिकता, नैतिक मूल्य, व्यक्तिगत पहचान और समय-स्थान के साथ चलने वाले चिंतन को आज के समय के साथ दर्शाने वाली कहानियाँ नोलान को सिनेमा इतिहास में अलग तरह से खड़ा करती हैं.

स्मृति के साथ बनने वाले दृश्य और उनका आकल्पन नोलान की फ़िल्मों की विशेषता है. इन सबके प्रभाव को कमर्शियल सिनेमा में पिरोना उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत है, जिसके कारण दुनियाभर के सिनेमा प्रेमी नोलान की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं. कल तीस जुलाई को अपना अड़तालीसवां जन्मदिन मनाने वाले नोलान के जन्मदिन के बहाने आज उनके सिनेमा पर थोड़ी बात हम करते हैं.

नोलान उन निर्देशकों में से हैं जिनके कहन का अपना तरीक़ा है और उसे दिखाने का नज़रिया बिलकुल साफ. नॉन-लीनियर कथानक के साथ प्रयोग करने वाले फ़िल्मकारों में नोलान की ख़ासियत इंसान की बहुत भीतरी परतों में दबी मनोवैज्ञानिक छवियों, स्मृतियों के साथ इंसानी जज़्बातों को उकेरना है. उनके किरदार बहुत ही सामान्य ढंग और परिस्थितियों में दार्शनिक और एक तरह का खोजी व्यवहार करते हैं. उन पर नैतिकता के दबाव भी हैं और सामाजिक रिश्तों के आग्रह भी.

गंभीर चिंतन और किरदार की जटिलता नोलान की फ़िल्मों को बनाती हैं. यह कम आश्चर्यजनक नहीं कि हॉलीवुड की मुख्यधारा में रहकर नोलान जैसा फ़िल्मकार ऐसे समय में ‘इनसेप्शन’ जैसी फ़िल्म रचता है जहाँ जीवन की गति संसाधनों के साथ बहुत तेज़ है. हालाँकि, साधन सम्पन्न और धनी देश होने के साथ विचारों में ‘प्रोग्रेसिव’ माने जाने वाले देश अमेरिका में सिनेमा ने जो हासिल किया और दुनिया को दिया है वह अमूल्य है. उसने समय के साथ बहते हुए और पूर्णतः व्यावसायिक दृष्टिकोण के बावजूद केवल बेचने वाला सिनेमा ही नहीं बनाया बल्कि संसाधनों का हर तरह से उपयोग किया. यही कारण रहा कि लंदन में पैदा हुए नोलान ने शुरुआती असफलताओं और व्यवस्था की इच्छाशक्ति में कमी को देखते हुए अमेरिका को ही अपने काम के लिए चुना.

एक गंभीर क़िस्म के मानस और उसके आधार पर फ़िल्म रचने का सपना पालने वाले नोलान की प्रतिभा को हॉलीवुड ने हाथों हाथ ही लिया. और उन्हें मनचाहा काम करने की छूट भी प्रदान की. पर यह तो एक व्यवस्था के सहयोग या व्यापार के लेन-देन, नफ़ा-नुकसान में आता है. असल बात तो वह है जो नोलान जैसे फ़िल्मकार कहना या दिखाना चाहते हैं. मन की सहज जिज्ञासाओं, सवालों, इंसानी रिश्तों और अपने समय में भूत, वर्तमान, भविष्य को सोचने की कहानियों और जीवन की जटिलताओं में नोलान के भीतर का कलाकार कुछ ढूँढने का जतन करता है. भले उसमें से बहुत कुछ हासिल न हो पर कल्पना का भी अपना एक लोक है और यथार्थ तो है ही अजब. जो दिखता है उससे ज़्यादा उसका ‘पर्सपेक्टिव’ महत्वपूर्ण है. नोलान के किरदार इन्हीं बेचैनियों और असहजता में भटकते हैं, आज के समय में. उन्हें गुज़रा भी लुभाता है और भविष्य भी. वे भीतर तक जाना चाहते हैं. वे परस्थितियों में घिरकर सही-गलत, सच-झूठ को बहुत करीब से देखना चाहते हैं. उनके सामने सच की कड़वाहट और दार्शनिकता का अहसास है. सबसे बड़ी बात हर परिस्थिति में उन किरदारों के पास मासूमियत और सच्चाई है.

मुझे नोलान के किरदारों की यही बात सबसे आकर्षक लगती है. कुछ समय पहले उनकी पहली फ़िल्म ‘फॉलोविंग’ को देखने के बाद यही लगा कि दुनिया से संवाद करने के लिए किसी अजूबे की ज़रूरत नहीं. भावनाएं और रहस्य, हर समय हर जगह मौजूद हैं. वो इसी ब्रह्मांड का हिस्सा हैं. और अकेले आदमी की छटपटाहट कुछ पाने से ज़्यादा उस इच्छा के बाहर निकल जाने की है. चुप्पी एक अलग ही अर्थ में किरदार के भीतरी द्वंद्व को खोलने-नहीं खोलने की धुन में रहती है. और यही क्रिस्टोफ़र नोलान अपनी कहानियों में कहते हैं. इसलिए उन्हें बुद्धिजीवियों का फ़िल्मकार कहा जा सकता है. फिर कला की एक अवधारणा अभिव्यक्ति से भी जुड़ती है. और अवचेतन में भीतर तक केवल मूल्य या घटनाएँ ही नहीं रहस्यों की परतें भी होती हैं. नोलान का सिनेमा उन्हीं परतों का उद्घाटन करता है और उनसे संवाद करता है. ‘इनसेप्शन’ का घटनाक्रम भी चौंकाता है जब इच्छाशक्ति का जज़्बा इतना हो जाए कि कोई दूसरा आदमी क्या सोचे यह भी आप तय करें. और न केवल तय करें बल्कि बाक़ायदा अवचेतन में बिठाया जाये. रहस्य के पीछे पड़ने की यही इच्छा ‘इंटरस्टेलर’ में नैतिकता और इंसानियत की खोज में उस जगह की तलाश करती भटकती है, जहाँ मनहूसियत से बोरियत के बाद अब एक अदद सुकून की तलाश है.

नोलान क्यूँ बार-बार ज़िंदगी (अच्छाई) में लौटना चाहते हैं? इस सवाल के जवाब में उनकी कहानियाँ छटपटाती नहीं और एक जटिल पर साफ़ ‘पॉइंट ऑफ व्यू’ ज़रूर देती हैं. उनके सिनेमा से भले ही जवाब लेकर दर्शक लौटता है पर सवाल असर करना बंद नहीं करते. इस दुनिया के पार भी दुनिया है, ऐसा अटल विश्वास है उनका. और यह भी कि मौत का दिन भी तय है. इन्हीं दो छोरों के बीच एक गहन अनुभूति वाला सिनेमा नोलान रचते हैं जो आसानी से समझ नहीं आता और विस्मृत भी नहीं होता.

पर हमें इससे क्या मतलब कि वह ऐसा ही क्यूँ करते है? एक तरह से यह हमारी अपनी समझ को विस्तृत करना भी है कि अलग-अलग धाराओं के लोग अपनी-अपनी दृष्टि से सिनेमा या कला को रच रहे हैं. हाँ, साधारणीकरण वहाँ नहीं है पर हमेशा हो, यह ज़रूरी भी नहीं. और एक अवस्था तक आते-आते हम वहाँ पहुँचते ज़रूर हैं. इसलिए भी जॉनर के नाम पर ‘निओ-नुआर’, ‘लेबरींदियन प्लॉटिंग’, ‘सरियलिस्टिक रियलिटि’ जैसा सिनेमा उनके खाते में दर्ज होता है. उनके अपने रेफ़्रेंस विज्ञान, जीवन और भविष्य से आते हैं. अर्जेन्टीना के महान लेखक होर्हे लुई बोर्हेस और डच ग्राफ़िक आर्टिस्ट माउरिट्स कॉर्नेलिस एशर की सूक्ष्मता, वर्णन और दृष्टिकोण उनके कहन का स्त्रोत है. नींद, सपने, शोर, रहस्य, इच्छायें, खोज, सच, झूठ, इंसान, जीवन जैसे विषय उनके सामने चुनौती पेश करते हैं और हर बार उनके पास स्मृति के रास्ते होते हुए चेतन, अचेतन और अवचेतन की पुड़िया में से दिखाने को बहुत कुछ होता है.

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