Toilet : केवल एक प्रेम कथा नहीं, हर महिला की अनकही व्यथा

पटना से दरभंगा आ रहा था. बस में मुजफ्फरपुर बस-स्टैंड से एक लड़की चढ़ी. मेरे आगे की सीट पर बैठी– ड्राइवर के ठीक पीछे.

बस बिहारी परंपरा के मुताबिक आगे-पीछे कर रही थी. शोर, धूल और चिल्ल-पों का बाज़ार गरम था. मैंने देखा कि लड़की ने ड्राइवर से पूछा कि क्या वह 2 मिनट में नीचे से आ सकती है. ड्राइवर ने कहा कि यहां 2 मिनट का ही स्टॉप है, लेकिन लड़की ने बड़ी आजिज़ी से कहा कि वह तुरंत आ जायेगी.

वह उतरी और फिर आ गयी, कुछ खोई सी. मेरी उत्सुकता चूंकि बढ़ गयी थी तो नीचे उसके उतरने तक मेरा ध्यान उसी पर था. मैं समझ गया कि वह ‘बाथरूम’ की तलाश में थी.

अब, संकट यह था कि अगर मैं पहल करता तो शायद मुझे ही गलत समझ लिया जाता. उस लड़की के चेहरे से पता चल रहा था कि उसका ‘कष्ट’ बढ़ता जा रहा है. आखिर, अपनी बगल में बैठे एक बुजुर्ग से यह बात मैंने कही. उन्होंने कंडक्टर को बुलाकर ‘चुपके’ से यह बात कही और कंडक्टर ने ड्राइवर के ‘कान’ में.

तकरीबन, 5 किलोमीटर दूर जाने पर हाइवे पर एक किनारे रोक कर उस लड़की की ‘समस्या’ का समाधान करवाया गया.

अब, 3 टिप्पणी हैं मेरी ओर से….

1. लड़कियों या महिलाओं को हमारे समाज में बचपन से अपनी प्राकृतिक इच्छा पर रोक लगाए रखने को कहा गया है. तो, वह लड़की कितनी देर से परेशान होगी?

2. इस मामले में बस के ड्राइवर और कंडक्टर अच्छे थे. नहीं होते और अमूमन बिहार की बसों का हाल भगवान भरोसे है, सरकारी परिवहन नाम की चीज़ तो दशक पहले लुप्त हो चुकी है.

3. ये कैसा देश और राज्य बनाया है, हमने कि पटना तक का बस-स्टैंड गंदगी और कबाड़ का अड्डा है. एक अदद टॉयलेट तक नहीं?

कम से कम इस बार के शासन –काल में नीतीश जी कुछ कर दिखाइए.

है दम? निभाएंगे राजधर्म?

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