भीड़ उर्फ संख्याबल गुंडई का लाइसेंस नहीं

उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों को सड़कों पर गुंडई करने की बजाय, उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले अखिलेश यादव, उनकी समाजवादी पार्टी की सरकार, उसके तत्कालीन अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के खिलाफ…. धोखा, चार सौ बीसी, मानहानि, आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में मुकदमें दर्ज कराने की मांग करनी चाहिए.

प्रदेश में शिक्षामित्रों के अब तक के आंदोलनों और कोर्ट के फैसलों के दौरान तमाम आत्महत्याओं में हुई और हो रही मौतों के खिलाफ पूर्व सरकार के जिम्मेदारों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कराना चाहिए.

अपने संगठन के उन दलाल नेताओं के खिलाफ मुकदमें दर्ज कराने चाहिये, जो यह जानते हुए कि उनकी नियुक्तियां अवैध ढंग से की जा रहीं, चंदे की उगाही में लगे रहे. सत्ता से दलाली करते रहे. हत्या के मुकदमों में ये भी सहअभियुक्त हों, इसके लिए सड़कों पर उतरना चाहिए.

उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षा विभाग के शिक्षामित्र मामले में फैसला सुप्रीम कोर्ट से आया है, इसलिए राज्य सरकार के खिलाफ गुंडई का कोई विधिक, नैतिक आधार नहीं. अगर यह नहीं समझ पा रहे, तो आप तमाम शिक्षामित्र वाकई अल्पज्ञानी और अयोग्य हैं. आप मास्टर बनने के अधिकारी नहीं.

सड़क पर अभागपन और गुंडई करने से पहले जरा सोच के देखिए, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि दो साल में आप टीईटी की योग्यता हासिल कर लो, शौक से मास्टर बन जाओ.

फिर आपके इस सड़कछाप अराजकता का मतलब क्या है? क्या आप पात्रता परीक्षा पास करने की बिसात नहीं रखते? तब भी तो आप अयोग्य हैं!

बेहतर हो, अपने असली गुनाहगारों को पहचानिए. सोचिए आपको किसने आज सड़कों पर ला खड़ा किया! तलाशिये अन्तःमन में… आपके साथियों की मौतों के जिम्मेदार कौन लोग हैं? सोचना है तो… खुद को कोर्ट के फैसले के अनुरूप योग्यता के लिए कैसे तैयार करेंगे… ये सोचिए.

शिक्षामित्रों के मानदेय में एक सम्मानजनक बढ़त के लिए प्रदेश सरकार को धन्यवाद देते हुए… संविदा की शर्तों, वेतन, सुविधाओं पर सहमति बनाने की दिशा में काम करिये. संविदाकर्मी रहते हुए अपने संवर्ग के लिए क्या बेहतर हासिल कर सकते हैं, ऐसे किसी आंदोलन की लाइन पर काम करिये.

सीधा संवाद करिये, दलाल संगठन नेताओं को अपने बीच से बाहर करिये.

मास्टर बनने की राह अपनानी है तो सड़कों की गुंडई बन्द करिये. मी लॉर्ड का फैसला है, आपको राजनीति और सड़कों पर गुंडई, उत्पात करने का कोई अधिकार नहीं है. यह सब करके आप न समाज से सहानुभूति पा सकेंगे, न ही व्यवस्था का सहयोग.

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