स्थिरता से भरी हिन्दू सहस्त्राब्दी की सोच

प्रबुद्ध पाठकों को “vision statement” क्या होता है पता तो होगा ही. अक्सर किसी भी कंपनी में कॉर्पोरेट प्लानिंग में कंपनी के लिए आगे की प्लानिंग की जाती है जिसमें अगले कुछ सालों का road map बनाया जाता है. कंपनी क्या बनना चाहती है, रास्ते में क्या अड़चनें आएंगी और उनसे कैसे निपटना आदि सब का विचार किया जाता है.

क्यों न हिन्दू, अगले सहस्त्राब्दी की सोचें? जब इस देश में हजारों वर्षों तक हिन्दू शासन रहा भी था तो हमने यह सोचा नहीं. उसके बाद आक्रांता आते गए और उनसे निपटने के अलावा हम कुछ सोच ही नहीं पाये. काफी कहाँ तहां सिमट गए.

इसके बनिस्बत हम देखते हैं तो विधर्मी आक्रांता लंबी सोच रखते हैं. पृथ्वी पादाक्रांत करनी है अपने झंडे तले और इसके लिए लंबी मुहिमें तैयार करते हैं. भले बाद में उसमें सुधार हों, लक्ष्य अटल रहता है. मूल सोचने वाला चला जाता है लेकिन पूरे देश, समाज के लिए गोल सेटिंग हो जाती है.

आज कुछ स्थिरता है. हमें एक स्थिर हिन्दू सहस्त्राब्दी के बारे में विचार करना चाहिए. बात हमारी पीढ़ी तक सीमित नहीं है. हो सकता है कि जब तक इस पर विज़न डॉक्यूमेंट बनें तब तक हम चले भी गए हों, लेकिन विज़न की आवश्यकता महसूस करना भी अपने आप में एक सोच है, एक गोल है.

और इसमें कोई बुराई नहीं है. सेकुलरों को भी मरोड़ उठने जैसी कोई बात नहीं है, हिन्दू सेक्युलर ही रहा है सही अर्थ में. इस देश में वे सभी समुदाय सुरक्षित रहे हैं जिन्हें इस्लाम या इसाइयत से जान-माल दोनों का भय था.

यह सोच रहेगी तो ही हर भारतीय को अपने उत्तरदायित्व का सही बोध अपने आप होगा. अपनी विरासत का ज्ञान होगा और अपनी पहचान में गर्व होगा जो राष्ट्रोन्नति के लिए आवश्यक है.

अगर आप भारतीय होने में शर्म महसूस करते हैं तो आप से ऐसा कोई काम नहीं होने वाला जिस पर भारत कभी गर्व करे. अन्य देश में जाकर क्या करते हैं वो भारत के काम का नहीं होता और यह भारतीयों की हीनता ही कहलाएगी कि विदेशियों के स्वीकृति पर ही हम अपनी अचीवमेंट को कुछ मानते हैं वर्ना नहीं.

एक बात बताऊँ? अगर पाकिस्तान हमसे 1000 साल के युद्ध की सोच सकता है तो हम हजारों साल की सुरक्षा और स्थिरता के बारे में क्यों विचार नहीं करते?

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