राजनीति और शकुन संकेत

ज्योतिष शास्त्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है शकुन विचार, जिसकी वर्तमान समय में उपेक्षा की जाती रही है. जबकि ज्योतिषीय गणना और उसके फलादेश करते समय तत्क्षण के शकुन पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि कई बार जो बात शकुन उद्घाटित कर देता है वो जातक की जन्मकुण्डली भी नहीं उद्घाटित कर पाती.

सामान्य जीवन में भी हमारे भीतर विराजमान अन्तरयामी परमात्मा हमसे कुछ भौतिक माध्यमों से संवाद करना चाहता है. वह हमको या तो कुछ शुभ करने के लिए प्रेरित कर रहा होता है या अशुभ करने से रोक रहा होता है. प्रत्येक व्यक्ति या परिस्थिति के लिए बिलकुल अलग-अलग शकुन हो सकते हैं.

पिछले सोमवार 24 जुलाई को शाम को मेरे एक मित्र राजेश यादव जी कुछ गंभीर प्रश्नों का समाधान मुझसे करवाना चाह रहे थे. वे बहुत ही सज्जन इंसान हैं, किसी भी मित्र को मदद करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. वे अभी इग्नू में पोलिटिकल साइंस के प्रवक्ता हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के परमानेंट नियुक्ति के लिए प्रयासरत हैं. वें कांग्रेस पार्टी के रिसर्च टीम में रहे हैं, इसलिए उन्हें कांग्रेसी माना जा सकता है, लेकिन वे लालू प्रसाद जी के घोषित कट्टर समर्थक हैं. वे बिहार से हैं इस कारण भी लालू जी के लिए उनके मन में अगाध श्रद्धा है. अगर आवश्यकता पड़ी तो पार्टी को मजबूत करने के लिए, वे आजीवनअविवाहित रह कर अपने आप को ही पार्टी को समर्पित कर सकते हैं. वे इस प्रकार के कर्मठ और वफादार कार्यकर्ता हैं. उनके शक्ति के स्रोत लालू जी हैं.

वे जब मुझसे अपने भविष्य पर विचार कर रहे थे उसी समय एक अद्वितीय घटना घटी. मुखर्जी नगर मेन मार्केट में सैकड़ों लोगों के भीड़ के बीच में एक सांड दूसरे सांड का बलात्कार का प्रयास कर रहा है, और वो भी सामने की तरफ से. अर्थात वो बलात्कारी सांड दूसरे पीड़ित सांड पर मुँह की तरफ से कामुक अवस्था में अपने आगे के दोनों पैर उसके गर्दन में फंसा रखा है और उसके मुख पर लगातार हमला कर रहा है. बेचारा दूसरा सांड अपनी गर्दन को निकालने का असफल प्रयास कर रहा है. वहाँ उपस्थित भीड़ के लिए ये कौतुहल का विषय था. शास्त्र भी कहता है : “कामातुरानाम् न भयम् न लज्जा” अर्थात जो प्राणी काम के वशीभूत हो गया है उसे ना ही किसी प्रकार का भय होता है और ना ही समाज की लज्जा.

मेरे वो मित्र भी ज्योतिष का कुछ ज्ञान रखते हैं. उन्होंने कहा कि ये शकुन तो शुभ संकेत नहीं दे रहा. ये तो घोर कलयुग है लग रहा है मेरी दुनिया ही उलट-पलट होनेवाली है. मैं भी आश्चर्य से बोला कि मैंने भी अपने पैंतीस साल के जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा. मैं सोचने लगा कि इस सांड को ये सब अप्राकृतिक बातें किसने सिखा दिया, ये कौन सा पॉर्न फिल्म देखकर बिगड़ रहे हैं. और वो भी राजेश जी के प्रश्न विचार के समय ही यह दुर्लभ दृश्य का सामने आना. मैंने भी उन्हें कहा कि मित्र निश्चय ही यह कोई अशुभ संकेत है.

इस घटना के मात्र दो दिन बाद बुधवार 26 जुलाई की रात को नितिश कुमार जी ने लालू जी को सत्ता से बेदखल करते हुए इस्तीफा दे दिया और अगले ही दिन भाजपा के साथ मिलकर बिहार में सरकार बना ली. नितिश का ये निर्णय लालू प्रसाद और उनके परिवार के राजनीतिक कैरियर पर ग्रहण लगा दिया. और जिनके लिए ये पवित्र परिवार एक शक्ति के स्रोत के रूप में था, वे सभी दारुन, पीड़ा, क्षोभ और संत्रास से गुजर रहे हैं. मेरे उन मित्र पर भी इस घटना से वज्रपात हो गया है, उन्होंने खुद को एकांत में कैद कर रखा है.

अगर हम इस संपूर्ण घटना को उस सांड के शकुन से जोड़े तो सबकुछ स्पष्ट हो जाता है. ये युद्ध किसी पक्षी, बिल्ली, बकरी या कुत्ता के बीच में नहीं हो रहा था. ये दो सांडों के बीच का घमासान युद्ध था. सांड यहाँ शक्ति का प्रतीक है. वे पीड़ित सांड भी कोई सीधा प्राणी नहीं है, बस हालात से मजबूर था. वो पीड़ित सांड लालू जी को सूचित कर रहा था और वह वीर्यवान दबंग सांड नितिश जी को सूचित कर रहा था जो नरेन्द्र मोदी जी का वरदहस्त पाकर भरी सभा में लालू जी का मानमर्दन करने पर आतुर थे.

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