कलाम साहब को सच्ची श्रद्धांजलि : शिक्षा में सुधार

आजादी की पहली शाम जब सूर्यास्त के रूप में नए भारत का उदय हो चुका था, कांग्रेस के 15 प्रांतों के मुख्य (कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव) का चुनाव हो चुका था और वही भारत के नए प्रधानमंत्री भी हुए.

चुनाव आचार्य कृपलानी और लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के बीच हुआ. सनद रहे कि उस समय कांग्रेस का अध्यक्ष होना बड़ी बात थी, भारत और ब्रिटिश हुकूमत के बीच सत्ता हस्तांतरण के लिए वार्ता और पत्राचार चल रहा था.

उस चुनाव में सरदार पटेल के साथ 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों का वोट था और आचार्य कृपलानी के पास 3 प्रा.कां.क. का वोट था. मैं आरक्षण का सबसे बड़ा विरोधी तब हो जाता हूँ जब मुझे यह पता चलता है कि गांधी जी उस वक़्त नेहरू के साथ थे. ये कितना फिल्मी रहा होगा, ये आप बस सोच सकते है कि कैसे नेहरू और पटेल को गांधी अपने पास बुलाए और नेहरू के ओर देखते हुए कहे –
“तुम्हारा नाम तो कहीं से आया नहीं, अब तो सरदार चाहे तभी तुम अध्यक्ष बन सकते हो”

पटेल इशारा समझ गए, वो गुरु मानने का भाव ही था जो इतने बड़े और प्रभावशाली व्यक्ति को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया.

अब्दुल कलाम साहब को शिक्षा मंत्री बनाया गया, वो मेनन से ज्यादा जानकार थे लेकिन शायद जैसा तत्कालीन स्विडिश राजदूत अल्वा मिर्डल ने कहा है –

‘मेनन जवाहरलाल नेहरू के चहेते मात्र इसलिए है क्योंकि वो एकमात्र इंसान हैं जिनसे नेहरू डिकेन्स और मार्क्स के बारे में बात कर सकते हैं.’
जिस आदमी को गृहमंत्री बनना चाहिए था वो प्रधानमंत्री बना, जिसको अल्पसंख्यक मंत्री बनना चाहिए था वो एचआरडी मिनिस्टर बने, जिसको वित्त मंत्री बनना चाहिए था वो अलग मंत्रालय संभाल रहे थे ( के सी नियोगी).

सब कुछ अयोग्य था और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश की दो जरूरत जो कि किसान और छात्र हैं, वो गलत हाथो में थे.

ये मेरा एक छात्र होने के नाते दुर्भाग्य है कि इतने शिक्षित व्यक्ति होने के बावजूद नेहरू ने सन 1964 में पहला एडुकेशन कमीशन की स्थापना की. नेहरू वही आदमी है जो एक पन्ना लेख बिना किसी कॉमा के लिख सकते थे लेकिन अपने जैसे शिक्षा देश की जनता को मुहैया कराने का ख्याल उन्हें अपने जीवन के आखिरी दिनों में याद आया.

कोठारी कमीशन या प्रथम एडुकेशन कमीशन ने अपना रिपोर्ट 2 साल बाद यानी 1966 में दिया.

कोठारी पहले शिक्षा मंत्री थे और उन्होंने जो सलाहें दी थीं, उनमें से कुछ ये है कि-
* स्कूल में लगभग 234 दिनों तक क्लास चलेगी और कॉलेज में यह आंकड़ा 216 तक होना ही चाहिए.
* मोंटेसरी, किंडरगार्डन, जैसे शिक्षा को हटाकर प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल चलेगा.
* 1000 घन्टे तक क्लासेस चलेगी, जो कि 1100 घण्टे तक बढ़ सकती है.

इनकी सलाह पर 1968 में नेशनल पालिसी ऑफ एडुकेशन ( NPE ) का निर्माण किया गया और उस सलाह अनुसार तीन भाषा को पढ़ना जरूरी किया गया था, इंग्लिश को जरूरी किया गया और हिंदी को दूसरी भाषा रखा गया.

मुसलमान समुदाय ने इसे गलत बताया और उर्दू की मांग तेज़ की गई. एक भाषा को पढ़ाना विवाद बन गया. 1982 में पहली निर्धारित पालिसी बनी, जिसे 1986 में राजीव गांधी ने लागू किया. ignou की नींव 85 में रखकर ओपन यूनिवर्सिटी की शुरुआत की गई.

अंत में 1992 में नरसिम्हा राव सरकार ने हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में प्रवेश के लिए एक परीक्षा तय की. यही हमारे शिक्षा व्यवस्था में बदलाव किया गया है पिछले7 दशकों में.

जवाहरलाल नेहरु से लेकर मोदी सरकार तक, हर किसी ने छात्र के साथ धोखा किया है. किसी ने भी खुलकर एक नीति को लागू नहीं की. स्कूल आज जेल बन गया है, लगभग 260 दिन स्कूल हर साल खुले में चल रहे हैं. 1300 घण्टे से ज्यादा क्लासेज चल रही है और लगभग 400 घंटे कोचिंग भी चल रही हैं.

आज पूर्व राष्ट्रपति महामानव भारतरत्न एपीजे अब्दुल कलाम जी के पुण्यतिथि पर ये आंकड़े सबसे बड़ा मजाक है. पढ़ने वाला परेशान है, पढ़ाने वाला परेशान है और ना जाने क्यों हम अब भी मूक हैं.

कोठारी कमीशन ने कहा था कि कुल बजट का 6% शिक्षा को दिया जाना चाहिए ताकि देश एक तय मानक को पा सके. भारत आज आर्थिक विकास की पथ पर अग्रसर है लेकिन मात्र 26% लोग ग्रेजुएट है.

मुझे लगता है कि सरकार आज कलाम साहब के योगदान के बदले अगर उनके सपने को पूरा कर दे तो आज उनकी आत्मा हर भारतीय के दिल में जिंदा हो जाये.

ये देश सबसे तुलना करके आगे बढ़ना चाहता है मगर आज शिक्षा रो रही है और हम सीख भी नहीं रहे हैं. अगर इस देश में छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर ये सोच रहे हैं कि क्या करना है तो इस पर सबको शर्म करना चाहिए.

मुझे यह भी लगता हैं कि हज यात्रियों की सब्सिडी, और ना जाने कितने अन्य सरकारी सब्सिडी के बदले यह जरूरी है कि उस पैसे से हम शिक्षा विभाग सुधारे.

फिर भी मैं आज मिसाइल मैन ऑफ इंडिया के पुण्यतिथि पर शत शत त नमन करता हूँ.

– यशवंत सिंह

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY