शूद्र ऋषि

अघोरी दुखी था, दुनिया भर के समाज शास्त्रियों ने उसे कहा कि तुम्हारे देश ने 90% लोगों को शूद्र बनाकर रखा और उसे वेद का अधिकार नहीं दिया, उन्हें दास बनाया. अम्बेडकर और गाँधी मसीहा बनकर आए और उनके बाद आज लालू मुलायम सामाजिक न्याय नहीं लाते तो शूद्रों को तुमने पशु से निम्न बना दिया होता.

अघोरी की दशा पर एक शव ने अट्टहास किया और बोला- एक पौराणिक कथा सुनो अघोरी, तुम्हें समझ आयेगा कि शूद्र किन कर्मों के योग्य थे.

मरुत प्राचीनकाल में पृथ्वी के सर्वाधिक प्रतापी और धार्मिक राजा थे, उनकी दानशीलता धरा में अतुलनीय थी, उनके 18 पुत्र थे, ज्येष्ठ पुत्र नरिश्यन्ति पिता के बाद राजा बने और पिता के वैभव को और विराट किया, न उनके राज्य में कोई दरिद्र था न ही कोई अपराधी.

वभ्रु की कन्या इन्द्रसेना से विवाह के उपरांत उनका दम नमक पुत्र हुआ जो 9 वर्षों तक गर्भस्त रहा. दैत्यों के राजा वृषपर्वा ने उसे युद्धकला की शिक्षा दी और शूद्र-दैत्य तपस्वी दुन्दुभि से अस्त्र शस्त्र प्राप्त किए, दुशार्ण राज्य की राजकुमारी सुमना ने स्वयंवर में दम का वरण किया पर विदर्भ कुमार वपुष्मान, मद्र के राजकुमार मघनंदन और एक राजा महानंद भी सुमना पर आसक्त थे, कुमारी सुमना ने जैसे ही दम के गले में वरमाला डाली ये तीनो कुमार उसका बलात हरण कर ले जाने लगे.

दम ने सभी विद्वानों, पुरोहितों, राजाओं और ऋषियों को संबोधित करके धर्म के अनुसार निर्णय करने को कहा- सभी ज्येष्ठों ने तीनों कुमारों को दंड का भागी बताया और दम ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी. तीनों मिलकर दम पर आक्रमण करने लगे, प्रतापी योद्धा महानंद ने दम से भीषण युद्ध किया पर दम ने उसका सर काटकर धड़ से अलग कर दिया. हाहाकार मच गया और अधर्मी भागने लगे पर वपुष्मान युद्धरत रहा और दम ने उसे मरणासन्न होने की अवस्था में छोड़ कर क्षमा कर दिया. विवाहोपरांत पिता नरिश्यन्ति ने दम को राज्य सौंप दिया और स्वयं पत्नी इन्द्रसेना समेत वानप्रस्थी हो गए.

काल की गति भी कितनी विचित्र है! पुनः एक दिन वही वपुष्मान आखेट करता हुआ वन में आया और वृद्ध नरिश्यन्ति के तपोवन तक पहुँच गया, वह मौन तप में लीन थे और इन्द्रसेना निकट ही उपस्थित थी. वपुष्मान ने पास आकर पूछा- हे तपस्वी! आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र में से किस वर्ण के हैं? इन्द्रसेना ने आकर परिचय दिया तो वपुष्मान की कुटिलता को माध्यम मिल गया, शत्रु के पिता को वन में अकेला पा उसने निर्दयता से उनका वध कर दिया, असहाय इन्द्रसेना का क्रंदन वन में दूर तक फ़ैल गया.

इस रुदन को सुनकर एक शूद्र तपस्वी आया जिसे दूत बनाकर इन्द्रसेना ने दम के पास संदेश भेजा- महर्षि पराशर ने अपने पिता के हत्यारे राक्षसों के समस्त कुल को अग्निकुंड में होम कर दिया था, यदि तुम्हें माता-पिता से स्नेह है तो एक बार अपने पिता के शव को देख जाओ. जबतक दम को संदेश मिलता तब तक इन्द्रसेना ने भी वियोग में प्राण त्याग दिया. यह सूचना पाकर आहत दम मूर्छित हो गए और उनके रुदन से दिशाएं रो पड़ी.

स्वयं को संयत करके दम ने सैन्य सहित विंध्य के पार वपुष्मान के राज्य पर आक्रमण कर दिया. महाकाल का ऐसा भीषण तांडव हुआ जिसमे वपुष्मान के समस्त कुल का संहार हो गया, अंत में दम और वपुष्मान आमने सामने आए, दम ने उसे बालों से पकड़कर पृथ्वी पर गिराया और उसकी ग्रीवा को पांव से दबाकर घोषणा की- समस्त देवता, मनुष्य, सिद्ध, नाग, यक्ष और गंधर्व देखें! मैं वृद्ध तपस्वियों के हत्यारे इस नीच अधम का वक्ष चीरकर इसे अधर्म का दंड दे रहा हूँ.

पितृहंता को दंड देकर दम वापस अपनी राजधानी आए और चारो वर्णों के तपस्वियों ने उनकी यशोगाथा की.

– विष्णु कुमार

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