बिहार : यदि बरसात का मौसम है तो लाज़मी है कमल खिलना!

असल में नितीश कुमार के इस आपातकालीन इस्तीफे की नींव तब पड़ी थी जब रिपब्लिक न्यूज चैनल के सबसे पहले शो में अर्नब गोस्वामी ने लालू और कुख्यात अपराधी मोहम्मद शहाबुद्दीन का प्रामाणिक टेप चलाया था… और बुधवार शाम 6:30 बजे नितीश कुमार ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा दिया जो राज्यपाल द्वारा स्वीकृत हुआ है.

ज़ाहिर है कि एक लंबे समय तक नितीश कुमार कांग्रेस के आश्वासन पर महागठबन्धन के साथी बने रहे. 20 महीनों तक गठबन्धन का निर्वाह करते हुए लालू के “राजनीतिक पुत्रों” को झेलते रहे. यह सुविधा की राजनीति भी थी और गैर-भाजपा राजनीति का एक अलग आयाम था जिसे नितीश कुमार ने चन्दन के पेड़ से भुजंग लिपटने की संज्ञा भी दे डाली थी.

वर्तमान बहुत साफ है. नितीश कुमार भाजपा का सहारा लेकर 2020 तक अपनी नैया को पार लगाना चाहते हैं. अपने तीन साल के कार्यकाल में 2 साल केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपानीत सरकार से बिहार के तीव्र विकास के लिए कुछ पैकेज भी लेना चाहते होंगे.

नितीश इसके साथ ही बिहार से लालू यादव और कांग्रेस की राजनीति के प्रभाव को सीमित करना चाहते होंगे क्योंकि खतरा सिर्फ भाजपा के लिए ही नहीं था बल्कि एक पार्टी के तौर पर जदयू अपने जनाधार को खो रही थी.

सत्ता पक्ष के रूप में लालू को देखा जा रहा था और विपक्ष के तौर पर भाजपा को! यह नितीश कुमार के लिए लगातार चिंता का विषय बन रहा था.

अब भाजपा के लाभ को देखिए. भाजपा को बिहार में कोई ऐसा साथी चाहिए था जिसको साथ लेकर कांग्रेस और लालू यादव को निर्णायक रुप से पराजित किया जा सके. साथ ही उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान की पार्टी की बढ़ती हुई महत्वाकांक्षाओं पर एक ब्रेक लगाया जाय ताकि उनकी भूमिका सहायक दल के रूप में ही रहे और वह हिस्सेदार के रूप में स्थापित न हो सकें.

राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष की भूमिका को बहुत हद तक सीमित किया जा सके और अंतिम बात यह कि कल यानि 27 जुलाई को कांग्रेस सहित विपक्षी दलों की पटना में जो रैली होने वाली है उसमें भी कांग्रेस को यह संकेत दिया जा सके कि वह विपक्षी एकता और महागठबन्धन के अपने एजेंडे पर फेल हो चुकी है.

जाहिर है… यदि बरसात का मौसम है तो कमल खिलना लाज़मी है!

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