आखिर कौन है सच्चा मुसलमान!

(दो वर्ष पूर्व जुलाई 2015 को लिखा गया विचारोत्तेजक व सूचनाप्रद लेख)
स्लामी शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र अज़हर विश्वविद्यालय (काहिरा) से इस्लामी शिक्षा के विद्वान् इब्ने तैमिया की किताबों को वहाँ की सरकार द्वारा हटाया जा रहा है. मिस्र के तमाम पुस्तकालयों से भी इब्ने तैमिया की किताबों को हटाया जा रहा है. जॉर्डन में भी उनकी किताबों पे प्रतिबन्ध लगने लगा है.

मिस्र और जॉर्डन की सरकारों के मज़हबी सलाहकारों का आरोप है कि 13वीं सदी के इस्लामी चिंतक इब्ने तैमिया की किताबों से ही प्रेरणा लेकर इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठनों ने हिंसक जिहाद का रास्ता अपनाया है. हालाँकि यहाँ भी कुछ उलेमाओं का बड़ा तबका इस आरोप को बेबुनियाद साबित करने में जुट गया है.

इस्लामी विद्वान् प्रोफ़ेसर अख्तरुल वासे कहते हैं कि इब्ने तैमिया के फतवों को ऐतिहासिक सन्दर्भों में काट कर नहीं देखना चाहिए. जिहादी संगठनों द्वारा उनके फतवों की गलत व्याख्या की जा रही है, इब्ने तैमिया का इसमें कोई दोष नहीं है.

जैसे ही इब्ने तैमिया की किताबों पर प्रतिबन्ध लगना चालू हुआ वैसे ही IS ने और भी उग्र रूप धर लिया और शिया मस्ज़िदों पर हमले बढ़ा दिए. कुवैत में 27 तो सऊदी अरब में 21 लोगों को मार दिया. पाकिस्तान में तो वैसे भी शिया मस्ज़िदों में हमले होते रहते हैं.

वैचारिक मतभेद इतना उग्र रूप ले लेंगे किसी ने शायद ही सोचा होगा, एक फिरके के लोग दूसरे फिरके के लोगों को मुसलमान ही नहीं मानते. इराक़, सीरिया, जॉर्डन, मिस्र, सऊदी अरब, कुवैत, ट्यूनीशिया, यमन, लीबिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे तमाम मुस्लिम देशों में मुसलमान ही मुसलमान का खून बहा रहे हैं.

अल कायदा और इस्लामिक स्टेट को ख़त्म करने के लिए कई और आतंकी संगठन खड़े हो गए हैं. हाल ही में जैश-ए-इस्लाम नामक संगठन ने बेरुत में इस्लामिक स्टेट के 18 आतंकियों को उन्हीं के तरीके से लाइन से खड़ा करके गोली मार दी थी. सब फिरके आपस में लड़ रहे हैं, मुसलमान ही मुसलमान का खून बहा रहा है.

एक सर्वे के मुताबिक़ पिछले 65 वर्षों में 10 लाख से ज़्यादा मुसलमान आपस में ही लड़कर मर चुके हैं. चौंकाने वाली बात है कि इज़राइल ने जितने मुसलमान मारे उसका प्रतिशत 0.3% मात्र है. अब सवाल उठता है कि आखिर मुसलमान का असल दुश्मन है कौन और सच्चा मुसलमान भी कौन है?

तो आपकी जानकारी दुरुस्त कर दूँ. 1954 में पाकिस्तान में जब अहमदियों और शियों की मुस्लमानियत को लेके सवाल उठाये गए तो सरकार ने जानने के लिए ‘मुनीर कमीशन’ का गठन किया और अध्ययन और सर्वे के बाद रिपोर्ट सौंपी तो उसमें ये कहा कि ये तय कर पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है कि सच्चा मुसलमान आखिर है कौन? क्योंकि किसी भी इस्लामिक विद्वान् या उलेमा के पास ऐसी परिभाषा ही नहीं है जो सच्चे मुसलमान की व्याख्या कर सके और सबको स्वीकार्य भी हो.

इस्लामी विद्वान् सगीर किरमानी साहब अंत में लिखते हैं कि अब किसके माथे पे मुसलमान और किसके माथे पे गैर मुसलमान लिखा जाए. अब ये ज़िम्मेवारी इस्लामिक स्टेट और अल कायदा और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों ने ले ली है.

ये चुनौती सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है कि वे या तो ये तय करवा दें कि सच्चा मुसलमान कौन है या ऐसे ही चलने दें…

इसी बीच कुवैत में शिया मस्ज़िद में हुए हमले के बाद तनाव में शिया और सुन्नी दोनों ने कुवैत की सबसे बड़ी मस्ज़िद में एक साथ जुमे की नमाज़ पढ़ी. मेल जोल और मुसलमानों में आपसी प्रेम के लिहाज़ से ये ताज़ा हवा का झोंका है या नफरत मिटाने का रस्मी प्रयास मात्र…. खैर देखना दिलचस्प होगा तब तक भारतीय सेकुलरिज्म का मज़ा लेते हैं.

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