इस्लाम के झंडे तले दुनिया को देखने के ख़्वाहिशमंदों को क्या ‘देश’ या ‘देश प्रेम’ से ही इत्तेफ़ाक नहीं!

rohit-sardana

देश का बँटवारा हुआ. पाकिस्तान बन गया. जिन्ना चले गए. लेकिन वो सोच यहीं रह गयी. अगर चरख़ा, सत्याग्रह और अहिंसा आज़ादी की लड़ाई के हथियार थे तो वन्दे मातरम भी था. फिर वन्दे मातरम के लिए आज तक अदालती लड़ाइयाँ क्यों चल रही हैं?

अचानक मुस्लिम धर्म गुरुओं का एक तबक़ा (सभी इसमें शामिल नहीं हैं) फिर से उठ खड़ा हुआ है कि ये वन्दे मातरम तो धर्म के ख़िलाफ़ है! कुछ मौलाना कह रहे हैं कि इस्लाम अल्लाह को नमन करना सिखाता है, माँ-बाप या मुल्क को नहीं!

सवाल ये है कि इस्लाम ने क्या ये मुहम्मद अली जिन्ना के नींद से जागने के बाद सिखाया? क्योंकि 1905 में बंगाल विभाजन रोकने के लिए जो बंग भंग आंदोलन चला उसमें किसी ने हिंदू-मुसलमान के आधार पे वन्दे मातरम का बहिष्कार नहीं किया.

कांग्रेस पार्टी के सारे अधिवेशन वन्दे मातरम से शुरू होते रहे, तब तक, जब तक कि मुस्लिम लीग का बीज नहीं पड़ गया. 1923 के अधिवेशन में मुहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस के अधिवेशन की शुरुआत वन्दे मातरम से करने का विरोध किया और मंच से उतर के चले गए. दिलचस्प ये है कि इसी साल मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे.

1938 में मुहम्मद अली जिन्ना ने खुले तौर पर पार्टी के अधिवेशनों में वन्दे मातरम गाए जाने के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. तभी से जिन्ना का समर्थन करने वालों ने वन्दे मातरम का विरोध करना शुरू कर दिया.

शहीद अब्दुल हमीद या शहीद अश्फ़ाक उल्लाह ख़ां ने वन्दे मातरम के नारे लगा कर जो शहादतें दीं क्या वो धर्म के पलड़े में रख के तौली जाएँगी?

श्रीलंका या इंडोनेशिया के मुसलमान अगर देश के सम्मान में लिखा गया गीत शान से गाते हैं तो क्या वो कम मुसलमान हो जाते हैं?

14 अगस्त 1947 की रात आज़ाद भारत में संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत ही वन्दे मातरम के साथ हुई थी. क्या उस वन्दे मातरम को धर्म के तराज़ू में रखने वाले देश के प्रति अपनी ही सोच को ओछा साबित नहीं कर रहे?

या इस्लाम के झंडे तले दुनिया को देखने की ख़्वाहिश रखने वाले लोग ‘देश’ या ‘देश प्रेम’ जैसे किसी ‘कॉन्सेप्ट’ से ही इत्तेफ़ाक नहीं रखते?

  • रोहित सरदाना की फेसबुक वॉल से साभार

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